अध्याय – 064 संन्यासी के धर्म
अध्याय – 064
संन्यासी के धर्म
पुष्कर कहते हैं – अब मैं ज्ञान और मोक्ष आदि का साक्षात्कार करानेवाले संन्यास-धर्म का वर्णन करूँगा | आयुके चौथे भागमें पहुँचकर, सब प्रकार के संग से दूर हो संन्यासी हो जाय | जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन घर छोडकर चल दे – संन्यास ले ले | प्राजापत्य इष्टि (यज्ञ) करके सर्वस्व की दक्षिणा दे दे तथा आहवनीयादि अग्नियों को अपने-आपमें आरोपित करके ब्राह्मण घरसे निकल जाय | संन्यासी सदा अकेला ही विचरे | भोजन के लिये ही गाँव में जाय | शरीर के प्रति उपेक्षाभाव रखे | अन्न आदिका संग्रह न करे | मननशील रहे | ज्ञान-सम्पन्न होवे | कपाल (मिट्टी आदिका खप्पर) ही भोजनपात्र हो, वृक्ष की जद ही निवास-स्थान हो, लँगोटी के लिये मैला-कुचैला वस्त्र हो, साथमें कोई सहाय्यक न हो तथा सबके प्रति समता का भाव हो – यह जीवन्मुक्त पुरुष्का लक्षण हैं | न तो मरनेकी इच्छा करे, न जीने की – जीवन और मृत्यु में से किसी का अभिनंदन न करे ||१-५||
जैसे सेवक अपने स्वामीकी आज्ञा की प्रतीक्षा करता हैं, उसीप्रकार वः प्रारब्धवश प्राप्त होनेवाले काल (अन्तसमय) की प्रतीक्षा करता रहे | मार्गपर दृष्टिपात करके पाँव रखे अर्थात रास्ते में कोई कीड़ा-मकोड़ा, हड्डी, केश आदि तो नहीं हैं, यह भलीभाँति देखकर पैर रखे | पानीको क्प्देसे छानकर पीये | सत्यसे पवित्र की हुई वाणी बोले | मनसे दोष गुण का विचार करके कोई कार्य करे | लौकी, काठ, मिट्टी तथा बाँस – ये ही संन्यासी के पात्र है | जब गृहस्थ के घरसे धुआँ निकलना बंद हो गया हो, मुसल रख दिया गया हो, आग बुझ गयी हो, घरके सब लोग भोजन कर चुके हों और जुंठे शराव (मिट्टी के प्याले) फेंक दिये गये हों, ऐसे समय में संन्यासी प्रतिदिन भिक्षा के लिये जाय | भिक्षा पाँच प्रकार की मानी गयी है – मधुकरी (अनेक घरों से थोडा-थोडा अन्न माँग लाना), असंक्लपत (जिसके विषय में पहलेसे कोई संकल्प या निश्चय न हो ऐसी भिक्षा), प्राक्प्रणीत (पहलेसे तैयार रखी हुई भिक्षा), अयाचित (बिना माँगे जो अन्न प्राप्त हो जाय, वह) और तत्काल उपलब्ध (भोजन के समय स्वत:प्राप्त) | अथवा करपात्री होकर रहे – अर्थात हाथही में लेकर भोजन करे और हाथमे ही पानी पीये | दूसरे किसी पात्रका उपयोग न करे | पात्र से अपने हाथरूपी पात्र में भिक्षा लेकर उसका उपयोग करे | मनुष्यों की कर्मदोषसे प्राप्त होनेवाली यमयातना और नरकपात आदि गतिका चिन्तन करे ||६-१०||
