अध्याय – 068 द्वितीया तिथि के व्रत

अध्याय – 068 
द्वितीया तिथि के व्रत
अग्निदेव कहते हैं – अब मैं द्वितीया के व्रतों का वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्ष आदि देनेवाले है | प्रत्येक मास की द्वितीया को फुल खाकर रहे और दोनों अश्विनीकुमार नामक देवताओं की पूजा करे | एक वर्षतक इस व्रतके अनुष्ठान से सुंदर स्वरुप एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है और अन्तमें व्रती पुरुष स्वर्गलोक का भागी होता है | कार्तिक में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को यम की पूजा करे | फिर एक वर्षतक प्रत्येक शुक्ल-द्वितीया को उपवासपूर्वक व्रत रखे | ऐसा करनेवाला पुरुष स्वर्ग में जाता है, नरक में नहीं पड़ता ||१-२||

अब ‘अशून्य-शयन’ नामक व्रत बतलाता हूँ, जो स्त्रियों को अवैधव्य (सदा सुहाग) और पुरुषों को पत्नी-सुख आदि देनेवाला है | श्रावण मासके कृष्णपक्ष की द्वितीया को इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिये | (इस व्रत में भगवान् से इसप्रकार प्रार्थना की जाती हैं ) – ‘वक्ष:स्थल में श्रीवत्स चिन्ह धारण करनेवाले श्रीकांत ! आप लक्ष्मीजी के धाम और स्वामी हैं; अविनाशी एवं सनातन परमेश्वर हैं | आपकी कृपासे धर्म, अर्थ और काम प्रदान करनेवाला मेरा गार्हस्थ्य-आश्रम नष्ट न हो | मेरे घरके अग्निहोत्र की आग कभी न बुझे, गृहदेवता कभी अदृश्य न हों | मेरे पितर नाश से बचे रहें और मुझसे दाम्पत्य-भेद न हो | जैसे आप कभी लक्ष्मीजी से विलग नहीं होते, उसीप्रकार मेरा भी पत्नी के साथ का सम्बन्ध कभी टूटने या छूटने न पावे |वरदानी प्रभो ! जैसे आपको शय्या कभी लक्ष्मीजी से सूनी नहीं होती, मधुसुदन ! उसी प्रकार मेरी शय्या भी पत्नीसे सूनी न हो |’ इसप्रकार व्रत आरम्भ करके एक वर्षतक प्रतिमास की द्वितीया को श्रीलक्ष्मी और विष्णु का विधिवत पूजन के | शय्या और फलका दान भी करे | साथ ही प्रत्येक मॉस में उसी तिथिको चंद्रमा के लिये मंत्रोच्चारणपूर्वक अर्घ्य दे | ‘भगवान् चन्द्रदेव ! आप गगन-प्रांगण के दीपक हैं | क्षीरसागर के मंथन से आपका अविर्भाव हुआ हैं | आप अपनी प्रभासे सम्पूर्ण दिग्मंगल को प्रकाशित करते हैं | भगवती लक्ष्मी के छोटे भाई ! आपको नमस्कार है | तत्पश्चात ‘ॐ श्रं श्रीधराय नम: |’ – इस मंत्रसे सोमस्वरूप श्रीहरि का पूजन करे | ‘घं टं हं सं श्रियै नम: |’ – आईएनएस मंत्रसे लक्ष्मीजी की तथा ‘दशरूपमहात्मने नम: |’ – इस मंत्रसे श्रीविष्णु की पूजा करे | रातमें घी से हवन करके ब्राह्मण को शय्या-दान करे | उसके साथ दीप, अन्नसे भरे हुए पात्र, छाता, जूता, आसन, जलसे भरा कलश, श्रीहरि प्रतिमा तथा पात्र भी ब्राह्मण को दे | जो इसप्रकार उक्त व्रत का पालन करता हैं, वह भोग और मोक्ष का भागी होता हैं ||३-१२||

अब ‘कान्तिव्रत’ का वर्णन करता हूँ | इसका प्रारम्भ कार्तिक शुक्ला द्वितीया को करना चाहिये | दिनमें उपवास और रात में भोजन करे | इसमें बलराम तथा भगवान् श्रीकृष्ण का पूजन करें | एक वर्षतक ऐसा करनेसे व्रती पुरुष कान्ति, आयु और आरोग्य आदि प्राप्त करता है ||१३-१४||

अब मैं ‘विष्णुव्रत’ का वर्णन करूँगा, जो मनोवांछित फलको देनेवाला हैं | पौष मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से आरम्भ करके लगातार चार दिनोंतक इस व्रतका अनुष्ठान किया जाता है | पहले दिन सरसों-मिश्रित जलसे स्नान का विधान हैं | दूसरे दिन काले तिल मिलाये हुए जलसे स्नान बताया गया है | तीसरे दिन वचा या वच नामक औषधि से युक्त जलके स्वर तथा चौथे दिन सर्वोषधि मिश्रित जल के द्वारा स्नान करना चाहिये | मुर (कपूर-कचरी), वचा (वच), कुष्ठ (कुठ), शैलेय (शिलाजीत या भूरिछरीला), दो प्रकार की हल्दी (गाँठ हल्दी और दारुहल्दी), कचूर, चम्पा और मोथा – यह ‘सर्वोषधि समुदाय कहा गया है | पहले दिन ‘श्रीकृष्णाय नम: |’, दूसरे दिन ‘अच्युताय नम: |’, तीसरे दिन ‘अनन्ताय नम: |’ और चौथे दिन ‘हृषीकेशाय नम: |’ इस नाम मन्त्र से क्रमशः भगवान् के चरण, नाभि, नेत्र एवं मस्तकपर पुष्प समर्पित करते हुए पूजन करना चाहिये | प्रतिदिन प्रदोषकाल में चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिये | पहले दिन के अर्घ्य में ‘शशिने नम: |’, दुसरे दिनके अर्घ्य में ‘चन्द्राय नम: |’, तीसरे दिन ‘शशान्गाय नम: |’ और चौथे दिन ‘इन्द्वे नम: |’ का उच्चारण करना चाहिये | रातमें जबतक चन्द्रमा दिखायी देते हों, तभीतक मनुष्य को भोजन कर लेना चाहिये | व्रती छ: मास या एक सालतक इस व्रतका पालन करके सम्पूर्ण मनोवांछित फलको प्राप्त कर लेता हैं | पूर्वकाल में राजाओं ने, स्रियों और देवता आदिने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया था ||१५-२०||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘द्वितीया-सम्बन्धी व्रत का वर्णन’ नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ||६९||

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