अध्याय – 066 समस्त पापनाशक स्तोत्र
अध्याय – 066
समस्त पापनाशक स्तोत्र
जो मनुष्य पापों का विनाश करनेवाले इस स्तोत्र का पठन अथवा श्रवण करता हैं, वह शरीर, मन और वाणीजनित समस्त पापों से छुट जाता हैं एवं समस्त पापग्रहों से मुक्त होकर श्रीविष्णु के परमपद को प्राप्त होता है | इसीलिए किसी भी पाप के हो जानेपर इस स्तोत्र का जप करे | यह स्तोत्र पापसमूहों के प्रायश्चित्त के समान हैं | कृच्छ आदि व्रत करनेवाले के लिए भी यह श्रेष्ठ है | स्त्रोत-जप और व्रतरूप प्रायश्चित्त से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं | इसलिये भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिये इनका अनुष्ठान करना चाहिये ||१९-२१||
पुष्कर कहते है – जब मनुष्यों का चित्त परस्त्रीगमन, परस्वापहरण एवं जीवहिंसा आदि पापों में प्रवृत्त होता हैं, तो स्तुति करनेसे उसका प्रायश्चित होता है | (उससमय निम्नलिखित प्रकारसे भगवान् श्रीविष्णु की स्तुति करे ) “सर्वव्यापी विष्णु को सदा नमस्कार है | श्रीहरि विष्णुको नमस्कार है | मैं अपने चित्तमें स्थित सर्वव्यापी, अहंकारशून्य श्रीहरि को नमस्कार करता हूँ | मैं अपने मानस में विराजमान अव्यक्त, अनंत और अपराजित परमेश्वर को नमस्कार करता हूँ | सबके पूजनीय, जन्म और मरण से रहित, प्रभावशाली श्रीविष्णु को नमस्कार है, विष्णु मेरी बुद्धि में विराजमान हैं, विष्णु मेरे अहंकार में प्रतिष्ठित हैं और विष्णु मुझमें भी स्थित हैं | वे श्रीविष्णु ही चराचर प्राणियों के कर्मों के रूपमें स्थित हैं, उनके चिन्तन से मेरे पाप का विनाश हो | जो ध्यान करनेपर पापों का हरण करते हैं और भावना करनेसे स्वप्न में दर्शन देते हैं, इंद्र के अनुज, शरणागतजनों का दुःख दूर करनेवाले उन पापापहारी श्रीविष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ | मैं इस निराधार जगत में अज्ञानान्धकार में डूबते हुए को हाथका सहारा देनेवाले परात्परस्वरुप श्रीविष्णु के सम्मुख प्रणत होता हूँ | सर्वेश्वरेश्वर प्रभो ! कमलनयन परमात्मन ! हृषिकेश ! आपको नमस्कार है | इन्द्रियों के स्वामी श्रीविष्णो ! आपको नमस्कार हैं | नृसिंह ! अनंतस्वरुप गोविन्द ! समस्त भूत-प्राणियों की सृष्टि करनेवाले केशव ! मेरे द्वारा जो दुर्वचन कहा गया हो अथवा पापपूर्ण चिन्तन किया गया हो, मेरे उस पाप का प्रशमन कीजिये; आपको नमस्कार हैं | केशव ! अपने मन के वशमें होकर मैंने जो न करनेयोग्य अत्यंत उग पापपूर्ण चिन्तन किया है, उसे शांत कीजिये | परमार्थपरायण ब्राह्मणप्रिय गोविन्द ! अपनी मर्यादा से कभी च्युत न होनेवाले जगन्नाथ ! जगतका भरण-पोषण करनेवाले देवेश्वर ! मेरे पापका विनाश कीजिये | मैंने मध्यान्ह, अपरान्ह, सायंकाल एवं रात्रि के समय, जानते हुए अथवा अनजाने, शरीर, मन एवं वाणी के द्वारा जो पाप किया हो, ‘पुण्डरीकाक्ष’, ‘हृषिकेश’, ‘माधव’ – आपके इन तीन नामों के उच्चारण से मेरे वे सब पाप क्षीण हो जायँ | कमलनयन लक्ष्मीपते ! इन्द्रियों के स्वामी माधव ! आज आप मेरे शरीर एवं वाणीद्वारा किये हुए पापों का हनन कीजिये | आज मैंने खाते, सोते, खड़े, चलते अथवा जागते हुए मन, वाणी और शरीर से जो भी नीच योनि एवं नरक की प्राप्ति करानेवाला सूक्ष्म अथवा स्थूल पाप किया हो, भगवान् वासुदेव के नामोच्चारण से वे सब विनष्ट हो जायँ | जो परब्रम्ह, परमधाम और परम पवित्र हैं, उन श्रीविष्णु के संकीर्तन से मेरे पाप लुप्त हो जायँ | जिसको प्राप्त होकर ज्ञानीजन पुन: लौटकर नहीं आते, जो गंध, स्पर्श आदि तन्मात्राओं से रहित हैं; श्रीविष्णु का वह परमपद मेरे पापों का शमन करे ||१-१८||
विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नम: | नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतिं हरिम ||
चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितं | विष्णुमीडयमशेषेण अनादिनिधनं विभुम ||
विष्णुक्षितगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतक्ष यत | यव्वार्हकारगो विष्णुर्यद्विष्णुर्मयि संस्थित: ||
करोति कर्मभूतोऽसौ स्थावरस्य चरस्य च | तत पापं नाशमायातु तस्मिन्नेव हिं चिन्तिते ||
ध्यातो हरति यत पापं स्वप्ने दृष्ट्स्तु भवनात | तमुपेंद्रमहं विष्णुं प्रणतार्तीहरं हरिम ||
जगत्यस्मीन्निराधारे मज्जमाने तमस्बध: | हस्तावलम्बनं विष्णुं प्रणमामि परात्परम ||
सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मनंधोक्षज | हृषिकेश हृषिकेश हृषिकेश नमोऽस्तु ते ||
नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव | दुरक्त दुष्कृतं ध्यातं शमयाधं नमोऽस्तु ते ||
यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना | अकार्य मह्रदत्पुग्रं वच्छमं नय केशव ||
ब्रह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण | जगन्नाथ जगद्धात: पापं प्रशमयाच्युत ||
यथापरान्हे सायान्हे मध्यान्हे च तथा निशि | कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता ||
जानता च हृषिकेश पुण्डरीकाक्ष माधव | नामत्र्योच्चारणत: पापं यातु मम क्षयम ||
शरीरं में हृषिकेश पुण्डरीकाक्ष माधव | पापं प्रशमयाद्य त्वं वाक्कृतं मम माधव ||
यद भुज्जन यत स्वपस्तिष्ठन गच्छन जाग्रद यदास्थित: | कृतवान पापमध्यान्ह कायेन मनसा गिरा ||
यत स्वल्पमपि यत स्थूलं कुयोनिनरकावहम | तद यातु प्रशमं सर्व वासुदेवानुकीर्तनात ||
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत | तस्मिन प्रकिर्तिते विष्णौ यत पापं तत प्रणश्यतु ||
यत प्राप्य न निवर्तन्ते गंधस्पर्शादिवर्जितम | सूर्यस्तत पदं विष्णोस्तत सर्व शमषत्वयम || (अग्निपुराण-२-१६)
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘समस्तपापनाशक स्तोत्रका वर्णन’ नामक छ्हाष्ठवाँ अध्याय पूरा हुआ ||६६||
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