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Showing posts from June, 2021

सुन्दरकाण्ड का पाठ कैसे अधिक लाभप्रद हो ?

सुन्दरकाण्ड का पाठ कैसे अधिक लाभप्रद हो ? 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ हनुमान जी और उनके सुन्दरकाण्ड ,हनुमान चालीसा ,बाहुक ,अष्टक आदि का पाठ बहुधा हिन्दू घरों में होता है या अक्सर सूना जाता है। हनुमान जी कलयुग में सर्वाधिक जाग्रत देवता माने जाते हैं और यह अमर और चिरंजीवी हैं । इनकी आराधना यदि नियमानुसार और श्रद्धा भक्ति से की जाय तो निश्चित लाभ होता ही होता है। कुछ सावधानियां और विशेष जानकारियाँ हम अपने श्रोताओं /पाठकों को इस सम्बन्ध में देने जा रहे हैं कि कैसे हनुमान जी की आराधना और सुन्दरकाण्ड का पाठ आपके लिए अधिकतम लाभप्रद हो सकता है। ऐसा क्या क्या करना चाहिए की सुन्दरकाण्ड से आपके सभी समस्याओं का निराकरण हो जाय और आपको खुशहाली प्राप्त हो ,आपका पाठ असफल न हो। हनुमान आराधना में सुन्दर काण्ड के पाठ को सदैव से विशेष स्थान दिया जाता है क्योकि इस खंड में हनुमान की अतुलनीय बुद्धि, बल, विवेक दिखाई देती है। रामचरित मानस भगवान् राम के जीवन पर आधारित है और इसमें सुन्दर काण्ड खंड भगवान हनुमान से विशेष रूप से जुडा है। सुन्दरकाण्ड के पाठ से हनुमान आराधना का विशेष और अद्वितीय लाभ होता है। इ...

अध्याय – 077 नवमी तिथि के और दशमी तिथि के व्रत

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अध्याय – 077 नवमी तिथि के और दशमी तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं भोग और मोक्ष आदि की सिद्धि प्रदान करनेवाले नवमी-सम्बन्धी व्रतों का वर्णन करता हूँ | आश्विन के शुक्लपक्ष में ‘गौरी-नवमी’ का व्रत करके देवी का पूजन करना चाहिये | इस नवमी को ‘पिष्टका-नवमी’ होती है | उसका व्रत करनेवाले मनुष्य को देवी का पूजन करके पिष्टान्न का भोजन करना चाहिये | आश्विन के शुक्लपक्ष की जिस नवमी को अष्टमी और मूलनक्षत्र का योग हो एवं सूर्य कन्या-राशिपर स्थित हों, उसे ‘महानवमी’ कहा गया हैं | वह सदा पापों का विनाश करनेवाली हैं | इस दिन नवदुर्गाओं को नौ स्थानों में अथवा एक स्थान में स्थित करके उनका पूजन करना चाहिये | मध्य में अष्टादशभुजा महालक्ष्मी एवं दोनों पार्श्व-भागों में शेष दुर्गाओं का पूजन करना चाहिये | अंजन और डमरू के साथ निम्नलिखित क्रमसे नवदुर्गाओं की स्थापना करनी चाहिये – रुद्र्चंडा, प्रचंडा, चंडोग्रा, चंड़नायिका, चंडा, चंडवती, पूज्या, चंडरूपा और अतिचंडीका | इन सबके मध्यभाग में अष्टादशभुजा उग्रचंडा महिषमर्दिनी दुर्गा का पूजन करना चाहिये | ‘ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षसि स्वाहा |’ – यह...

अध्याय – 075 अष्टमी तिथि के व्रत

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अध्याय – 075  अष्टमी तिथि के व्रत इस तिथिको उपवास करनेसे मनुष्य सात जन्मों के किये हुए पापों से मुक्त हो जाता हैं | यह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला हैं | अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं अष्टमी को किये जानेवाले व्रतों का वर्णन करूँगा | उनमें पहला रोहिणी नक्षत्रयुक्त अष्टमी का व्रत है | भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की रोहिणी नक्षत्र से युक्त अष्टमी तिथिको ही अर्धरात्रि के समय भगवान् श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था, इसलिये इसी अष्टमी को उनकी जयंती मनायी जाती है | |१-२|| अतएव भाद्रपद के कृष्णपक्ष की रोहिणी नक्षत्रयुक्त अष्टमी को उपवास रखकर भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करना चाहिये | |३|| पूजनकी विधि इसप्रकार है – आवाहन-मन्त्र और नमस्कार आवाहयाम्यहं कृष्णं बलभद्रं च देवकीम | वसुदेवं यशोदां गा: पूजयामि नमोऽस्तु ते || योगाय योगपतये योगेसहाय नमो नम: | योगादिसम्भवायैव गोविन्दाय नमो नम: || ‘मैं श्रीकृष्ण, बलभद्र, देवकी, वसुदेव, य्शोदादेवी और गौओं का आवाहन एवं पूजन करता हूँ; आप सबको नमस्कार है | योगके आदिकारण, उत्पत्तिस्थान श्रीगोविंद के लिये बारंबार नमस्कार है’ ||४-५|| तदनंतर भगवान् श्रीक...