जिस किसी भी आश्रम में स्थित रहकर मनुष्यको शुद्धभाव से आश्रमोचित धर्म का पालन करना चाहिये | सब भूतों में समान भाव रखे | केवल आश्रम-चिन्ह धारण कर लेना ही धर्म का हेतु नहीं हैं | (उस आश्रम के लिये विहित कर्तव्य का पालन करने से ही धर्म का अनुष्ठान होता है ) निर्मली का फल यद्यपि पानी में पड़नेपर उसे स्वच्छ बनानेवाला है, तथापि केवल उसका नाम लेनेमात्र से जल स्वच्छ नहीं हो जाता | इसीप्रकार आश्रम के लिंग धारणमात्र से लाभ नहीं होता, विहित धर्मका अनुष्ठान करना चाहिये | अज्ञानवश संसार-बंधन में बंधा हुआ द्विज लंगड़ा, लूला, अन्धा और बहरा क्यों न हो, यदि कुटिलता रहित संन्यासी हो जाय तो वह स्त और असत – सबसे मुक्त हो जाता है | संन्यासी दिन या रात में बिना जाने जिन जीवों की हिंसा करता है, उनके वधरूप पापसे शुद्ध होने के लिये वह स्नान करके छ: बार प्राणायाम करे | यह शरीररूपी गृह ह्द्दीरुपी खंभोंसे युक्त है, नाड़ीरूप रस्सियों से बंधा हुआ है, मांस तथा रक्त से लिपा हुआ एयर चमड़े से छाया गया है | यह मल और मूत्र से भरा हुआ होनेके कारण अत्यंत दुर्गन्धपूर्ण है | इसमें बुढापा तथा शोक व्याप्त है ||११-१६||
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरीका अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह न रखना ) – ये पाँच ‘यम’ है | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर की आराधना – ये पाँच ‘नियम’ है | योगयुक्त संन्यासी के लिये इन सबका पालन आवश्यक है | पद्मासन आदि आसनों से उसको बैठना चाहिये ||१७-२०||
‘यह आत्मा [परब्रह्म है; ब्रह्म- सत्य, ज्ञान और अनंत है; ब्रह्म विज्ञानमय तथा आनंदस्वरूप हैं; वह ब्रह्म तू है; वह ब्रह्म मैं हूँ; परब्रह्म परमात्मा प्रकाशस्वरूप है; वही आत्मा हैं, वासुदेव हैं, नित्यमुक्त हैं; वही ‘ॐ’ शब्दवाच्य सच्चीदानंदघन ब्रह्म है; देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकार से रहित तथा जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदिसे मुक्त जो तुरीय तत्त्व है, वही ब्रह्म है; वह नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरुप हैं; सत्य, आनंदमय तथा अद्वैतरूप हैं; सर्वत्र व्यापक अविनाशी ज्योति:स्वरुप परब्रह्म ही श्रीहरि है और वह मैं हूँ; आदित्यमंडल में जो वह ज्योतिर्मय पुरुष हैं, वह अखंड प्रणववाच्य परमेश्वर मई हूँ’ = इसप्रकार का सहज बोध ही ब्रह्म में स्थिति का सूचक है ||२५-२८||
जो सब प्रकार के आरम्भ का त्यागी है – अर्थात जो फलासक्ति एवं अहंकारपूर्वक किसी कर्म का आरम्भ नहीं करता – कर्तुत्वाभिमान से शून्य होता है, दुःख-सुख में समान रहता है, सबके प्रति क्षमाभाव रखनेवाला एवं सहनशील होता हैं, वह भावशुद्ध ज्ञानी मनुष्य ब्रह्माण्ड का भेदन करके साक्षात ब्रह्म हो जाता है | यति को चाहिये कि वह आषाढ़ की पूर्णिमा को चातुर्मास्यव्रत प्रारम्भ करे | फिर कार्तिक शुक्ला नवमी आदि तिथियों से विचरण करे | ऋतुओं की संधि के दिन मुंडन करावे | संन्यासियों के लिये ध्यान तथा प्राणायाम ही प्रायश्चित्त है ||२९-३१||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘यतिधर्मका वर्णन’ नामक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ||६४||
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