अध्याय – 059 आचार का वर्णन
अध्याय – 059
आचार का वर्णन
पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! प्रतिदिन प्रात:काल ब्राह्ममुहूर्त में उठकर श्रीविष्णु आदि देवताओं का स्मरण करे | दिनमें उत्तर की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग करना चाहिये, रात में द्क्षिनाभिमुख होकर करना उचित है और दोनों संध्याओं में दिन की ही भाँती उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्र का त्याग करना चाहिये | मार्ग आदि पर, जलमें तथा गली में भी कभी मलादि का त्याग न करे | सदा तिनकों से पृथ्वी को ढककर उसके ऊपर मल-त्याग करे | मिट्टी से हाथ-पैर आदि की भलीभाँति शुद्धि करके, कुल्ला करने के पश्चात दंतधावन करे | नित्य, नैमित्तिक, कामी, क्रियांग, मलकर्षण तथा क्रिया-स्नान – ये छ: प्रकार के स्नान बताये गये हैं | जो स्नान नहीं करता, उसके सब कर्म निष्फल होते हैं; इसलिये प्रतिदिन प्रात:काल स्नान करना चाहिये ||१-४||
कुएँ से निकाले हुए जलकी अपेक्षा भूमिपर स्थित जल पवित्र होता है | उससे पवित्र झरने का जल, उससे भी पवित्र सरोवर का जल तथा उससे भी पवित्र नदी का जल बताया जाता है | तीर्थ का जल उससे भी पवित्र होता है और गंगा का जल तो सबसे पवित्र माना गया है | पहले जलाशय में गोता लगाकर शरीरका मेल धो डाले | फिर आचमन करके जलसे मार्जन करे | ‘हिरण्यवर्णा:’ आदि तीन ऋचाएँ, ‘शं नो देवीरभिष्टये’ (यजु. ३६/१२) यह मन्त्र, ‘आपो हि ष्ठा’ (यजु, ३६/१४-१६) आदि तीन ऋचाएँ तथा ‘इदमाप:’ (यजु.६/१७) यह मन्त्र – इन सबसे मार्जन किया जाता हैं | तत्पश्चात जलाशय में डुबकी लगाकर जल के भीतर ही जप करे | उसमें अघमर्षण सूक्त अथवा ‘द्रुपदादिव‘ (यजु.२०/२०) मन्त्र, या ‘युश्वते मन:’ (यजु.५/१४) आदि सूक्त अथवा ‘सहस्त्रशीर्षा’ (यजु, अ.३१) आदि पुरुष-सूक्त का जप करना चाहिये | विशेषत: गायत्री का जप करना उचित है | अघमर्षणसूक्त में भाववृत्त देवता और अघमर्षण ऋषि हैं | उसका छंद अनुष्टुप हैं | उसके द्वारा भाववृत्त (भक्तिपूर्वक वरण किये हुए) श्रीहरि का स्मरण होता है | तदनंतर वस्त्र बदलकर भीगी धोती निचोड़ने के पहले ही देवता और पितरों का तर्पण करे ||५-११||
फिर पुरुषसूक्त (यजु.अ.३१) के द्वारा जलांजलि दे | उसके बाद अग्निहोत्र करे | तत्पश्चात अपनी शक्ति के अनुसार दान देकर योगक्षेम की सिद्धि के लिये परमेश्वर की शरण जाय | आसन, शय्या, सवारी, स्त्री, सन्तान और कमण्डलु – ये वस्तुएँ अपनी ही हों, तभी अपने लिये शुद्ध मानी गयी है; दूसरों की उपर्युक्त वस्तुएँ अपने लिये शुद्ध नहीं होती | राह चलते समय यदि सामनेसे कोई ऐसा पुरुष आ जाय, जो भार से लदा हुआ कष्ट पा रहा हो, तो स्वयं हटकर उसे जाने के लिये मार्ग दे देना चाहिये | इसीप्रकार गर्भिणी स्त्री तथा गुरुजनों को भी मार्ग देना चाहिये ||१२-१४||
