अध्याय – 057 संस्कारों का वर्णन और ब्रह्मचारी के धर्म

अध्याय – 057 
संस्कारों का वर्णन और ब्रह्मचारी के धर्म
पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! अब मैं आश्रमी पुरुषों के धर्म का वर्णन करूँगा; सुनो ! यह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला हैं | स्त्रियों के ऋतूधर्म की सोलह रात्रियाँ होती हैं, उनमें पहले की तीन रातें निन्दित हैं | शेष रातों में जो युग्म अर्थात चौथी, छठी, आठवीं और दसवीं आदि रात्रियाँ हैं, उनमें ही पुत्र की इच्छा रखनेवाला पुरुष स्त्री- समागम करे | यह ‘गर्भाधान-संस्कार’ कहलाता हैं | ‘गर्भ’ रह गया – इस बातका स्पष्टरुप से ज्ञान हो जानेपर गर्भस्थ शिशु के हिलने-डुलनेसे पहले ही ‘पुंसवन-संस्कार’ होता हैं | तत्पश्यात छठे या आठवें मास में ‘सीमन्तोत्रयन’ किया जाता हैं | उस दिन पुल्लिंग नामवाले नक्षत्र का होना शुभ हैं | बालक का जन्म होनेपर नाल काटने के पहले ही विद्वान् पुरुषों को उसका ‘जातकर्म-संस्कार’ करना चाहिये | सूतक निवृत्त होनेपर ‘नामकरण-संस्कार’ का विधान हैं | ब्राह्मण के नाम के अन्तमें ‘शर्मा’ और क्षत्रिय के नाम के अंत में ‘वर्मा’ होना चाहिये | वैश्य और शुद्र के नामों के अंत में क्रमश: ‘गुप्त’ और ‘दास’ पदका होना उत्तम माना गया हैं | उक्त संस्कार के समय पत्नी स्वामी की गोद में पुत्रको दे और कहे –‘यह आपका पुत्र है’ ||१-५||

फिर कुलाचार के अनुरूप ‘चूडाकरण’ करे | ब्राह्मण बालक का ‘उपनयन-संस्कार’ गर्भ अथवा जन्म से आठवे वर्ष में होना चाहिये | गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय बालक का तथा गर्भ से बारहवें वर्ष में वैश्य बालक का उपनयन करना चाहिये | ब्राह्मण बालक का उपनयन सोलहवें, क्षत्रिय बालक का बाईसवें और वैश्य बालक का चौबीसवें वर्ष से आगे नहीं जाना चाहिये | तीनों वर्णों के लिये क्रमश: मूँज, प्रत्यंच्या तथा वल्कलकी मेखला बतायी गयी है | इसप्रकार तीनों वर्णों के ब्रह्मचारियों के लिये क्रमश: मृग, व्याघ्र तथा बकरे के चर्म और पलाश, पीपल तथा बेल के दण्ड धारण करने योग्य बताये गये हैं | ब्राह्मण का दण्ड उसके केशतक, क्षत्रिय का ललाटतक और वैश्य का मुखतक लंबा होना चाहिये | इसप्रकार क्रमश: दण्डों की लंबाई बतायी गयी है | ये दण्ड टेढ़े – मेढ़े न हों | इनके छिलके मौजूद हों तथा ये आगमें जलाये न गये हों ||६-९||

उक्त तीनों वर्णों के लिये वस्त्र और यज्ञोपवीत क्रमश: कपास (रुई), रेशम तथा उनके होने चाहिये | ब्राह्मण ब्रह्मचारी भिक्षा माँगते समय वाक्य के आदि में ‘भवत’ शब्द का प्रयोग करे | [जैसे माताके पास जाकर कहे – ‘भवति भिक्षां में देहि मात: |’ पूज्य माताजी ! मुझे भिक्षा दें | ] इसीप्रकार क्षत्रिय ब्रह्मचारी वाक्य के मध्य में तथा वैश्य ब्रह्मचारी वाक्य के अन्तमें ‘भवत’ शब्द का प्रयोग करें | (यथा –क्षत्रिय – भिक्षां भवति में देहि | वैश्य – भिक्षां में देहि भवति|) पहले वहीँ भिक्षा माँगे, जहाँ भिक्षा अवश्य प्राप्त होने की सम्भावना हो | स्त्रियों के अन्य सभी संस्कार बिना मन्त्र के होने चाहिये, केवल विवाह-संस्कार ही मंत्रोच्चारणपूर्वक होता हैं | गुरु को चाहिये कि वह शिष्य का उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार करके पहले शौचाचार, सदाचार, अग्निहोत्र तथा संध्योपासना की शिक्षा दे ||१०-१२||

जो पूर्वकी ओर मुँह करके भोजन करता हैं, वह आयुष्य भोगता हैं, दक्षिण की ओर मुँह करके खानेवाला यशका, पश्चिमाभिमुख होकर भोजन करनेवाला लक्ष्मी (धन) का तथा उत्तर की ओर मुँह करके अन्न ग्रहण करनेवाला पुरुष सत्यका उपभोग करता हैं | ब्रह्मचारी प्रतिदिन सायंकाल और प्रात:काल अग्निहोत्र करे | अपवित्र वस्तुका होम निषिद्ध हैं | होम के समय हाथ की अन्गुलियों को परस्पर सटाये रहे | मधु, मांस, मनुष्यों के साथ विवाद, गाना और नाचना आदि छोड़ दे | हिंसा, परायी निंदा तथा विशेषत: अश्लील चर्चा (गाली=गलौच आदि) का त्याग करे | दण्ड आदि धारण किये रहे } यदि वह टूट जाय तो जलमें उसका विसर्जन कर दे और नवीं दण्ड धारण करे | वेदों का अध्ययन पूरा करके गुरु को दक्षिणा देने के पश्चात व्रतांत-स्नान करे; अथवा नैष्ठिक ब्रह्मचारी होकर जीवनभर गुरुकुल में ही निवास करता रहे ||१३-१६||

इसीप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘ब्रह्मचर्याश्रम –वर्णन’ नामक का सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५७||

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