अध्याय – 053 भुवनकोश वर्णन
अध्याय – 053
भुवनकोश वर्णन
जो इस भुवनकोश के प्रसंग का पाठ करेगा, वह सुखस्वरूप परमात्मपद को प्राप्त कर लेगा |
अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! भूमि का विस्तार सत्तर हजार योजन बताया गया है | उसकी ऊँचाई दस हजार योजन है | पृथ्वी के भीतर सात पाताल हैं | एक-एक पाताल दस-दस हजार योजन विस्तृत हैं | सात पातालों के नाम इस प्रकार हैं –
अतल, वितल, नितल, प्रकाशमान महातल, सुतल, तलातल और सातवाँ रसातल या पाताल | उस पातालों की भूमियाँ क्रमशः काली, पीली, लाल, सफेद, कंकरीली, पथरीली और सुवर्णमयी हैं | वे सभी पाताल बड़े रमणीय हैं | उनमें दैत्य और दानव आदि सुखपूर्वक निवास करते हैं | समस्त पातालों के नीचे शेषनाग विराजमान हैं, जो भगवान् विष्णु के तमोगुण-प्रधान विग्रह हैं | उनमें अनंत गुण हैं, इसीलिये उन्हें ‘अनंत’ भी कहते हैं | वे अपने मस्तकपर इस पृथ्वी को धारण करते हैं ||१-४||
पृथ्वी के नीचे अनेक नरक हैं, परन्तु जो भगवान् विष्णु का भक्त हैं, वह उन नरकों में नहीं पड़ता हैं | सूर्यदेव से प्रकाशित होनेवाली पृथ्वीका जितना विस्तार हिन्, उतना ही नभोलोक (अन्तरिक्ष या भुवर्लोक)- का विस्तार माना गया हैं | वसिष्ठ ! पृथ्वी से एक लाख योजन दूर सूर्यमंडल है | सूर्य से लाख योजन की दुरीपर चंद्रमा विराजमान हैं | चंद्रमा से एक लाख योजन ऊपर नक्षत्र-मंडल प्रकाशित होता है | नक्षत्र मंडल से दो लाख योजन ऊँचे बुध विराजमान हैं | बुध से दो लाख योजन ऊपर शुक्र हैं | शुक्र से दो लाख योजन की दुरीपुर मंगल स्थान हैं | मंगल से दो लाख योजन ऊपर बृहस्पति हैं | बृहस्पति से दो लाख योजन ऊपर शनैश्वर का स्थान हैं | उनसे लाख योजन ऊपर सप्तर्षियों का स्थान हैं | सप्तर्षियों से लाख योजन ऊपर ध्रुव प्रकाशित होता है | त्रिलोकी की इतनी ही ऊँचाई हैं, अर्थात त्रिलोकी (भूर्भव:स्व- के ऊपरी भाग की चरम सीमा ध्रुव ही है ||५-८||
ध्रुव से कोटि योजन ऊपर ‘महर्लोक; है, जहाँ कल्पान्तजीवी भृगु आदि सिद्धगण निवास करते हैं | महर्लोक से दो करोड़ ऊपर ‘जनलोक’ की स्थिति हैं, जहाँ सनक, सनन्दन आदि सिद्ध पुरुष निवास करते हैं | जनलोक से आठ करोड़ योजन ऊपर ‘तपोलोक’ है, जहाँ वैराज नामवाले देवता निवास करते हैं | तपोलोक से छानबे करोड़ योजन ऊपर ‘सत्यलोक’ विराजमान है | सत्यलोक में पुन: मृत्यु के अधीन न होनेवाले पुण्यात्मा देवता एवं ऋषि-मुनि निवास करते हैं | उसी को ‘ब्रह्मलोक’ भी कहा गया है | जहाँतक पैरोंसे चलकर जाया जाता हैं, वह सब ‘भूलोक’ है | भूलोक से सूर्यमंडल के बीच का भाग ‘भुवर्लोक’ कहा गया हैं | सूर्यलोक से ऊपर ध्रुवलोक तक के भाग को ‘स्वर्गलोक’ कहते है | उसका विस्तार चौदह लाख योजन हैं | यही त्रैलोक्य है और यही अंडकटाह से घिरा हुआ विस्तृत ब्रह्मांड है | यह ब्रहमांड क्रमश: जल, अग्नि, वायु और आकाशरूप आवरणोंद्वारा बाहर से घिरा हुआ है | इन सबके ऊपर अहंकार का आवरण हैं | ये जल आदि आवरण उत्तरोत्तर दसगुने बड़े हैं | अहंकाररूप आवरण महत्तत्त्वमय आवरण से घिरा हुआ है ||९-१३||
