अध्याय – 062 असंस्कृत आदि की शुद्धि
अध्याय – 062
असंस्कृत आदि की शुद्धि
पुष्कर कहते हैं – मृतक का दाह-संस्कार हुआ हो या नहीं, यदि श्रीहरिका स्मरण किया जाय तो उससे उसको स्वर्ग और मोक्ष – दोनों की प्राप्ति हो सकती है | मृतक की हड्डियों को गंगाजी के जलमें डालनेसे उस प्रेत (मृत-व्यक्ति) का अभ्युदय होता हैं | मनुष्य की हड्डी जबतक गंगाजी के जलमें स्थित रहती हैं तबतक उसका स्वर्गलोक में निवास होताहैन | आत्मत्यागी तथा पतित मनुष्यों के लिये यद्यपि पिण्डोदक – क्रिया का विधान नहीं हैं तथापि गंगाजी के जल में उनकी हड्डियों का डालना भी उनके लिये हितकारक ही है | उनके उद्देश्य से दिया हुआ अन्न और जल आकाश में लीन हो जाता है | पतित प्रेत के प्रति महान अनुग्रह करके उसके लिये ‘नारायण-बलि’ करनी चाहिये | इससे वह उस अनुग्रह का फल भोगता है | कमल के सदृश नेत्रवाले भगवान् नारायण अविनाशी हैं, अत: उन्हें जो कुछ अर्पण किया जाता है, उसका नाश नहीं होता | भगवान् जनार्दन जीव का पतन से त्राण (उद्धार) करते हैं, इसलिये वे ही दान के सर्वोत्तम पात्र हैं ||१-५||
निश्चय ही नीचे गिरनेवाले जीवों को भी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले एकमात्र श्रीहरि ही हैं |
‘सम्पूर्ण जगतके लोग एक-न-एक दिन मरनेवाले हैं’ – यह विचारकर सदा अपने सच्चे सहाय्यक धर्म का अनुष्ठान करना चाहिये | पतिव्रता पत्नी को छोडकर दूसरा कोई बन्धु-बान्धव मरकर भी मरे हुए मनुष्य के साथ नहीं जा सकता; क्योंकि यमलोक का मार्ग सबके लिये अलग-अलग है | जीव कहीं भी क्यों न जाय, एकमात्र धर्म ही उसके साथ जाता हैं | जो काम कल करना है, उसे आज ही कर ले; जिसे दोपहर बाद करना है, उसे पहले ही पहर में कर ले; क्योंकि मृत्यु इस बात की प्रतीक्षा नहीं करती कि इसका कार्य पूरा हो गया हैं या नहीं ? मनुष्य खेत-बारी, बाजार-हाट तथा घर-द्वार में फँसा होता है, उसका मन अन्यत्र लगा होता हैं, इसी दशामें जैसे असावधान भेडको सहसा भेड़िया आकर उठा ले जाय, वैसे ही मृत्यु उसे लेकर चल देती है | काल के लिये न तो कोई प्रिय है, न द्वेश का पात्र ||६-१०||
आयुष्य तथा प्रारब्धकर्म क्षीण होनेपर वह हठात जीव को हर ले जाता है | जिसका काल नहीं आया है, वह सैकड़ों बाणों से घायल होनेपर वह कुश के अग्रभाग से ही छू जाय तो भी जीवित नहीं रहता | जो मृत्युसे ग्रस्त है, उसे औषध और मन्त्र आदि नहीं बचा सकते | जैसे बछड़ा गौओं के झुण्ड में भी अपनी माँ के पास पहुँच जाता है, उसी प्रकार पूर्वजन्म का किया हुआ कर्म जन्मान्तर में भी कर्ता को अवश्य ही प्राप्त होता है | इस जगत का आदि और अंत अव्यक्त है, केवल मध्य की अवस्था ही व्यक्त होती है | जैसे जीव के इस शरीर में कुमार तथा यौवन आदि अवस्थाएँ क्रमश: आती रहती है, उसीप्रकार मृत्यु के पश्चात उसे दूसरे शरीर की भी प्राप्ति होती है | जैसे मनुष्य (पुराने वस्र को त्यागकर) दूसरे नूतन वस्त्र को धारण करता हैं, उसीप्रकार जीव एक शरीर को छोड़कर दूसरे को ग्रहण करता है | देहधारी जीवात्मा सदा अवध्य है, वह कभी मरता नहीं; अत: मृत्यु के लिये शोक त्याग देना चाहिये ||११-१४||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘असंस्कृत आदि की शुद्धि का वर्णन’ नामक बासष्टवाँ अध्याय पूरा हुआ ||६२||
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