अध्याय – 074 सप्तमी तिथिके व्रत

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अध्याय – 074  सप्तमी तिथिके व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं सप्तमी तिथि के व्रत कहूँगा | यह सबको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है | माघ मासके शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथिको (अष्टदल अथवा द्वादशदल) कमल का निर्माण करके उसमें भगवान् सूर्यका पूजन करना चाहिये | इससे मनुष्य शोकरहित हो जाता है ||१|| भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष की सप्तमी को भगवान् आदित्य का पूजन करनेसे समस्त अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है | पौषमास में शुक्लपक्ष की सप्तमी को निराहार रहकर सुर्यदेवका पूजन करनेसे सारे पापों का विनाश होता है ||२|| माघ के कृष्णपक्ष में ‘सर्वाप्ति-सप्तमी’ का व्रत करना चाहिये | इससे सभी अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है | फाल्गुन के कृष्णपक्ष में ‘नन्द-सप्तमी’ का व्रत करना चाहिये | मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष में ‘अपराजिता सप्तमी’ को भगवान् सूर्य का पूजन और व्रत करना चाहिये | एक वर्षतक मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष का ‘पुत्रीया सप्तमी’ व्रत स्रियों को पुत्र प्रदान करनेवाला है ||३-४|| इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सप्तमी के व्रतों का वर्णन’ नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ || ७४ ||

अध्याय – 074 षष्ठी तिथि के व्रत

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अध्याय – 074  षष्ठी तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – अब मैं षष्ठी सम्बन्धी व्रतों को कहता हूँ | कार्तिक के कृष्णपक्ष की षष्ठी को फलमात्र का भोजन करके कार्तिकेय लिये अर्घ्यदान करना चाहिये | इससे मनुष्य भोग और मोक्ष प्राप्त करता हैं | इसे ‘स्कन्दषष्ठी – व्रत’ कहते हैं | भाद्रपद के कृष्णपक्ष की षष्ठी तिथि में ‘अक्षयषष्ठी व्रत’ करना चाहिये | इसे मार्गशीर्ष में भी करना चाहिये | इस अक्षयषष्ठी के दिन किसी भी एक वर्ष निराहार रहनेसे मानव भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता हैं ||१-२|| इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘षष्ठी के व्रतों का वर्णन’ नामक त्रेहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ||

अध्याय – 073 पंचमी तिथि के व्रत

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अध्याय – 073  पंचमी तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं आरोग्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाले पंचमी-व्रत का वर्णन करता हूँ | श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक के शुक्लपक्ष की पंचमी को वासुकि, तक्षक, कालिय, मणिभद्र, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक और धनंजय नामक नागों का पूजन करना चाहिये ||१-२|| ये सभी नाग अभय, आयु, विद्या, यश और लक्ष्मी प्रदान करनेवाले हैं ||३|| इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पंचमी के व्रतों का वर्णन’ नामक बहात्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ||

अध्याय – 071 चतुर्थी तिथि के व्रत

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अध्याय – 071  चतुर्थी तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं आपके सम्मुख भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले चतुर्थी सम्बन्धी व्रतों का वर्णन करता हूँ | माघ के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को उपवास करके गणेश का पूजन करे | तदनंतर पंचमी को तिलका भोजन करे | ऐसा करनेसे मनुष्य बहुत वर्षोतक विघ्नरहित होकर सुखी रहता हैं | ‘गं स्वाहा |’ – यह मूलमंत्र हैं | ‘गां नम: |’ आदि से हरदयादिका न्यास करे ||१-२|| गां ह्रदयाय नम: | गीं शिरसे स्वाहा | गूं शिखायै वषट | गै नेत्रत्रयाय वौषट | गौ कवचाय हुम् | ग:अस्त्राय फट | ‘आगच्छोल्काय’ कहकर गणेशका आवाहन और ‘गच्छोल्काय’ कहकर विसर्जन करे | इसप्रकार आदिमें गकारयुक्त और अंत में ‘उल्का’ शब्दयुक्त मन्त्र से उनके आवाहनादि कार्य करे | ग्न्धादि उपचारों एवं लड्डूओं आदिद्वारा गणपति का पूजन करे ||३|| तदनन्तर निम्नलिखित गणेश गायत्रीका जप करे – ॐ महोल्काय विद्महे वक्रतुण्डायधीमहि | तन्नो दन्ती प्रचोदयात || भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को व्रत करनेवाला शिवलोक को प्राप्त करता हैं | ‘अंगारक-चतुर्थी’ (मंगलवारसे युक्त चतुर्थी) को गणेश का पूजन करके मनुष्य सम्पूर्...

