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सुन्दरकाण्ड का पाठ कैसे अधिक लाभप्रद हो ?

सुन्दरकाण्ड का पाठ कैसे अधिक लाभप्रद हो ? 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ हनुमान जी और उनके सुन्दरकाण्ड ,हनुमान चालीसा ,बाहुक ,अष्टक आदि का पाठ बहुधा हिन्दू घरों में होता है या अक्सर सूना जाता है। हनुमान जी कलयुग में सर्वाधिक जाग्रत देवता माने जाते हैं और यह अमर और चिरंजीवी हैं । इनकी आराधना यदि नियमानुसार और श्रद्धा भक्ति से की जाय तो निश्चित लाभ होता ही होता है। कुछ सावधानियां और विशेष जानकारियाँ हम अपने श्रोताओं /पाठकों को इस सम्बन्ध में देने जा रहे हैं कि कैसे हनुमान जी की आराधना और सुन्दरकाण्ड का पाठ आपके लिए अधिकतम लाभप्रद हो सकता है। ऐसा क्या क्या करना चाहिए की सुन्दरकाण्ड से आपके सभी समस्याओं का निराकरण हो जाय और आपको खुशहाली प्राप्त हो ,आपका पाठ असफल न हो। हनुमान आराधना में सुन्दर काण्ड के पाठ को सदैव से विशेष स्थान दिया जाता है क्योकि इस खंड में हनुमान की अतुलनीय बुद्धि, बल, विवेक दिखाई देती है। रामचरित मानस भगवान् राम के जीवन पर आधारित है और इसमें सुन्दर काण्ड खंड भगवान हनुमान से विशेष रूप से जुडा है। सुन्दरकाण्ड के पाठ से हनुमान आराधना का विशेष और अद्वितीय लाभ होता है। इ...

अध्याय – 077 नवमी तिथि के और दशमी तिथि के व्रत

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अध्याय – 077 नवमी तिथि के और दशमी तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं भोग और मोक्ष आदि की सिद्धि प्रदान करनेवाले नवमी-सम्बन्धी व्रतों का वर्णन करता हूँ | आश्विन के शुक्लपक्ष में ‘गौरी-नवमी’ का व्रत करके देवी का पूजन करना चाहिये | इस नवमी को ‘पिष्टका-नवमी’ होती है | उसका व्रत करनेवाले मनुष्य को देवी का पूजन करके पिष्टान्न का भोजन करना चाहिये | आश्विन के शुक्लपक्ष की जिस नवमी को अष्टमी और मूलनक्षत्र का योग हो एवं सूर्य कन्या-राशिपर स्थित हों, उसे ‘महानवमी’ कहा गया हैं | वह सदा पापों का विनाश करनेवाली हैं | इस दिन नवदुर्गाओं को नौ स्थानों में अथवा एक स्थान में स्थित करके उनका पूजन करना चाहिये | मध्य में अष्टादशभुजा महालक्ष्मी एवं दोनों पार्श्व-भागों में शेष दुर्गाओं का पूजन करना चाहिये | अंजन और डमरू के साथ निम्नलिखित क्रमसे नवदुर्गाओं की स्थापना करनी चाहिये – रुद्र्चंडा, प्रचंडा, चंडोग्रा, चंड़नायिका, चंडा, चंडवती, पूज्या, चंडरूपा और अतिचंडीका | इन सबके मध्यभाग में अष्टादशभुजा उग्रचंडा महिषमर्दिनी दुर्गा का पूजन करना चाहिये | ‘ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षसि स्वाहा |’ – यह...

अध्याय – 075 अष्टमी तिथि के व्रत

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अध्याय – 075  अष्टमी तिथि के व्रत इस तिथिको उपवास करनेसे मनुष्य सात जन्मों के किये हुए पापों से मुक्त हो जाता हैं | यह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला हैं | अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं अष्टमी को किये जानेवाले व्रतों का वर्णन करूँगा | उनमें पहला रोहिणी नक्षत्रयुक्त अष्टमी का व्रत है | भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की रोहिणी नक्षत्र से युक्त अष्टमी तिथिको ही अर्धरात्रि के समय भगवान् श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था, इसलिये इसी अष्टमी को उनकी जयंती मनायी जाती है | |१-२|| अतएव भाद्रपद के कृष्णपक्ष की रोहिणी नक्षत्रयुक्त अष्टमी को उपवास रखकर भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करना चाहिये | |३|| पूजनकी विधि इसप्रकार है – आवाहन-मन्त्र और नमस्कार आवाहयाम्यहं कृष्णं बलभद्रं च देवकीम | वसुदेवं यशोदां गा: पूजयामि नमोऽस्तु ते || योगाय योगपतये योगेसहाय नमो नम: | योगादिसम्भवायैव गोविन्दाय नमो नम: || ‘मैं श्रीकृष्ण, बलभद्र, देवकी, वसुदेव, य्शोदादेवी और गौओं का आवाहन एवं पूजन करता हूँ; आप सबको नमस्कार है | योगके आदिकारण, उत्पत्तिस्थान श्रीगोविंद के लिये बारंबार नमस्कार है’ ||४-५|| तदनंतर भगवान् श्रीक...

