अध्याय – 067 प्रतिपदा तिथि के व्रत
अध्याय – 067
प्रतिपदा तिथि के व्रत
अग्निदेव कहते हैं – अब मैं आपसे प्रतिपद आदि तिथियों के व्रतों का वर्णन करूँगा, जो सम्पूर्ण मनोरथों को देनेवाले हैं | कार्तिक, आश्विन और चैत्र मास में कृष्णपक्ष की प्रतिपद ब्रहमाजी की तिथि है | पूर्णिमा को उपवास करके प्रतिपद को ब्रह्माजी का पूजन करे | पूजा ‘ॐ तत्सदब्रह्मणे नम: |’ – इस मंत्रसे अथवा गायत्री-मंत्रसे करनी चाहिये | यह व्रत एक वर्षतक करे | ब्रह्माजी के सुवर्णमय विग्रह का पूजन करे, जिसके दाहिने हाथों में स्फटिकाक्ष की माला और स्त्रुवा हो तथा बाये हाथों में स्त्रुक एवं कमण्डलु हो | साथ ही लंबी दाढ़ी और सिरपर जटा भी हो | यथाशक्ति दूध चढ़ावे और मनमें यह उद्देश्य रखे कि ‘ब्रह्माजी मुझपर प्रसन्न हो |’ यों करनेवाला मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्ग में उत्तम भोग भोगता हैं और पृथ्वीपर धनवान ब्राह्मण के रूपमें जन्म होता है ||१-४||
अब ‘धन्यव्रत’ का वर्णन करता हूँ | इसका अनुष्ठान करने से अधन्य भी धन्य हो जाता है | पहले मार्गशीर्ष मास की प्रतिपद को उपवास करके रातमें ‘अग्नये नम: |’ – इस मंत्रसे होम और अग्नि की पूजा करे | इसीप्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मास की प्रतिपद को अग्निकी आराधना करने से मनुष्य सब सुखों का भागी होता है |
प्रत्येक प्रतिपदाको एकभुक्त (दिन में एक समय भोजन करके) रहे | सालभर में व्रत की समाप्ति होनेपर ब्राह्मण कपिला गौ दान करे | ऐसा करनेवाला मनुष्य ‘वैश्वानर’ पदको प्राप्त होता है | यह ‘शिखिव्रत’ कहलाता हैं ||५-७||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘प्रतिपद-व्रतों का वर्णन’ नामक सडसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ||६७||
Comments
Post a Comment