अध्याय – 070 तृतीया तिथि के व्रत

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अध्याय – 070  तृतीया तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं आपके सम्मुख तृतीया तिथि को किये जानेवाले व्रतों का वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं | ललितातृतीया को किये जानेवाले मुलगौरी सम्बन्धी (सौभाग्यशयन) व्रत को सुनिये ||१|| चैत्र के शुक्लपक्ष की तृतीया को ही पार्वती का भगवान् शिव के साथ विवाह हुआ था | इसलिये इस दिन तिलमिश्रित जलसे स्नान करके पार्वतीसहित भगवान् शंकर की स्वर्णाभूषण और फल आदिसे पूजा करनी चाहिये ||२|| ‘नमोऽस्तु पाटलायै’ (पाटला देवी को नमस्कार) – यह कहकर पार्वतीदेवी और भगवान् शंकर के चरणों का पूजन करे | ‘शिवाय नम:‘ और ‘जयायै नम:’ (जयाको नमस्कार) – यों कहकर गौरी देवी की अर्चना करे | ‘त्रिपुरघ्याय रुद्राय नम:’ (त्रिपुरविनाशक रुद्रदेव को नमस्कार) – तथा ‘भवान्यै नम:’ (भवानी को नमस्कार) – यह कहकर क्रमशः शिव-पार्वती की दोनों जंघाओं का और ‘रुद्रायेश्वराय नम:’ (सबके ईश्वर रुद्रदेव को नमस्कार है ) एवं ‘विजयायै नम:’ )विजयाको नमस्कार) यह कहकर क्रमशः शंकर और पार्वती के घुटनों का पूजन करे | ‘ईशायै नम:’ (सर्वेश्वरी को नमस्कार) यह कहकर देवी के ...

अध्याय – 068 द्वितीया तिथि के व्रत

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अध्याय – 068  द्वितीया तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – अब मैं द्वितीया के व्रतों का वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्ष आदि देनेवाले है | प्रत्येक मास की द्वितीया को फुल खाकर रहे और दोनों अश्विनीकुमार नामक देवताओं की पूजा करे | एक वर्षतक इस व्रतके अनुष्ठान से सुंदर स्वरुप एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है और अन्तमें व्रती पुरुष स्वर्गलोक का भागी होता है | कार्तिक में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को यम की पूजा करे | फिर एक वर्षतक प्रत्येक शुक्ल-द्वितीया को उपवासपूर्वक व्रत रखे | ऐसा करनेवाला पुरुष स्वर्ग में जाता है, नरक में नहीं पड़ता ||१-२|| अब ‘अशून्य-शयन’ नामक व्रत बतलाता हूँ, जो स्त्रियों को अवैधव्य (सदा सुहाग) और पुरुषों को पत्नी-सुख आदि देनेवाला है | श्रावण मासके कृष्णपक्ष की द्वितीया को इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिये | (इस व्रत में भगवान् से इसप्रकार प्रार्थना की जाती हैं ) – ‘वक्ष:स्थल में श्रीवत्स चिन्ह धारण करनेवाले श्रीकांत ! आप लक्ष्मीजी के धाम और स्वामी हैं; अविनाशी एवं सनातन परमेश्वर हैं | आपकी कृपासे धर्म, अर्थ और काम प्रदान करनेवाला मेरा गार्हस्थ्य-आश्रम नष्ट न हो | ...

अध्याय – 067 प्रतिपदा तिथि के व्रत

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अध्याय – 067 प्रतिपदा तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – अब मैं आपसे प्रतिपद आदि तिथियों के व्रतों का वर्णन करूँगा, जो सम्पूर्ण मनोरथों को देनेवाले हैं | कार्तिक, आश्विन और चैत्र मास में कृष्णपक्ष की प्रतिपद ब्रहमाजी की तिथि है | पूर्णिमा को उपवास करके प्रतिपद को ब्रह्माजी का पूजन करे | पूजा ‘ॐ तत्सदब्रह्मणे नम: |’ – इस मंत्रसे अथवा गायत्री-मंत्रसे करनी चाहिये | यह व्रत एक वर्षतक करे | ब्रह्माजी के सुवर्णमय विग्रह का पूजन करे, जिसके दाहिने हाथों में स्फटिकाक्ष की माला और स्त्रुवा हो तथा बाये हाथों में स्त्रुक एवं कमण्डलु हो | साथ ही लंबी दाढ़ी और सिरपर जटा भी हो | यथाशक्ति दूध चढ़ावे और मनमें यह उद्देश्य रखे कि ‘ब्रह्माजी मुझपर प्रसन्न हो |’ यों करनेवाला मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्ग में उत्तम भोग भोगता हैं और पृथ्वीपर धनवान ब्राह्मण के रूपमें जन्म होता है ||१-४|| अब ‘धन्यव्रत’ का वर्णन करता हूँ | इसका अनुष्ठान करने से अधन्य भी धन्य हो जाता है | पहले मार्गशीर्ष मास की प्रतिपद को उपवास करके रातमें ‘अग्नये नम: |’ – इस मंत्रसे होम और अग्नि की पूजा करे | इसीप्रकार एक वर्षतक प्रत्येक म...