अध्याय – 074 सप्तमी तिथिके व्रत

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अध्याय – 074  सप्तमी तिथिके व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं सप्तमी तिथि के व्रत कहूँगा | यह सबको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है | माघ मासके शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथिको (अष्टदल अथवा द्वादशदल) कमल का निर्माण करके उसमें भगवान् सूर्यका पूजन करना चाहिये | इससे मनुष्य शोकरहित हो जाता है ||१|| भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष की सप्तमी को भगवान् आदित्य का पूजन करनेसे समस्त अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है | पौषमास में शुक्लपक्ष की सप्तमी को निराहार रहकर सुर्यदेवका पूजन करनेसे सारे पापों का विनाश होता है ||२|| माघ के कृष्णपक्ष में ‘सर्वाप्ति-सप्तमी’ का व्रत करना चाहिये | इससे सभी अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है | फाल्गुन के कृष्णपक्ष में ‘नन्द-सप्तमी’ का व्रत करना चाहिये | मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष में ‘अपराजिता सप्तमी’ को भगवान् सूर्य का पूजन और व्रत करना चाहिये | एक वर्षतक मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष का ‘पुत्रीया सप्तमी’ व्रत स्रियों को पुत्र प्रदान करनेवाला है ||३-४|| इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सप्तमी के व्रतों का वर्णन’ नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ || ७४ ||

अध्याय – 074 षष्ठी तिथि के व्रत

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अध्याय – 074  षष्ठी तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – अब मैं षष्ठी सम्बन्धी व्रतों को कहता हूँ | कार्तिक के कृष्णपक्ष की षष्ठी को फलमात्र का भोजन करके कार्तिकेय लिये अर्घ्यदान करना चाहिये | इससे मनुष्य भोग और मोक्ष प्राप्त करता हैं | इसे ‘स्कन्दषष्ठी – व्रत’ कहते हैं | भाद्रपद के कृष्णपक्ष की षष्ठी तिथि में ‘अक्षयषष्ठी व्रत’ करना चाहिये | इसे मार्गशीर्ष में भी करना चाहिये | इस अक्षयषष्ठी के दिन किसी भी एक वर्ष निराहार रहनेसे मानव भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता हैं ||१-२|| इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘षष्ठी के व्रतों का वर्णन’ नामक त्रेहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ||

अध्याय – 073 पंचमी तिथि के व्रत

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अध्याय – 073  पंचमी तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं आरोग्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाले पंचमी-व्रत का वर्णन करता हूँ | श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक के शुक्लपक्ष की पंचमी को वासुकि, तक्षक, कालिय, मणिभद्र, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक और धनंजय नामक नागों का पूजन करना चाहिये ||१-२|| ये सभी नाग अभय, आयु, विद्या, यश और लक्ष्मी प्रदान करनेवाले हैं ||३|| इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पंचमी के व्रतों का वर्णन’ नामक बहात्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ||

अध्याय – 071 चतुर्थी तिथि के व्रत

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अध्याय – 071  चतुर्थी तिथि के व्रत अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं आपके सम्मुख भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले चतुर्थी सम्बन्धी व्रतों का वर्णन करता हूँ | माघ के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को उपवास करके गणेश का पूजन करे | तदनंतर पंचमी को तिलका भोजन करे | ऐसा करनेसे मनुष्य बहुत वर्षोतक विघ्नरहित होकर सुखी रहता हैं | ‘गं स्वाहा |’ – यह मूलमंत्र हैं | ‘गां नम: |’ आदि से हरदयादिका न्यास करे ||१-२|| गां ह्रदयाय नम: | गीं शिरसे स्वाहा | गूं शिखायै वषट | गै नेत्रत्रयाय वौषट | गौ कवचाय हुम् | ग:अस्त्राय फट | ‘आगच्छोल्काय’ कहकर गणेशका आवाहन और ‘गच्छोल्काय’ कहकर विसर्जन करे | इसप्रकार आदिमें गकारयुक्त और अंत में ‘उल्का’ शब्दयुक्त मन्त्र से उनके आवाहनादि कार्य करे | ग्न्धादि उपचारों एवं लड्डूओं आदिद्वारा गणपति का पूजन करे ||३|| तदनन्तर निम्नलिखित गणेश गायत्रीका जप करे – ॐ महोल्काय विद्महे वक्रतुण्डायधीमहि | तन्नो दन्ती प्रचोदयात || भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को व्रत करनेवाला शिवलोक को प्राप्त करता हैं | ‘अंगारक-चतुर्थी’ (मंगलवारसे युक्त चतुर्थी) को गणेश का पूजन करके मनुष्य सम्पूर्...