अध्याय – 071 चतुर्थी तिथि के व्रत
अध्याय – 071
चतुर्थी तिथि के व्रत
अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं आपके सम्मुख भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले चतुर्थी सम्बन्धी व्रतों का वर्णन करता हूँ | माघ के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को उपवास करके गणेश का पूजन करे | तदनंतर पंचमी को तिलका भोजन करे | ऐसा करनेसे मनुष्य बहुत वर्षोतक विघ्नरहित होकर सुखी रहता हैं | ‘गं स्वाहा |’ – यह मूलमंत्र हैं | ‘गां नम: |’ आदि से हरदयादिका न्यास करे ||१-२||
गां ह्रदयाय नम: | गीं शिरसे स्वाहा | गूं शिखायै वषट | गै नेत्रत्रयाय वौषट | गौ कवचाय हुम् | ग:अस्त्राय फट |
‘आगच्छोल्काय’ कहकर गणेशका आवाहन और ‘गच्छोल्काय’ कहकर विसर्जन करे | इसप्रकार आदिमें गकारयुक्त और अंत में ‘उल्का’ शब्दयुक्त मन्त्र से उनके आवाहनादि कार्य करे | ग्न्धादि उपचारों एवं लड्डूओं आदिद्वारा गणपति का पूजन करे ||३||
तदनन्तर निम्नलिखित गणेश गायत्रीका जप करे –
ॐ महोल्काय विद्महे वक्रतुण्डायधीमहि |
तन्नो दन्ती प्रचोदयात ||
भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को व्रत करनेवाला शिवलोक को प्राप्त करता हैं | ‘अंगारक-चतुर्थी’ (मंगलवारसे युक्त चतुर्थी) को गणेश का पूजन करके मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त कर लेता हैं | फाल्गुन की चतुर्थी को रात्री में ही भोजन करे | यह ‘अविघ्ना चतुर्थी’ का नामसे प्रसिद्ध है | चैत्र मास की चतुर्थी को ‘दमनक’ नामक पुष्पों से गणेश का पूजन करके मनुष्य सुख-भोग प्राप्त करता है ||४-६||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘चतुर्थी के व्रतों का कथन’ नामक एकाह्त्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ||
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