अध्याय – 066 समस्त पापनाशक स्तोत्र

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अध्याय – 066  समस्त पापनाशक स्तोत्र जो मनुष्य पापों का विनाश करनेवाले इस स्तोत्र का पठन अथवा श्रवण करता हैं, वह शरीर, मन और वाणीजनित समस्त पापों से छुट जाता हैं एवं समस्त पापग्रहों से मुक्त होकर श्रीविष्णु के परमपद को प्राप्त होता है | इसीलिए किसी भी पाप के हो जानेपर इस स्तोत्र का जप करे | यह स्तोत्र पापसमूहों के प्रायश्चित्त के समान हैं | कृच्छ आदि व्रत करनेवाले के लिए भी यह श्रेष्ठ है | स्त्रोत-जप और व्रतरूप प्रायश्चित्त से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं | इसलिये भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिये इनका अनुष्ठान करना चाहिये ||१९-२१|| पुष्कर कहते है – जब मनुष्यों का चित्त परस्त्रीगमन, परस्वापहरण एवं जीवहिंसा आदि पापों में प्रवृत्त होता हैं, तो स्तुति करनेसे उसका प्रायश्चित होता है | (उससमय निम्नलिखित प्रकारसे भगवान् श्रीविष्णु की स्तुति करे ) “सर्वव्यापी विष्णु को सदा नमस्कार है | श्रीहरि विष्णुको नमस्कार है | मैं अपने चित्तमें स्थित सर्वव्यापी, अहंकारशून्य श्रीहरि को नमस्कार करता हूँ | मैं अपने मानस में विराजमान अव्यक्त, अनंत और अपराजित परमेश्वर को नमस्कार करता हूँ | सबके प...

अध्याय – 065 धर्मशास्त्र का उपदेश

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अध्याय – 065  धर्मशास्त्र का उपदेश पुष्कर कहते है – मनु, विष्णु, याज्ञवल्क्य, हारीत, अत्रि, यम, अंगिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, व्यास, कात्यायन, बृहस्पति, गौतम, शंख और लिखित – इन सबने धर्म का जैसा उपदेश किया है, वैसा ही मैं भी संक्षेप से कहूँगा, सुनो | यह धर्म भोग और मोक्ष देनेवाला है | वैदिक कर्म दो प्रकार का है – एक ‘प्रवृत्त’ और दूसरा ‘निवृत्त’ | कामनायुक्त कर्म को ‘प्रवृत्तकर्म’ कहते है | ज्ञानपूर्वक निष्कामभाव से जो कर्म किया जाता है, उसका नाम ‘निवृत्तकर्म’ है | वेदाभ्यास, तप, ज्ञान, इन्द्रियसंयम, अहिंसा तथा गुरुसेवा – ये परम उत्तम कर्म नि:श्रेयस ( मोक्षरूप कल्याण) के साधक है | इन सबमें भी आत्मज्ञान सबसे उत्तम बताया गया है ||१-५|| वह सम्पूर्ण विद्याओं में श्रेष्ठ है | उससे अमृतत्व की प्राप्ति होती है | सम्पूर्ण भूतों में आत्मा को और आत्मा में सम्पूर्ण भूतों को समानभाव से देखते हुए जो आत्मा का ही यजन ( आराधन) करता है, वह स्वाराज्य – अर्थात मोक्ष को प्राप्त होता है | आत्मज्ञान तथा शम (मनोनिग्रह) के लिये सदा यत्नशील रहना चाहिये...

अध्याय – 064 संन्यासी के धर्म

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अध्याय – 064  संन्यासी के धर्म पुष्कर कहते हैं – अब मैं ज्ञान और मोक्ष आदि का साक्षात्कार करानेवाले संन्यास-धर्म का वर्णन करूँगा | आयुके चौथे भागमें पहुँचकर, सब प्रकार के संग से दूर हो संन्यासी हो जाय | जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन घर छोडकर चल दे – संन्यास ले ले | प्राजापत्य इष्टि (यज्ञ) करके सर्वस्व की दक्षिणा दे दे तथा आहवनीयादि अग्नियों को अपने-आपमें आरोपित करके ब्राह्मण घरसे निकल जाय | संन्यासी सदा अकेला ही विचरे | भोजन के लिये ही गाँव में जाय | शरीर के प्रति उपेक्षाभाव रखे | अन्न आदिका संग्रह न करे | मननशील रहे | ज्ञान-सम्पन्न होवे | कपाल (मिट्टी आदिका खप्पर) ही भोजनपात्र हो, वृक्ष की जद ही निवास-स्थान हो, लँगोटी के लिये मैला-कुचैला वस्त्र हो, साथमें कोई सहाय्यक न हो तथा सबके प्रति समता का भाव हो – यह जीवन्मुक्त पुरुष्का लक्षण हैं | न तो मरनेकी इच्छा करे, न जीने की – जीवन और मृत्यु में से किसी का अभिनंदन न करे ||१-५|| जैसे सेवक अपने स्वामीकी आज्ञा की प्रतीक्षा करता हैं, उसीप्रकार वः प्रारब्धवश प्राप्त होनेवाले काल (अन्तसमय) की प्रतीक्षा करता रहे | मार्गपर दृष्टिपात क...

