अध्याय – 056 गृहस्थ की जीविका
अध्याय – 056
गृहस्थ की जीविका
पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! ब्राह्मण अपने शास्त्रोक्त कर्म से ही जीविका चलावे; क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र के धर्म से जीवन-निर्वाह न करे | आपत्तिकाल में क्षत्रिय और वैश्य की वृत्ति ग्रहण कर ले; किन्तु शुद्र-वृत्तिसे कभी गुजारा न करे | द्विज खेती, व्यापार, गोपालन तथा कुसीद (सूद लेना) – इन वृत्तियों का अनुष्ठान करे; परन्तु वह गोरस, गुड, नमक, लाक्षा और मांस न बेचे | किसान लोग धरती को कोड़ने-जोतने के द्वारा जो कीड़े और चींटी आदि की हत्या कर डालते हैं और सोहनी के द्वारा जो पौधों को नष्ट कर डालते हैं, उससे यज्ञ और देवपूजा करके मुक्त होते हैं ||१-३||
आठ बैलों का हल धर्मानुकुल माना गया हैं | जीविका चलानेवालों का हल छ: बैलों का, निर्दयी हत्यारों का हल चार बैलों का तथा धर्म का नाश करनेवाले मनुष्यों का हल दो बैलों का माना गया हैं | ब्राह्मण ऋत (खेत कट जानेपर बाल योंनना अथवा अनाज के एक-एक दाने को चुन-चुनकर लाना और उसीसे जीविका चलाना ’ऋत’ कहालाता है |) और अमृत से (बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, वह ‘अमृत’ है |) अथवा मृत (माँगी हुई भीख को ‘मृत’ कहते हैं |) और प्रमृत से (खेती का नाम ‘प्रमृत’ है |) या सत्यानृत (व्यापार को ‘सत्यानृत’ कहते हैं |) वृत्ति से जीविका चलावे | श्वान-वृत्तिसे (नौकरी का नाम ‘श्वान-वृत्ति’ है |) कभी जीवन-निर्वाह न करे ||४-५||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गृहस्थ-जीविका का वर्णन’ नामक छपन्नवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५६||
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