अध्याय – 055 वर्ण और आश्रम के सामान्य धर्म, वर्णों तथा विलोमज जातियों के विशेष धर्म

अध्याय – 055 
वर्ण और आश्रम के सामान्य धर्म, वर्णों तथा विलोमज जातियों के विशेष धर्म
अग्निदेव कहते हैं – मनु आदि राजर्षि जिन धर्मो का अनुष्ठान करके भोग और मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं, उनका वरुण देवताने पुष्कर को उपदेश किया था और पुष्कर ने श्रीपरशुरामजी से उनका वर्णन किया था ||१||

पुष्कर ने कहा – परशुरामजी ! मैं वर्ण, आश्रम तथा इनसे भिन्न धर्मों का आपसे वर्णन करूँगा | वे धर्म सब कामनाओं को देनेवाले हैं | मनु आदि धर्मात्माओं ने भी उनका उपदेश किया है तथा वे भगवान् वासुदेव आदि को संतोष प्रदान करनेवाले हैं | भृगुश्रेष्ठ ! अहिंसा, सत्य-भाषण, दया, सम्पूर्ण प्राणियों पर अनुग्रह, तीर्थों का अनुसरण, दान, ब्रह्मचर्य, मत्सरता का अभाव, देवता, गुरु और ब्रह्मणों की सेवा, सब धर्मों का श्रवण, पितरों का पूजन, मनुष्यों के स्वामी श्रीभगवान में सदा भक्ति रखना, उत्तम शास्त्रों का अवलोकन करना, क्रूरता का अभाव, सहनशीलता तथा आस्तिकता (ईश्वर और परलोकपर विश्वास रखना) – ये वर्ण और आश्रम दोनों के लिये ‘सामान्य धर्म’ बताये गये हैं | जो इसके विपरीत हैं, वाही ‘अधर्म’ है | यज्ञ करना और कराना, दान देना, वेद पढ़ाने का कार्य करना, उत्तम प्रतिग्रह लेना तह स्वाध्याय करना – ये ब्राह्मण के कर्म हैं | दान देना, वेदों का अध्ययन करना और विधिपूर्वक यज्ञानुष्ठान करना – ये क्षत्रिय और वैश्य के सामान्य कर्म हैं | प्रजा का पालन करना और दुष्टों को दण्ड देना – ये क्षत्रिय के विशेष धर्म हैं | खेती, गोरक्षा और व्यापार – ये वैश्य के कर्म बताये गये हैं | ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य – इन द्विजों की सेवा तथा सब प्रकार की शिल्प-रचना- ये शुद्र के कर्म हैं ||२-९||

मौंजी बंधन (यज्ञोपवीत-संस्कार) होनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य – बालक का द्वितीय जन्म होता हैं; इसलिये वे ‘द्विज’ कहलाते हैं | यदि अनुलोम-क्रम से वर्णों की उत्पत्ति हो तो माता के समान बालक की जाति मानी गयी है ||१०||

विलोम-क्रम से अर्थात शुद्र के वीर्य से उत्पन्न हुआ ब्राह्मणी का पुत्र ‘चाण्डाल’ कहलाता हैं, क्षत्रिय के वीर्य से उत्पन्न होनेवाला ब्राह्मणी का पुत्र ‘सूत’ कहा गया हैं और वैश्य के वीर्य से उत्पन्न होनेपर उसकी ‘वैदेहक’ संज्ञा होती है | क्षत्रिय जाति की स्त्री के पेट से शुद्र के द्वारा उत्पन्न हुआ विलोमज पुत्र ‘पुक्कस’ कहलाता हैं | वैश्य और शुद्र के वीर्यसे उत्पन्न होनेपर क्षत्रिया के पुत्र की क्रमश: ‘मागध’ और ‘अयोगव’संज्ञा होती है | वैश्य जाति की स्त्री के गर्भ से शुद्र एवं विलोमज जातियोंद्वारा उत्पन्न विलोमज संतानों के हजारों भेद हैं | इन सबका परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध समाना जातिवालों के साथ ही होना चाहिये; अपनेसे ऊँची और नीची जाति के लोगों के साथ नहीं ||११-१३||

वध के योग्य प्राणियों का वध करना- यह चाण्डाल का कर्म बताया गया हैं | स्रियों के उपयोंग में आनेवाली वस्तुओं के निर्माण से जीविका चलाना तथा स्त्रियों की रक्षा करना – यह ‘वैदेहक’ का कार्य हैं | सुतों का कार्य है – घोड़ों का सारथिपना,’पुक्कस’ व्याध-वृत्ति से रहते हैं तथा ‘मागध’ का कार्य हैं – स्तुति करना, प्रशंसा के गीत गाना| ‘अयोगव’ का कर्म है –रंगभूमि में उतरना और शिल्प के द्वारा जीविका चलाना | ‘चाण्डाल’ को गाँव के बाहर रहना और मुर्दे से उतारे हुए वस्त्र को धारण करना चाहिये | चाण्डाल को दूसरे वर्ण के लोगों का स्पर्श नहीं करना चाहिये | ब्राह्मणों तथा गौओं की रक्षा के लिये प्राण त्यागना अथवा स्त्रियों एवं बालकों की रक्षा के लिये देह-त्याग करना वर्ण-बाह्य चाण्डाल आदि जातियों की सिद्धि का (उनकी आध्यात्मिक उन्नति) – का कारण माना गया हैं | वर्णसंकर व्यक्तियों की जाति उनके पिता-माता तथा जातिसिद्ध कर्मों से जाननी चाहिये ||१४-१८||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘वर्णोंतर – धम्रों का वर्णन’ नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५५||

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