अध्याय – 063 वानप्रस्थ-आश्रम

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अध्याय – 063  वानप्रस्थ-आश्रम पुष्कर कहते हैं – अब मैं वानप्रस्थ और संन्यासियों के धर्म का जैसा वर्णन करता हूँ, सुनो ! सिरपर जटा रखना, प्रतिदिन अग्निहोत्र करना, धरतीपर सोना और मृगचर्म धारण करना, वनमें रहना, फल, मूल, नीवार (तिन्नी) आदिसे जीवन-निर्वाह करना, कभी किसीसे कुछ भी दान न लेना, तीनों समय स्नान करना, ब्रह्मचर्यव्रत के पालन में तत्पर रहना तथा देवता और अतिथियों की पूजा करना – यह सब वानप्रस्थी का धर्म है | ग्रहस्थ पुरुष को उचित है कि अपनी सन्तान की सन्तान देखकर वनका आश्रय ले और आयुका तृतीय भाग वनवास में ही बितावे | उस आश्रम में वह अकेला रहे या पत्नी के साथ भी रह सकता हैं | (परन्तु दोनों ब्रह्मचर्य का पालन करें |) गर्मी के दिनों में पंचाग्निसेवन करे | वर्षाकाल में खुले आकाश के नीचे रहे | हेमंत-ऋतू में रातभर भीगे कपड़े ओढकर रहे | अथवा जल में रहे | शक्ति रहते हुए वानप्रस्थीको इसीप्रकार यग तपस्या करनी चाहिये | वानप्रस्थ से फिर ग्रहस्थ-आश्रम में न लौटे | विपरीत या कुटिल गति का आश्रय न लेकर समाने की दिशा की ओर जाय अर्थात पीछे न लौटकर आगे बढ़ता रहे ||१-५|| इसीप्रकार आदि आग्ने...

अध्याय – 062 असंस्कृत आदि की शुद्धि

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अध्याय – 062  असंस्कृत आदि की शुद्धि पुष्कर कहते हैं – मृतक का दाह-संस्कार हुआ हो या नहीं, यदि श्रीहरिका स्मरण किया जाय तो उससे उसको स्वर्ग और मोक्ष – दोनों की प्राप्ति हो सकती है | मृतक की हड्डियों को गंगाजी के जलमें डालनेसे उस प्रेत (मृत-व्यक्ति) का अभ्युदय होता हैं | मनुष्य की हड्डी जबतक गंगाजी के जलमें स्थित रहती हैं तबतक उसका स्वर्गलोक में निवास होताहैन | आत्मत्यागी तथा पतित मनुष्यों के लिये यद्यपि पिण्डोदक – क्रिया का विधान नहीं हैं तथापि गंगाजी के जल में उनकी हड्डियों का डालना भी उनके लिये हितकारक ही है | उनके उद्देश्य से दिया हुआ अन्न और जल आकाश में लीन हो जाता है | पतित प्रेत के प्रति महान अनुग्रह करके उसके लिये ‘नारायण-बलि’ करनी चाहिये | इससे वह उस अनुग्रह का फल भोगता है | कमल के सदृश नेत्रवाले भगवान् नारायण अविनाशी हैं, अत: उन्हें जो कुछ अर्पण किया जाता है, उसका नाश नहीं होता | भगवान् जनार्दन जीव का पतन से त्राण (उद्धार) करते हैं, इसलिये वे ही दान के सर्वोत्तम पात्र हैं ||१-५|| निश्चय ही नीचे गिरनेवाले जीवों को भी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले एकमात्र श्रीहरि ...