उदय और अस्त के समय सूर्य की ओर न देखे | जलमें भी उनके प्रतिबिम्ब की ओर दृष्टिपात न करे | नंगी स्त्री, कुआँ, हत्या के स्थान और पापियों को न देखे | कपास (रुई), हड्डी, भस्म तथा घृणित वस्तुओं को न लाँघे | दूसरे के अंत:पुर और खजानाघर में प्रवेश न करे | दूसरे के दूत का काम न करे | टूटी-फूटी नाव,वृक्ष और पर्वतपर न चढ़े | अर्थ, गृह और शास्त्रों के विषय में कौतुहल रखे | ढेला फोड़ने, तिनके तोड़ने और नख चबानेवाला मनुष्य नष्ट हो जाता है | मुख आदि अंगों को न बजावे | रात को दीपक लिये बिना कहीं न जाय | दरवाजे के सिवा और किसी मार्ग से घरमें प्रवेश न करे | मुँह का रंग न बिगाड़े | किसीकी बातचीत में बाधा न डाले तथा अपने वस्त्र को दुसरेके वस्त्र से न बदले |’कल्याण हो, कल्याण हो’ – यही बात मुँह से निकाले; कभी किसीके अनिष्ट होने की बात न कहे | पलाश के आसन को व्यवहार में न लावे | देवता आदिकी छाया से हटकर चले ||१५-२०||
दो पूज्य पुरुषों के बीच से होकर न निकले | जूठे मुँह रहकर तारा आदि की ओर दृष्टी न डाले | एक नदीमें जाकर दूसरी नदी का नाम न लें | दोनों हाथों से शरीर न खुज्लावे | किसी नदीपार पहुँचने के बाद देवता और पितरों का तर्पण किये बिना उसे पार न करे | जल में मल आदि न फेंके | नंगा होकर न नहाये | योगक्षेम के लिये परमात्मा की शरण में जाय | माला को पाने हाथ से न हटाये | गदहे आदि की धुलसे बचे | नीच पुरुषों को कष्ट में देखकर कभी उनका उपहास न करे | उनके साथ अनुपयुक्त स्थानपर निवास न करे | वैद्य, राजा और नदीसे हिन् देश में न रहे | जहाँ के स्वामी म्लेच्छ, स्त्री तथा बहुत-से मनुष्य हों, उस देशमें भी न निवास करे | रजस्वला आदि तथा पतितों के साथ बात न करे | सदा भगवान विष्णु का स्मरण करे | मुँह के ढके बिना न जोर से हँसे. न जँभाई ले और न छीकें ही ||२१-२५||
विद्वान पुरुष स्वामी के तथा अपने अपमान की बातको गुप्त रखे | इन्द्रियों के सर्वथा अनुकूल न चले-उन्हें अपने वशमें किये रहे | मल-मूत्र के वेग को न रोके | परशुरामजी ! छोटे-से भी रोग या शत्रु की उपेक्षा न करे | सड़क लाँघकर आने के बाद सदा आचमन करे | जल और अग्नि को धारण न करे | कल्याणमय पूज्य पुरुष के प्रति कभी हुँकार न करे | पैर को पैर से न दबावे | प्रत्यक्ष या परोक्ष में किसीकी निंदा न करे | वेद, शास्त्र, राजा, ऋषि और देवताकी निंदा करना छोड़ दे | स्त्रियों के प्रति ईर्ष्या न रखें तथा उनका कभी विश्वास भी न करे | धर्म का श्रवण तथा देवताओं से प्रेम करे | प्रतिदिन धर्म आदिका अनुष्ठान करे | जन्म-नक्षत्र के दिन चंद्रमा, ब्राह्मण तथा देवता आदि की पूजा करे | षष्ठी, अष्टमी और चतुर्दशी को तेल या उबटन न लगावे | घरसे दूर जाकर मल-मूत्र का त्याग करे | उत्तम पुरुषों के साथ कभी वैर-विरोध न करे ||२६-३१||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘आचारका वर्णन’ नामक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५९||
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