अध्याय – 063 वानप्रस्थ-आश्रम

अध्याय – 063 
वानप्रस्थ-आश्रम
पुष्कर कहते हैं – अब मैं वानप्रस्थ और संन्यासियों के धर्म का जैसा वर्णन करता हूँ, सुनो ! सिरपर जटा रखना, प्रतिदिन अग्निहोत्र करना, धरतीपर सोना और मृगचर्म धारण करना, वनमें रहना, फल, मूल, नीवार (तिन्नी) आदिसे जीवन-निर्वाह करना, कभी किसीसे कुछ भी दान न लेना, तीनों समय स्नान करना, ब्रह्मचर्यव्रत के पालन में तत्पर रहना तथा देवता और अतिथियों की पूजा करना – यह सब वानप्रस्थी का धर्म है |

ग्रहस्थ पुरुष को उचित है कि अपनी सन्तान की सन्तान देखकर वनका आश्रय ले और आयुका तृतीय भाग वनवास में ही बितावे | उस आश्रम में वह अकेला रहे या पत्नी के साथ भी रह सकता हैं | (परन्तु दोनों ब्रह्मचर्य का पालन करें |) गर्मी के दिनों में पंचाग्निसेवन करे | वर्षाकाल में खुले आकाश के नीचे रहे | हेमंत-ऋतू में रातभर भीगे कपड़े ओढकर रहे | अथवा जल में रहे | शक्ति रहते हुए वानप्रस्थीको इसीप्रकार यग तपस्या करनी चाहिये | वानप्रस्थ से फिर ग्रहस्थ-आश्रम में न लौटे | विपरीत या कुटिल गति का आश्रय न लेकर समाने की दिशा की ओर जाय अर्थात पीछे न लौटकर आगे बढ़ता रहे ||१-५||

इसीप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘वानप्रस्थाश्रम का वर्णन’ नामक त्रेशष्ठवाँ अध्याय पूरा हुआ ||६३||

Comments

Popular posts from this blog

अध्याय – 051 भारतवर्ष का वर्णन

अध्याय – 077 नवमी तिथि के और दशमी तिथि के व्रत