अध्याय – 060 द्रव्य शुद्धि

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अध्याय – 060  द्रव्य शुद्धि पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! अब द्रव्यों की शुद्धि बतलाऊँगा | मिट्टी का बर्तन पुन: पकानेसे शुद्ध होता है | किन्तु मल-मूत्र आदिसे स्पर्श हो जानेपर वह पुन: पकानेसे भी शुद्ध नहीं होता | सोने का पात्र यदि अपवित्र वस्तुओं से छू जाय तो जलसे धोनेपर पवित्र होता है | ताँबेका बर्तन खटाई और जलसे शुद्ध होता है | काँसे और लोहे का बर्तन राखसे मलनेपर पवित्र होता है | मोती आदिकी शुद्धि केवल जलसे धोनेपर ही हो जाती है | जलसे उत्पन्न शंक आदि के बने बर्तनों की, सब प्रकार के पत्थर के बने हुए पात्र की तथा साग, रस्सी, फल एवं मूल की और वाँस आदि के दलों से बनी हुई वस्तुओं की शुद्धि भी इसीप्रकार जलसे धोनेमान्त्र से हो जाती है | यज्ञकर्म में यज्ञपात्रों की शुद्धि केवल दाहिने हाथसे कुशद्वारा मार्जन करनेपर ही हो जाती है | घी या तेलसे चिकने हुए पात्रों की शुद्धि गरम जलसे होती है | घर की शुद्धि झाड़ने-बुहारने और लीपने से होती है | शोधन और प्रोक्षण करने (सींचने) से वस्त्र शुद्ध होता है | रेह की मिट्टी और जलसे उसका शोधन होता है | यदि बहुत से वस्त्रों की ढेरी ही क...

अध्याय – 059 आचार का वर्णन

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अध्याय – 059  आचार का वर्णन पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! प्रतिदिन प्रात:काल ब्राह्ममुहूर्त में उठकर श्रीविष्णु आदि देवताओं का स्मरण करे | दिनमें उत्तर की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग करना चाहिये, रात में द्क्षिनाभिमुख होकर करना उचित है और दोनों संध्याओं में दिन की ही भाँती उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्र का त्याग करना चाहिये | मार्ग आदि पर, जलमें तथा गली में भी कभी मलादि का त्याग न करे | सदा तिनकों से पृथ्वी को ढककर उसके ऊपर मल-त्याग करे | मिट्टी से हाथ-पैर आदि की भलीभाँति शुद्धि करके, कुल्ला करने के पश्चात दंतधावन करे | नित्य, नैमित्तिक, कामी, क्रियांग, मलकर्षण तथा क्रिया-स्नान – ये छ: प्रकार के स्नान बताये गये हैं | जो स्नान नहीं करता, उसके सब कर्म निष्फल होते हैं; इसलिये प्रतिदिन प्रात:काल स्नान करना चाहिये ||१-४|| कुएँ से निकाले हुए जलकी अपेक्षा भूमिपर स्थित जल पवित्र होता है | उससे पवित्र झरने का जल, उससे भी पवित्र सरोवर का जल तथा उससे भी पवित्र नदी का जल बताया जाता है | तीर्थ का जल उससे भी पवित्र होता है और गंगा का जल तो सबसे पवित्र माना गया है | पहले जलाशय में गोता ल...

अध्याय – 058 विवाहविषयक बातें

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अध्याय – 058  विवाहविषयक बातें पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! ब्राह्मण अपनी कामना के अनुसार चारों वर्णों की कन्याओं से विवाह कर सकता हैं, क्षत्रिय तीनसे, वैश्य दो से तथा शुद्र एक ही स्त्री से विवाह का अधिकारी है | जो अपने समान वर्ण की न हो, ऐसी स्त्री के साथ किसी भी धार्मिक कृत्य का अनुष्ठान नहीं करना चाहिये | अपने समान वर्ण की कन्याओं से विवाह करते समय पतिको उनका हाथ पकड़ना चाहिये | यदि क्षत्रिय-कन्याका विवाह ब्राह्मण से होता हो तो वह ब्राह्मण के हाथ में हाथ न देकर उसके द्वारा पकडे हुए बाण का अग्रभाग अपने हाथ से पकडे | इसीप्रकार वैश्य-कन्या यदि ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय से ब्याही जाती हो तो वह वर के हाथ में रखा हुआ चाबुक पकडे और शुद्र-कन्या वस्त्र का छोर ग्रहण करे | एक ही बार कन्या का दान देना चाहिये | जो उसका अपहरण करता हैं, वह चोर के समान दण्ड पाने का अधिकारी हैं ||१-३|| जो सन्तान बेचने में आसक्त हो जाता हैं, उसका पापसे कभी उद्धार नहीं होता | कन्यादान, शाचियोग (शचीकी पूजा), विवाह और चतुर्थीकर्म – इन चार कर्मों का नाम ‘विवाह’ है | (मनोनीत) पति के लापता होने, मरने तथा संन्य...

