अध्याय – 074 सप्तमी तिथिके व्रत
अध्याय – 074
सप्तमी तिथिके व्रत
अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं सप्तमी तिथि के व्रत कहूँगा | यह सबको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है | माघ मासके शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथिको (अष्टदल अथवा द्वादशदल) कमल का निर्माण करके उसमें भगवान् सूर्यका पूजन करना चाहिये | इससे मनुष्य शोकरहित हो जाता है ||१||
भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष की सप्तमी को भगवान् आदित्य का पूजन करनेसे समस्त अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है | पौषमास में शुक्लपक्ष की सप्तमी को निराहार रहकर सुर्यदेवका पूजन करनेसे सारे पापों का विनाश होता है ||२||
माघ के कृष्णपक्ष में ‘सर्वाप्ति-सप्तमी’ का व्रत करना चाहिये | इससे सभी अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है | फाल्गुन के कृष्णपक्ष में ‘नन्द-सप्तमी’ का व्रत करना चाहिये | मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष में ‘अपराजिता सप्तमी’ को भगवान् सूर्य का पूजन और व्रत करना चाहिये | एक वर्षतक मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष का ‘पुत्रीया सप्तमी’ व्रत स्रियों को पुत्र प्रदान करनेवाला है ||३-४||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सप्तमी के व्रतों का वर्णन’ नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ || ७४ ||
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