अध्याय – 077 नवमी तिथि के और दशमी तिथि के व्रत

अध्याय – 077
नवमी तिथि के और दशमी तिथि के व्रत
अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं भोग और मोक्ष आदि की सिद्धि प्रदान करनेवाले नवमी-सम्बन्धी व्रतों का वर्णन करता हूँ | आश्विन के शुक्लपक्ष में ‘गौरी-नवमी’ का व्रत करके देवी का पूजन करना चाहिये | इस नवमी को ‘पिष्टका-नवमी’ होती है | उसका व्रत करनेवाले मनुष्य को देवी का पूजन करके पिष्टान्न का भोजन करना चाहिये | आश्विन के शुक्लपक्ष की जिस नवमी को अष्टमी और मूलनक्षत्र का योग हो एवं सूर्य कन्या-राशिपर स्थित हों, उसे ‘महानवमी’ कहा गया हैं | वह सदा पापों का विनाश करनेवाली हैं | इस दिन नवदुर्गाओं को नौ स्थानों में अथवा एक स्थान में स्थित करके उनका पूजन करना चाहिये | मध्य में अष्टादशभुजा महालक्ष्मी एवं दोनों पार्श्व-भागों में शेष दुर्गाओं का पूजन करना चाहिये | अंजन और डमरू के साथ निम्नलिखित क्रमसे नवदुर्गाओं की स्थापना करनी चाहिये –
रुद्र्चंडा, प्रचंडा, चंडोग्रा, चंड़नायिका, चंडा, चंडवती, पूज्या, चंडरूपा और अतिचंडीका |
इन सबके मध्यभाग में अष्टादशभुजा उग्रचंडा महिषमर्दिनी दुर्गा का पूजन करना चाहिये | ‘ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षसि स्वाहा |’ – यह दशाक्षर मन्त्र हैं ||१-६||

जो मनुष्य इस विधिसे पूर्वोक्त दशाक्षर मन्त्र का जप करता हैं, वह किसीसे भी बाधा नहीं प्राप्त करता | भगवती दुर्गा अपने वाम करों में कपाल, खेटक, घंटा, दर्पण, तर्जनी-मुद्रा, धनुष, ध्वजा, डमरू और पाश एवं दक्षिण करों में शक्ति, मुद्गर, त्रिशूल, वज्र, खड्ग, भाला, अंकुश, चक्र तथा शलाका लिये हुए हैं | उनके इन आयुधों की भी अर्चना करे ||७-१०||

फिर ‘कालि कालि’ आदि मंत्रका जप करके खड़ग से पशु का वध करे | पशुबलि का मन्त्र – ‘कालि कालि वज्रेश्वरी लोहदंडायै नम: |’ बलि पशुका रुधिर और मांस, ‘पूतनाय नम: |’ कहकर नैऋत्यकोण में, ‘पापराक्षस्यै नम: |’ कहकर वायव्यकोण में, ‘चरक्यै नम: |’ कहकर ईशानकोण में एवं ‘विदारिकायै नम: |’ कहकर अग्निकोण में उनके उद्देश्य से समर्पित करे | राजा उसके सम्मुख स्नान करे और स्कन्द एवं विशाख के निमित्त पिष्टनिर्मित शत्रु की बलि दे | रात्रि में ब्राह्मी आदि शक्तियों का पूजन करे –
जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री, स्वाहा और स्वधा – इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके ! तुम्हें मेरा नमस्कार हो |’ आदि मन्त्रोंसे देवी की स्तुति करे और देवी को पंचामृत से स्नान कराके उनकी विविध उपचारों से पूजा करे | देवी के उद्देश्य से किया हुआ ध्वजदान, रथयात्रा एवं बलिदान-कर्म अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति करानेवाला हैं ||११-१५||
दशमी तिथि के व्रत

अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं दशमी-सम्बन्धी व्रत के विषय में कहता हूँ, जो धर्म-कामादि की सिद्धि करनेवाला है | दशमी को एक समय भोजन करे और व्रत के समाप्त होनेपर दस गौओं और स्वर्णमयी प्रतिमाओं का दान करे | ऐसा करनेसे मनुष्य ब्राह्मण आदि चारों वर्णों का अधिपति होता है ||१||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नवमी और दशमी के विविधव्रतों का वर्णन’ नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ || ७७ ||

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