अध्याय – 057 संस्कारों का वर्णन और ब्रह्मचारी के धर्म

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अध्याय – 057  संस्कारों का वर्णन और ब्रह्मचारी के धर्म पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! अब मैं आश्रमी पुरुषों के धर्म का वर्णन करूँगा; सुनो ! यह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला हैं | स्त्रियों के ऋतूधर्म की सोलह रात्रियाँ होती हैं, उनमें पहले की तीन रातें निन्दित हैं | शेष रातों में जो युग्म अर्थात चौथी, छठी, आठवीं और दसवीं आदि रात्रियाँ हैं, उनमें ही पुत्र की इच्छा रखनेवाला पुरुष स्त्री- समागम करे | यह ‘गर्भाधान-संस्कार’ कहलाता हैं | ‘गर्भ’ रह गया – इस बातका स्पष्टरुप से ज्ञान हो जानेपर गर्भस्थ शिशु के हिलने-डुलनेसे पहले ही ‘पुंसवन-संस्कार’ होता हैं | तत्पश्यात छठे या आठवें मास में ‘सीमन्तोत्रयन’ किया जाता हैं | उस दिन पुल्लिंग नामवाले नक्षत्र का होना शुभ हैं | बालक का जन्म होनेपर नाल काटने के पहले ही विद्वान् पुरुषों को उसका ‘जातकर्म-संस्कार’ करना चाहिये | सूतक निवृत्त होनेपर ‘नामकरण-संस्कार’ का विधान हैं | ब्राह्मण के नाम के अन्तमें ‘शर्मा’ और क्षत्रिय के नाम के अंत में ‘वर्मा’ होना चाहिये | वैश्य और शुद्र के नामों के अंत में क्रमश: ‘गुप्त’ और ‘दास’ पदका होना उत्तम माना गय...

अध्याय – 056 गृहस्थ की जीविका

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अध्याय – 056  गृहस्थ की जीविका पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! ब्राह्मण अपने शास्त्रोक्त कर्म से ही जीविका चलावे; क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र के धर्म से जीवन-निर्वाह न करे | आपत्तिकाल में क्षत्रिय और वैश्य की वृत्ति ग्रहण कर ले; किन्तु शुद्र-वृत्तिसे कभी गुजारा न करे | द्विज खेती, व्यापार, गोपालन तथा कुसीद (सूद लेना) – इन वृत्तियों का अनुष्ठान करे; परन्तु वह गोरस, गुड, नमक, लाक्षा और मांस न बेचे | किसान लोग धरती को कोड़ने-जोतने के द्वारा जो कीड़े और चींटी आदि की हत्या कर डालते हैं और सोहनी के द्वारा जो पौधों को नष्ट कर डालते हैं, उससे यज्ञ और देवपूजा करके मुक्त होते हैं ||१-३|| आठ बैलों का हल धर्मानुकुल माना गया हैं | जीविका चलानेवालों का हल छ: बैलों का, निर्दयी हत्यारों का हल चार बैलों का तथा धर्म का नाश करनेवाले मनुष्यों का हल दो बैलों का माना गया हैं | ब्राह्मण ऋत (खेत कट जानेपर बाल योंनना अथवा अनाज के एक-एक दाने को चुन-चुनकर लाना और उसीसे जीविका चलाना ’ऋत’ कहालाता है |) और अमृत से (बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, वह ‘अमृत’ है |) अथवा मृत (माँगी हुई भीख को ‘मृत’ कहते हैं |) और ...

अध्याय – 055 वर्ण और आश्रम के सामान्य धर्म, वर्णों तथा विलोमज जातियों के विशेष धर्म

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अध्याय – 055  वर्ण और आश्रम के सामान्य धर्म, वर्णों तथा विलोमज जातियों के विशेष धर्म अग्निदेव कहते हैं – मनु आदि राजर्षि जिन धर्मो का अनुष्ठान करके भोग और मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं, उनका वरुण देवताने पुष्कर को उपदेश किया था और पुष्कर ने श्रीपरशुरामजी से उनका वर्णन किया था ||१|| पुष्कर ने कहा – परशुरामजी ! मैं वर्ण, आश्रम तथा इनसे भिन्न धर्मों का आपसे वर्णन करूँगा | वे धर्म सब कामनाओं को देनेवाले हैं | मनु आदि धर्मात्माओं ने भी उनका उपदेश किया है तथा वे भगवान् वासुदेव आदि को संतोष प्रदान करनेवाले हैं | भृगुश्रेष्ठ ! अहिंसा, सत्य-भाषण, दया, सम्पूर्ण प्राणियों पर अनुग्रह, तीर्थों का अनुसरण, दान, ब्रह्मचर्य, मत्सरता का अभाव, देवता, गुरु और ब्रह्मणों की सेवा, सब धर्मों का श्रवण, पितरों का पूजन, मनुष्यों के स्वामी श्रीभगवान में सदा भक्ति रखना, उत्तम शास्त्रों का अवलोकन करना, क्रूरता का अभाव, सहनशीलता तथा आस्तिकता (ईश्वर और परलोकपर विश्वास रखना) – ये वर्ण और आश्रम दोनों के लिये ‘सामान्य धर्म’ बताये गये हैं | जो इसके विपरीत हैं, वाही ‘अधर्म’ है | यज्ञ करना और कराना,...

