अध्याय – 058 विवाहविषयक बातें
अध्याय – 058
विवाहविषयक बातें
पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! ब्राह्मण अपनी कामना के अनुसार चारों वर्णों की कन्याओं से विवाह कर सकता हैं, क्षत्रिय तीनसे, वैश्य दो से तथा शुद्र एक ही स्त्री से विवाह का अधिकारी है | जो अपने समान वर्ण की न हो, ऐसी स्त्री के साथ किसी भी धार्मिक कृत्य का अनुष्ठान नहीं करना चाहिये | अपने समान वर्ण की कन्याओं से विवाह करते समय पतिको उनका हाथ पकड़ना चाहिये | यदि क्षत्रिय-कन्याका विवाह ब्राह्मण से होता हो तो वह ब्राह्मण के हाथ में हाथ न देकर उसके द्वारा पकडे हुए बाण का अग्रभाग अपने हाथ से पकडे | इसीप्रकार वैश्य-कन्या यदि ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय से ब्याही जाती हो तो वह वर के हाथ में रखा हुआ चाबुक पकडे और शुद्र-कन्या वस्त्र का छोर ग्रहण करे | एक ही बार कन्या का दान देना चाहिये | जो उसका अपहरण करता हैं, वह चोर के समान दण्ड पाने का अधिकारी हैं ||१-३||
जो सन्तान बेचने में आसक्त हो जाता हैं, उसका पापसे कभी उद्धार नहीं होता | कन्यादान, शाचियोग (शचीकी पूजा), विवाह और चतुर्थीकर्म – इन चार कर्मों का नाम ‘विवाह’ है | (मनोनीत) पति के लापता होने, मरने तथा संन्यासी, नपुंसक और पतित होनेपर- इन पाँच प्रकार की आपत्तियों के समय (वाग्दत्ता) स्त्रियों के लिये दूसरा पति करनेका विधान है | पति के मरनेपर देवर को कन्या देनी चाहिये | वह न हो तो किसी दूसरे को इच्छानुसार देनी चाहिये | वर अथवा कन्या का वरण करने के लिये तीनों पूर्वा, कृत्तिका, स्वाती, तीनों उत्तरा और रोहिणी – ये नक्षत्र सदा शुभ माने गये अहिं ||४-७||
परशुराम ! अपने समान गोत्र तथा समान प्रवर में उत्पन्न हुई कन्या का वरण न करे | पितासे ऊपर की सात पीढ़ियों के पहले तथा माता से पाँच पीढ़ियों के बाद की ही परम्परा में उसका जन्म होना चाहिये | उत्तम कुल तथा अच्छे स्वभाव के सदाचारी वर को घरपर बुलाकर उसे कन्या का दान देना “ब्राह्मविवाह’ कहलाता है | उससे उत्पन्न हुआ बालक उक्त कन्यादानजनित पुण्य के प्रभाव से अपने पूर्वजों का सदा के लिये उद्धार कर देता हैं | वर से एक गाय और एक बैल लेकर जो कन्यादान किया जाता हैं, उसे ‘आर्ष-विवाह’ कहते हैं | जब किसी के माँगनेपर उसे कन्या दी जाती है तो वह ‘प्राजापत्य-विवाह’ कहलाता हैं; इससे धर्म की सिद्धि होती है | कीमत लेकर कन्या देना ‘आसुर-विवाह’ हैं, यह नीच श्रेणी का कृत्य है | वर और कन्या जब स्वेच्छापूर्वक एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं तो उसे ‘गान्धर्व-विवाह’ कहते हैं | युद्ध के द्वारा कन्या के हर लेने से ‘राक्षस-विवाह’ कहलाता है तथा कन्या को धोखा देकर उडा लें ‘पैशाच –विवाह ‘ माना गया हैं ||८-११||
विवाह के दिन कुम्हार की मिट्टी से शची की प्रतिमा बनाये और जलाशय के तटपर उसकी गाजे-बाजे के साथ पूजा कराकर कन्या को घर ले जाना चाहिये | आषाढ़ से कार्तिक तक, जब भगवान विष्णु शयन करते हो, विवाह नहीं करना चाहिये | पौष और चैत्रमास में भी विवाह निषिद्ध हैं | मंगल के दिन तथा रिक्ता एवं भद्रा तिथियों में भी विवाह मना है | जब बृहस्पति और शुक्र का अस्त हों, चंद्रमापर ग्रहण लगनेवाला हो, लग्नस्थान में सूर्य, शनैश्वर तथा मंगल हों और व्यतिपात दोष आ पड़ा हो तो उस समय भी विवाह नहीं करना चाहिये | मृगशिरा, मघा, स्वाती, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा, मूल, अनुराधा तथा रेवती – ये विवाह के नक्षत्र हैं ||१२-१५||
पुरुषवाची लग्न तथा उसका नवमांश शुभ होता है | लग्न से तीसरे, छठे, दसवें, ग्यारहवें तथा आठवें स्थान में सूर्य, शनैश्वर और बुध हों तो शुभ हैं | आठवें स्थान में मंगल का होना अशुभ है | शेष ग्रह सातवें, बारहवें तथा आठवें घरमें हों तो शुभकारक होते हैं | इनमें भी छठे स्थान का शुक्र उत्तम नहीं होता | चतुर्थी कर्म भी वैवाहिक नक्षत्र में ही करना चाहिये | उसमें लग्न तथा चौथे आदि स्थानों में ग्रह न रहें तो उत्तम है | पर्व का दिन छोडकर अन्य समय में ही स्त्री-समागम करे | इससे सती (या शची) देवी के आशीर्वाद से सदा प्रसन्नता प्राप्त होती हैं ||१६-१९||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘विवाहभेद-कथन’ नामक अठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५८||
Comments
Post a Comment