महामुने ! ये सारे आवरण एक से दुसरे के क्रम से दसगुने बड़े हैं | महत्तत्त्व को भी आवृत करके प्रधान (प्रकृति) स्थित हैं | वह अनंत है; क्योंकि उसका कभी अंत नहीं होता | इसीलिये उसकी कोई संख्या अथवा माप नहीं है | मुने ! वह सम्पूर्ण जगतका कारण है | उसे ही “अपरा प्रकृति’ कहते है | उसमें ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्मांड उत्पन्न हुए है | जैसे काठ में अग्नि और तिल में तेल रहता हैं, उसीप्रकार प्रधान में स्वयंप्रकाश चेतनात्मा व्यापक पुरुष विराजमान हैं ||१४-१६||
महाज्ञान मुने ! ये संश्रयधर्मी प्रधान और पुरुष सम्पूर्ण भूतों की आत्मभूता विष्णुशक्ति से आवृत्त हैं | महामुने ! भगवान् विष्णु की स्वरुपभूता वह शक्ति ही प्रकृति और पुरुष के संयोग और वियोग में कारण है | वाही सृष्टि के समय उनमें क्षोभ का कारण बनती है | जैसे जल के सम्पर्क में आयी हुई वायु उसकी कर्निकाओं में व्याप्त शीतलता को धारण करती हैं, उसीप्रकार भगवान् विष्णु की शक्ति भी प्रकृति-पुरुषमय जगत को धारण करती है | विष्णु-शक्ति का आश्रय लेकर ही देवता आदि प्रकट होते हैं | वे भगवान् विष्णु स्वयं ही साक्षात ब्रह्म हैं, जिससे इस सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति होती है ||१७-२०||
मुनिश्रेष्ठ ! सूर्यदेव के रथ का विस्तार नौ सहस्त्र योजन है तथा उस रथ का ईषादण्ड (हरसा) इससे दूना बड़ा अर्थात अठारह हजार योजन का है | उसका धुरा डेढ़ करोड़ सात लाख योजन लंबा हैं, जिसमें उस रथ का पहिया लगा हुआ है | उसमें पूर्वान्ह, मध्यान्ह और अपरान्हरूप तीन नाभियाँ हैं | संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर और वत्सर – ये पाँच प्रकार के वर्ष उसके पाँच अरे हैं | छहों ऋतुएँ उसकी छ: नेमियाँ हैं और उत्तर – दक्षिण दो अयन उसके शरीर हैं | ऐसे संवत्सरमय रथ का दूसरा धुरा साढ़े पैंतालिस हजार योजन लंबा हैं | दोनों धुरों के परिमाण के तुल्य ही उसके युगार्द्धो का परिमाण है ||२१-२५||
उस रथ के दो धुरों में से जो छोटा है वह, और उसका युगार्द्ध ध्रुव के आधारपर स्थित है | उत्तम व्रत का पालन करनेवाले मूने ! गायत्री, बृहती, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति – ये सात छंद ही सूर्यदेव के सात घोड़े कहे गये है | सूर्यका दिखायी देना उदय हैं और उनका दृष्टी से ओझल हो जान ही अस्तकाल हैं, ऐसा जानना चाहिये | वसिष्ठ ! जितने प्रदेश में ध्रुव स्थित है, पृथ्वी से लेकर उस प्रदेश-पर्यन्त सम्पूर्ण देश प्रलयकाल में नष्ट हो जाता हैं | सप्तर्षियों से उत्तर दिशामें ऊपर की ओर जहाँ ध्रुव स्थित हैं, आकाश में वह दिव्य एवं प्रकाशमान स्थान ही विराटरूपधारी भगवान् विष्णु का तीसरा पद है | पुण्य और पाप के क्षीण हो जानेपर दोषरूपी पंक से रहित संयतचित्त माहात्माओं का यही परम उत्तम स्थान हैं | इस विष्णुपद से ही गंगा का प्राकट्य हुआ है, जो स्मरणमात्र से सम्पूर्ण पापों का नाश करनेवाली हैं ||२६-२९||
