अध्याय – 051 भारतवर्ष का वर्णन

अध्याय – 051 
भारतवर्ष का वर्णन
अग्निदेव कहते हैं – समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण जो वर्ष हैं, उसका नाम ‘भारत’ है | उसका विस्तार नौ हजार योजन है | स्वर्ग तथा अपवर्ग पाने की इच्छावाले पुरुषों के लिये यह कर्मभूमि हैं | महेंद्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, हिमालय, विन्ध्य और पारियात्र – ये सात यहाँ के कुल-पर्वत हैं | इंद्रद्वीप, कसेरू, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गान्धर्व और वारुण – ये आठ द्वीप हैं | समुद्र से घिरा हुआ भारत नवाँ द्वीप है ||१-४||

भारतद्वीप उत्तरसे दक्षिण की ओर हजारों योजन लंबा है | भारत के उपर्युक्त नौ भाग हैं | भारत की स्थिति मध्य में हैं | इसमें पूर्वकी ओर किरात और पश्चिम में यवन रहते हैं | मध्यभाग में ब्राह्मण आदि वर्णों का निवास हैं | वेद-स्मृति आदि नदियाँ पारियात्र पर्वत से निकली हैं | विन्ध्याचल से नर्मदा आदि प्रकट हुई हैं | सह्य पर्वत से तापी, पयोष्णी, गोदावरी, भीमरथी और कृष्णवेणा आदि नदियों का प्रादुर्भाव हुआ हैं ||५-७||

मलय से कृतमाला आदि और महेंद्र पर्वत से त्रिसामा आदि नदियाँ निकली हैं | शुक्तिमान से कुमारी आदि और हिमालय से चन्द्रभागा आदि का प्रादुर्भाव हुआ है | भारत के पश्चिम भाग में कुरु, पांचाल और मध्यदेश आदि की स्थिति हैं ||८||

इसीप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘भारतवर्ष का वर्णन’ नामक एकावन्नवाँ अध्याय पूरा हुआ ||५१||

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