अध्याय – 052 जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमि के विस्तार का वर्णन
अध्याय – 052
जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमि के विस्तार का वर्णन
अग्निदेव कहते हैं – जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन हैं | वह सब ओरसे एक लाख योजन विस्तृत खारे पानी के समुद्रसे घिरा है | उस क्षारसमुद्र को घेरकर प्लक्षद्वीप स्थित है | मेधातिथि के सात पुत्र प्लक्षद्वीप के स्वामी हैं | शांतभय, शिशिर, सुखोदय, आनंद, शिव, क्षेम तथा ध्रुव – ये सात ही मेधातिथि के पुत्र हैं; उन्हीं के नामसे उक्त सात वर्ष हैं | गोमेध, चंद्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और शैल – ये उन वर्षों के सुंदर मर्यादापर्वत है | वहाँ के सुंदर निवासी ‘वैभ्राज’ नामसे विख्यात हैं | इस द्वीप में सात प्रधान नदियाँ हैं | प्लक्षसे लेकर शाकद्वीप तक के लोगों की आयु पाँच हजार वर्ष है | वहाँ वर्णाश्रम-धर्म का पालन किया जाता हैं ||१-५||
आर्य, कुरु, विविंश तथा भावी – यही वहाँ के ब्राह्मण आदि वर्णों की संज्ञाएँ हैं | चंद्रमा उनके आराध्यदेव हैं | प्लक्षद्वीप का विस्तार दो लाख योजन हैं | वह उतने ही बड़े इक्षुरस के समुद्र से घिरा है | उसके बाद शाल्मलद्वीप हैं, जी प्लक्षद्वीप से दुगुना बड़ा हैं | वपुष्मान के सात पुत्र शाल्मलद्वीप के स्वामी हुए | उनके नाम है – श्वेत, हरित, जीमूत, लोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ | इन्हीं नामों से वहाँ के सात वर्ष हैं | वह प्लक्षद्वीप से दुगुना हैं तथा उससे दुगुने परिमाणवाले ‘सुरोद’ नामक (मदिराके)समुद्रसे घिरा हुआ है | कुमुद, अनल, बलाहक, द्रोण, कंक, महिष और कुकुद्यान – ये मर्यादापर्वत हैं | सात ही वहाँ प्रधान नदियाँ है | कपिल, अरुण, पीत और कृष्ण – ये वहाँ के ब्राह्मण आदि वर्ण है | वहाँ के लोग वायु-देवता की पूजा करते हैं | वह मदिरा के समुद्र से घिरा है ||६-१०||
इसके बाद कुशद्वीप है | ज्योतिष्मान के पुत्र उस द्वीप के अधीश्वर हैं | उद्भिद, धेनुमान, द्वैरथ, लंबन, धैर्य, कपिल और प्रभाकर – ये सात उनके नाम हैं | इन्हीं के नामपर वहाँ सात वर्ष हैं | दमी आदि वहाँ के ब्राह्मण है, जो ब्रह्मरूपधारी भगवान् विष्णु का पूजन करते हैं | विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान, पुष्पवान, कुशेशय, हरि और मंदराचल – ये सात वहाँ के वर्षापर्वत हैं | यह कुशद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले घी के समुद्र से घिरा हुआ है और वह घृतसमुद्र क्रौंचद्वीप के परिवेष्टित है | राजा द्युतिमान के पुत्र क्रौंचद्वीप के स्वामी हैं | उन्हीं के नामपर वहाँ के वर्ष प्रसिद्ध हैं ||११-१४||
कुशल, मनोनुग, उष्ण, प्रधान, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि – ये सात द्युतिमान के पुत्र हैं | उस द्वीप के मर्यादापर्वत और नदियाँ भी सात ही है | पर्वतों के नाम इसप्रकार हैं – क्रौंच, वामन, अन्धकारक, रत्नशैल, देवावृत, पुंडरिक और दुन्दुभि | ये द्वीप परस्पर उत्तरोत्तर दुगुने विस्तारवाले हैं | उन द्वीपों में जो वर्ष पर्वत हैं, वे भी द्वीपों के समान ही पूर्ववर्ती द्वीप के पर्वतों से दुगुने विस्तारवाले हैं | वहाँ के ब्राह्मण आदि वर्ण क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य और तिथ्य – इन नामों से प्रसिद्ध हैं | वे वहाँ श्रीहरि की आराधना करते हैं | क्रौंचद्वीप दधिमंदोदक (मट्ठे) – के समुद्र से घिरा हुआ है और वह समुद्र शाकद्वीप से परिवेष्टित है | वहाँ के राजा भव्य के जो सात पुत्र हैं, वे ही शाकद्वीप शासक हैं | उनके नाम इसप्रकार हैं – जलद, कुमार, सुकुमार, मणीवक्र, कुशोत्तर, मोदाकी और द्रुम | इन्ही के नामसे वहाँ के वर्ष प्रसिद्ध हैं ||१५-१९||
उदयगिरि, जलधर, रैवत, श्याम, कोद्र्क, आम्बिकेय और सुरम्य पर्वत केसरी – ये सात वहाँ के मर्यादापर्वत हैं तथा सात ही वहाँ की प्रसिद्ध नदियाँ हैं | मग, मगध, मानस्य और मन्दग – ये वहाँ के ब्राह्मण आदि वर्ण हैं, जो सूर्यरूपधारी भगवान् नारायण की आराधना करते हैं | शाकद्वीप क्षीरसागर से घिरा हुआ है |क्षीरसागर पुष्करद्वीप से परिवेष्टित हैं | वहाँ के अधिकारी राज सवन के दो पुत्र हुए, जिनके नाम थे – महावीत और धातकि | उन्हीने नामसे वहाँ के दो वर्ष प्रसिद्ध हैं ||२०-२२||
वहाँ एक ही मानसोत्तर नामक वर्षपर्वत विद्यमान हैं, जो उस वर्ष के मध्यभाग में वलयाकार स्थित हैं | उसका विस्तार कई सहस्र योजन हैं | ऊँचाई भी विस्तार के समान ही है | वहाँ के लोग दस हजार वर्षोतक जीवन धारण करते हैं | वहाँ देवता लोग ब्रह्माजी की पूजा करते हैं | पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले समुद्र से घिरा हुआ है | उस समुद्र का विस्तार उस द्वीप के समान ही है | महामुने ! समुद्रों से जो जल हैं, वह कभी घटता – बढ़ता नहीं हैं | शुक्ल और कृष्ण – दोनों पक्षों में चंद्रमा के उदय और अस्तकाल में केवल पाँच सौ दस अंगुलयुक्त समुद्र के जल का घटना और बढ़ना देखा जाता है (परन्तु इससे जलमें न्यूनता या अधिकता नहीं होती हैं ) ||२३-२६||
मीठे जलवाले समुद्र के चारों ओर उससे दुगुने परिमाणवाली भूमि सुवर्णमयी हैं, किन्तु वहाँ कोई भी जीव-जन्तु नहीं रहते हैं | उसके बाद लोकालोकपर्वत हैं, जिसका विस्तार दस हजार योजन हैं | लोकालोकपर्वत एक ओर से अन्धकारद्वारा आवृत है और वह अन्धकार अंडकटाह से आवृत है | अंडकटाहसहित साड़ी भूमिका विस्तार पचास करोड़ योजन हैं ||२७-२८||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘महाद्वीप आदि का वर्णन’ नामक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५२ ||
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