अध्याय – 054 मन्वन्तरों का वर्णन

अध्याय – 054 
मन्वन्तरों का वर्णन
अग्निदेव कहते हैं – अब मैं मन्वन्तरों का वर्णन करूँगा | सबसे प्रथम स्वायम्भुव मनु हुए हैं | उनके आग्नीध्र आदि पुत्र थे | स्वायम्भुव मन्वन्तर में यम नामक देवता, और्व आदि सप्तर्षि तथा शतक्रतु इंद्र थे | दूसरे मन्वन्तर का नाम था – स्वारोचिष; उसमें पारावत और तुषित नामधारी देवता थे | स्वरोचिष मनुके चैत्र और किम्पुरुष आदि पुत्र थे | उससमय विपश्चित नामक इंद्र तथा उर्जस्वन्त आदि द्विज (सप्तर्षि) थे | तीसरे मनु का नाम उत्तम हुआ; उनके पुत्र अज आदि थे | देवता तथा वसिष्ठ के पुत्र सप्तर्षि थे | चौथे मनु तामस नामसे विख्यात हुए; उस समय स्वरुप आदि देवता, शिखरी इंद्र, ज्योतिर्होम आदि ब्राह्मण (सप्तर्षि) थे तथा उनके ख्याति आदि नौ पुत्र हुए ||१-५||

रैवत नामक पाँचवे मन्वन्तर में वितथ इंद्र, अमिताभ देवता, हिरण्यरोमा आदि मुनि तथा बलबंध आदि पुत्र थे | छठे चाक्षुष मन्वन्तर में मनोजव नामक इंद्र और स्वाति आदि देवता थे | तत्पश्चात सातवे मन्वन्तर में सुर्यपुत्र श्राद्धदेव मनु हुए | इनके समय में आदित्य, वसु तथा रूद्र आदि देवता; पुरन्दर नामक इंद्र, वसिष्ठ, काश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र तथा भरद्वाज सप्तर्षि हैं | यह वर्तमान मन्वन्तर का वर्णन है | वैवस्वत मनुके इक्ष्वाकु आदि पुत्र थे | इन सभी मन्वन्तरों में भगवान् श्रीहरि के अंशावतार हुए हैं | स्वायम्भुव मन्वन्तर में भगवान् ‘मानस’ के नामसे प्रकट हुए थे | तदनंतर शेष छ: मन्वन्तरों में क्रमश: अजित, सत्य, हरि, देववर, वैकुण्ठ और वामन रूप में श्रीहरि क प्रादुर्भाव हुआ | छाया के गर्भ से उत्पन्न सूर्यनंदन सावर्णि आठवे मनु होंगे ||६-११||

वे अपने पूर्वज (जेष्ठ भ्राता) श्राद्धदेव के समान वर्णवाले हैं, इसलिये ‘सावर्णि’ नाम से विख्यात होंगे | उनके समय में सुतपा आदि देवता, परम तेजस्वी अश्वत्थामा आदि सप्तर्षि, बलि इंद्र और विरज आदि मनुपुत्र होंगे | नवे मनुका नाम दक्षसावर्णि होगा | उससमय पार आदि देवता होंगे | उन देवताओं के इंद्र की ‘अद्भुत’ संज्ञा होगी | उनके समय में सवन आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण सप्तर्षि होंगे और ‘धृतकेतु’ आदि मनुपुत्र | तत्पस्च्यात दसवें मनु ब्रह्मसावर्णि के नाम से प्रसिद्ध होंगे | उससमय सुख आदि देवगण, शान्ति इंद्र, हविष्य आदि मुनि तथा सुक्षेत्र आदि मनुपुत्र होंगे ||१२-१५||

तदनंतर धर्मसावर्णि नामक ग्यारहवें मनुका अधिकार होगा | उससमय विहंग आदि देवता, गण इंद्र, निश्वर आदि मुनि तथा सर्वत्रग आदि मनुपुत्र होंगे | इसके बाद बारहवें मनु रूद्रसावर्णि के नामसे विख्यात होंगे | उनके समय में ऋतधामा नामक इंद्र और हरित आदि देवता होंगे | तपस्य आदि सप्तर्षि और देववान आदि मनुपुत्र होंगे | तेरहवें मनुका नाम होगा रौंच्य | उससमय सुत्रामणि आदि देवता तथा दिवस्पति इंद्र होंगे, जो दानव-दैत्य आदि का मर्दन करनेवाले होंगे | रौंच्य मन्वन्तर में निर्मोह आदि सप्तर्षि तथा चित्रसेन आदि मनुपुत्र होंगे | चौदहवें मनु भौत्य के नाम से प्रसिद्ध होंगे | उनके समय में शुचि इंद्र, चाक्षुष आदि देवता तथा आग्निबाहू आदि सप्तर्षि होंगे | चौदहवें मनुके पुत्र ऊरू आदि के नामसे विख्यात होंगे ||१६-२०||

सप्तर्षि द्विजगण भूमंडलपर वेदों का प्रचार करते हैं, देवगण यज्ञ-भाग के भोक्ता होते हैं तथा मनुपुत्र इस पृथ्वी का पालन करते है | ब्रह्मन ! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं | मनु, देवता तथा इंद्र आदि भी उतनी ही बार होते हैं | प्रत्येक द्वापर के अंत में व्यासरूपधारी श्रीहरि वेद का विभाग करते हैं | आदि वेद एक ही था, जिसमें चार चरण और एक लाख ऋचाएँ थी | पहले एक ही यजुर्वेद था, उसे मुनिवर व्यासजी ने चार भागों में विभक्त कर दिया | उन्होंने अध्वर्यु का काम यजुर्भाग से, होताका कार्य ऋग्वेद की ऋचाओं से, उद्गाता का कर्म साम-मंत्रो से तथा ब्रह्मा का कार्य अथर्ववेद के मन्त्रों से होना निश्चित किया | व्यास के प्रथम शिष्य पैल थे, जो ऋग्वेद के पारंगत पंडित हुए ||२१-२५||

इंद्र ने प्रमति और बाष्कल को संहिता प्रदान की | बाष्कल ने भी बौध्य आदि को चार भागों में विभक्त अपनी संहिता दी | व्यासजी के शिष्य परम बुद्धिमान वैशम्पायन ने यजुर्वेदरूप वृक्ष की सत्ताईस शाखाएँ निर्माण की | काण्व और वाजसनेय आदि शाखाओं को याज्ञवल्क्य आदि ने सम्पादित किया हैं | व्यास-शिष्य जैमिनी ने सामवेदरूपी वृक्ष की शाखाएँ बनायी | फिर सुमन्तु और सुकर्मा ने एक-एक संहिता रची | सुकर्मा ने अपने गुरुसे एक हजार संहिताओं को ग्रहण किया | व्यास-शिष्य सुमन्तु ने अथर्ववेद की भी एक शाखा बनायी तथा उन्होंने पैप्पल आदि अपने सहस्त्रों शिष्यों को उसका अध्ययन कराया | भगवान् व्यासदेवजी की कृपासे सूतने पुराण-संहिता का विस्तार किया ||२६-३१||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘मन्वन्तरों का वर्णन’ नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५४||

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