अध्याय – 070 तृतीया तिथि के व्रत
अध्याय – 070
तृतीया तिथि के व्रत
अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं आपके सम्मुख तृतीया तिथि को किये जानेवाले व्रतों का वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं | ललितातृतीया को किये जानेवाले मुलगौरी सम्बन्धी (सौभाग्यशयन) व्रत को सुनिये ||१||
चैत्र के शुक्लपक्ष की तृतीया को ही पार्वती का भगवान् शिव के साथ विवाह हुआ था | इसलिये इस दिन तिलमिश्रित जलसे स्नान करके पार्वतीसहित भगवान् शंकर की स्वर्णाभूषण और फल आदिसे पूजा करनी चाहिये ||२||
‘नमोऽस्तु पाटलायै’ (पाटला देवी को नमस्कार) – यह कहकर पार्वतीदेवी और भगवान् शंकर के चरणों का पूजन करे | ‘शिवाय नम:‘ और ‘जयायै नम:’ (जयाको नमस्कार) – यों कहकर गौरी देवी की अर्चना करे | ‘त्रिपुरघ्याय रुद्राय नम:’ (त्रिपुरविनाशक रुद्रदेव को नमस्कार) – तथा ‘भवान्यै नम:’ (भवानी को नमस्कार) – यह कहकर क्रमशः शिव-पार्वती की दोनों जंघाओं का और ‘रुद्रायेश्वराय नम:’ (सबके ईश्वर रुद्रदेव को नमस्कार है ) एवं ‘विजयायै नम:’ )विजयाको नमस्कार) यह कहकर क्रमशः शंकर और पार्वती के घुटनों का पूजन करे | ‘ईशायै नम:’ (सर्वेश्वरी को नमस्कार) यह कहकर देवी के और ‘शंकराय नम:’ – ऐसा कहकर शंकर के कटिभाग की पूजा करे | ‘सर्वात्मने नम:’ )सर्वात्मा शिवको नमस्कार कहकर पूजा का उपसंहार करे ||३-११||
शिव की पूजा के लिए ये पुष्प क्रमशः चैत्रादि मासों में ग्रहण करनेयोग्य बताये गये हैं – मल्लिका, अशोक, कमल, कुंद, तगर, मालती, कदम्ब, कनेर, नीले रंगका सदाबहार, अम्लान (आँ बोली), कुंकुम और सेंधुवार ||१२-१३||
उमा-महेश्वर का पूजन करके उनके सम्मुख अष्ट सौभाग्य द्रव्य रख दे | घृतमिश्रित निष्पाव (एक द्विदल), कुसुम्भ (केसर), दुग्ध, जीवक (एक ओषधिविशेष), दुर्वा, ईख, नमक और कुस्तुम्बुरु (धनियाँ) – ये अष्ट सौभाग्य द्रव्य हैं | चैत्रमास में पहाड़ों के शिखरों का (गंगा आदिका) जलपान करके रुद्रदेव और पार्वतीदेवी के आगे शयन करे | प्रात:काल स्नान करके गौरी-शंकर का पूजन कर ब्राह्मण-दम्पतीकी अर्चना करे और वह अष्ट सौभाग्य द्रव्य ‘ललिता प्रीयतां मम |’ (ललिता मुझपर प्रसन्न हों) – ऐसा कहकर ब्राह्मण को दे ||१४-१६||
व्रत करनेवाले को चैत्रादि मासों में व्रत के दिन क्रमशः यह आहार करना चाहिए – चैत्र में श्रुंगजल (झरने का जल), वैशाख में गोबर, जेष्ठ में मन्दार (आक) का पुष्प, आषाढ़ में बिल्वपत्र, श्रावण में कुशजल, भाद्रपद में दही, आश्विन में दुग्ध, कार्तिक में घृतमिश्रित दधि, मार्गशीर्ष में गोमूत्र, पौष में घृत, माघ में काले तिल और फाल्गुन में पंचगव्य | ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा, वासुदेवी, गौरी, मंगला, कमला और सती – चैत्रादि मासों में सौभाग्याष्टक के दान के समय उपर्युक्त नामों का ‘प्रीयातां मम’ से संयुक्त करके उच्चारण करे | व्रत के पूर्ण होनेपर किसी एक फल का सदा के लिए त्याग कर दे तथा गुरुदेव को तकियों से युक्त शय्या, उमा-महेश्वर की स्वर्णनिर्मित प्रतिमा एवं गौसहित वृषभका दान करे | गुरु और ब्राह्मण दम्पतिका वस्त्र आदिसे सत्कार करके साधक भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त कर लेता हैं | इस ‘सौभाग्यशयन’ नामक व्रत के अनुष्ठान से मनुष्य सौभाग्य, आरोग्य, रूप और दीर्घायु प्राप्त करता है ||१७-२१||
यह व्रत भाद्रपद, वैशाख और मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष की तृतीया को भी किया जा सकता है | इसमें ‘ललितायै नम:’ इसप्रकार कहकर पार्वती को पूजन करे | तदनन्तर व्रत की समाप्ति के समय प्रत्येक पक्ष में ब्राह्मण दम्पति की पूजा करनी चाहिये | उनकी चौबीस वस्त्र आदिसे अर्चना करके मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त कर लेता हैं | सौभाग्यशयन’ की यह दूसरी विधि बतायी गयी | अब मैं ‘सौभाग्यव्रत’ के विषय में कहता हूँ | फाल्गुन आदि मासों में शुक्लपक्ष की तृतीया को व्रत करनेवाला नमक का परित्याग करे | व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मण दम्पति का पूजन करके ‘भवानी प्रीयताम |’ कहकर शय्या और सम्पूर्ण सामग्रियों से युक्त गृह का दान करे | यह ‘सौभाग्य तृतीया’ व्रत कहा गया, जो पार्वती आदि के लोकों को प्रदान करनेवाला हैं | इसीप्रकार माघ, भाद्र्पर और वैशाख की तृतीया को व्रत करना चाहिये ||२२-२६||
चैत्र में ‘दमनक-तृतीया’ का व्रत करके पार्वती की ‘दमनक; नामक पुष्पों से पूजन करनी चाहिये | मार्गशीर्ष में ‘आत्म-तृतीया’ का व्रत किया जाता हैं | इसमें पार्वती का पूजन करके ब्राह्मण को इच्छानुसार भोजन करावे | मार्गशीर्ष की तृतीया से आरम्भ करके, क्रमशः पौष आदि मासों में उपर्युक्त व्रत का अनुष्ठान करके निम्नलिखित नामों को ‘प्रीयताम’ से संयुक्त करके, कहे – गौरी, काली, उमा, भद्रा, दुर्गा, कान्ति, सरस्वती, वैष्णवी, लक्ष्मी, प्रकृति, शिवा और नारायणी | इसप्रकार व्रत करनेवाला सौभाग्य और स्वर्ग को प्राप्त करता है ||२७-२८||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘तृतीया के व्रतों का वर्णन’ नामक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ||७०||
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