आकाश में जो शिशुमार (सूंस) – की आक्रुतिवाला ताराओं का समुदाय देखा जाता हैं, उसे भगवान् विष्णु का स्वरुप जानना चाहिये | उस शिशुमारचक्र के पुच्छभाग में ध्रुव की स्थिति है | यह ध्रुव स्वयं घूमता हुआ चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहों को घुमाता हैं | भगवान् सूर्यका वह रथ प्रतिमास भिन्न-भिन्न आदित्य-देवता, श्रेष्ठ ऋषि, गंधर्व, अप्सरा, ग्रामणी (यक्ष), सर्प तथा राक्षसों से अधिष्ठित होता है | भगवान् सूर्य ही सर्दी, गर्मी तथा जल-वर्षा के कारण हैं | वे ही ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदमय भगवान् विष्णु है; वे ही शुभ और अशुभ के कारण हैं ||३०-३२||
चंद्रमा का रथ तीन पहियों से युक्त है | उस रथ के बायें और दायें भाग में कुंद-कुसुम की भाँती श्वेत रंग के दस घोड़े जूते हुए हैं | उसी रथ के द्वारा वे चंद्रदेव नक्षत्रलोक में विचरण करते हैं | तैतीस हजार तैतीस सौ तैतीस (३३३३३) देवता चंद्रदेव की अमृतमयी कलाओं का पान करते हैं | अमावस्या के दिन ‘अमा’ नामक एक रश्मि (कला)- में स्थित हुए पितृगण चंद्रमा की बची हुई दो कलाओं में से एकमात्र अमृतमयी कला का पान करते हैं | चंद्रमा के पुत्र बुध का रथ वायु और अग्निमय द्रव्य का बना हुआ है || उसमें आठ शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं | उसी रथ से बुध आकाश में विचरण करते हैं ||३३-३६||
शुक्र के रथों में भी आठ घोड़े जुते होते है | मंगल के रथ में भी उतने ही घोड़े जोते जाते हैं | बृहस्पति और शनैश्वर के रथ भी आठ-आठ घोड़ों से युक्त हैं | राहू और केतु के रथों में भी आठ-आठ ही घोड़े जोते जाते हैं | विप्रवर ! भगवान् विष्णु का शरीरभूत जो जल हैं, उससे पर्वत और समुद्रादि के सहित कमल के समान आकारवाली पृथ्वी उत्पन्न हुई | ग्रह, नक्षत्र, तीनों लोक, नदी, पर्वत, समुद्र और वन – ये सब भगवान् विष्णु के ही स्वरुप हैं | जो है और जो नहीं है, वह सब भगवन विष्णु ही हैं | विज्ञान का विस्तार भी भगवान् विष्णु ही है | विज्ञान से अतिरिक्त किसी वस्तु की सत्ता नहीं है | भगवान् विष्णु ज्ञानस्वरूप ही हैं | वे ही परमपद हैं | मनुष्य को वही करना चाहिये, जिससे चित्तशुद्धि के द्वारा विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करके वह विष्णुस्वरूप हो जाय | सत्य एवं अनंत ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही ‘विष्णु’ हैं ||३७-४०||
जो इस भुवनकोश के प्रसंग का पाठ करेगा, वह सुखस्वरूप परमात्मपद को प्राप्त कर लेगा | अब ज्योतिषशास्त्र आदि विद्याओं का वर्णन करूँगा | उसमें विवेचित शुभ और अशुभ – सबके स्वामी भगवान् श्रीहरि ही है ||४१-४३||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘भुवनकोश का वर्णन’ नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५३||
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