अध्याय – 054 मन्वन्तरों का वर्णन

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अध्याय – 054  मन्वन्तरों का वर्णन अग्निदेव कहते हैं – अब मैं मन्वन्तरों का वर्णन करूँगा | सबसे प्रथम स्वायम्भुव मनु हुए हैं | उनके आग्नीध्र आदि पुत्र थे | स्वायम्भुव मन्वन्तर में यम नामक देवता, और्व आदि सप्तर्षि तथा शतक्रतु इंद्र थे | दूसरे मन्वन्तर का नाम था – स्वारोचिष; उसमें पारावत और तुषित नामधारी देवता थे | स्वरोचिष मनुके चैत्र और किम्पुरुष आदि पुत्र थे | उससमय विपश्चित नामक इंद्र तथा उर्जस्वन्त आदि द्विज (सप्तर्षि) थे | तीसरे मनु का नाम उत्तम हुआ; उनके पुत्र अज आदि थे | देवता तथा वसिष्ठ के पुत्र सप्तर्षि थे | चौथे मनु तामस नामसे विख्यात हुए; उस समय स्वरुप आदि देवता, शिखरी इंद्र, ज्योतिर्होम आदि ब्राह्मण (सप्तर्षि) थे तथा उनके ख्याति आदि नौ पुत्र हुए ||१-५|| रैवत नामक पाँचवे मन्वन्तर में वितथ इंद्र, अमिताभ देवता, हिरण्यरोमा आदि मुनि तथा बलबंध आदि पुत्र थे | छठे चाक्षुष मन्वन्तर में मनोजव नामक इंद्र और स्वाति आदि देवता थे | तत्पश्चात सातवे मन्वन्तर में सुर्यपुत्र श्राद्धदेव मनु हुए | इनके समय में आदित्य, वसु तथा रूद्र आदि देवता; पुरन्दर नामक इंद्र, वसिष्ठ, काश्यप, अ...

अध्याय – 053 भुवनकोश वर्णन

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अध्याय – 053  भुवनकोश वर्णन जो इस भुवनकोश के प्रसंग का पाठ करेगा, वह सुखस्वरूप परमात्मपद को प्राप्त कर लेगा |  अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! भूमि का विस्तार सत्तर हजार योजन बताया गया है | उसकी ऊँचाई दस हजार योजन है | पृथ्वी के भीतर सात पाताल हैं | एक-एक पाताल दस-दस हजार योजन विस्तृत हैं | सात पातालों के नाम इस प्रकार हैं – अतल, वितल, नितल, प्रकाशमान महातल, सुतल, तलातल और सातवाँ रसातल या पाताल | उस पातालों की भूमियाँ क्रमशः काली, पीली, लाल, सफेद, कंकरीली, पथरीली और सुवर्णमयी हैं | वे सभी पाताल बड़े रमणीय हैं | उनमें दैत्य और दानव आदि सुखपूर्वक निवास करते हैं | समस्त पातालों के नीचे शेषनाग विराजमान हैं, जो भगवान् विष्णु के तमोगुण-प्रधान विग्रह हैं | उनमें अनंत गुण हैं, इसीलिये उन्हें ‘अनंत’ भी कहते हैं | वे अपने मस्तकपर इस पृथ्वी को धारण करते हैं ||१-४|| पृथ्वी के नीचे अनेक नरक हैं, परन्तु जो भगवान् विष्णु का भक्त हैं, वह उन नरकों में नहीं पड़ता हैं | सूर्यदेव से प्रकाशित होनेवाली पृथ्वीका जितना विस्तार हिन्, उतना ही नभोलोक (अन्तरिक्ष या भुवर्लोक)- का विस्तार माना गया ह...

अध्याय – 052 जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमि के विस्तार का वर्णन

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अध्याय – 052  जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमि के विस्तार का वर्णन अग्निदेव कहते हैं – जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन हैं | वह सब ओरसे एक लाख योजन विस्तृत खारे पानी के समुद्रसे घिरा है | उस क्षारसमुद्र को घेरकर प्लक्षद्वीप स्थित है | मेधातिथि के सात पुत्र प्लक्षद्वीप के स्वामी हैं | शांतभय, शिशिर, सुखोदय, आनंद, शिव, क्षेम तथा ध्रुव – ये सात ही मेधातिथि के पुत्र हैं; उन्हीं के नामसे उक्त सात वर्ष हैं | गोमेध, चंद्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और शैल – ये उन वर्षों के सुंदर मर्यादापर्वत है | वहाँ के सुंदर निवासी ‘वैभ्राज’ नामसे विख्यात हैं | इस द्वीप में सात प्रधान नदियाँ हैं | प्लक्षसे लेकर शाकद्वीप तक के लोगों की आयु पाँच हजार वर्ष है | वहाँ वर्णाश्रम-धर्म का पालन किया जाता हैं ||१-५|| आर्य, कुरु, विविंश तथा भावी – यही वहाँ के ब्राह्मण आदि वर्णों की संज्ञाएँ हैं | चंद्रमा उनके आराध्यदेव हैं | प्लक्षद्वीप का विस्तार दो लाख योजन हैं | वह उतने ही बड़े इक्षुरस के समुद्र से घिरा है | उसके बाद शाल्मलद्वीप हैं, जी प्लक्षद्वीप से दुगुना बड़ा हैं | वपुष्मान के सात पुत्र शाल...