अध्याय – 049 गया में श्राद्ध की विधि
अध्याय – 049
गया में श्राद्ध की विधि
श्राद्ध आदि में गया के इस माहात्म्य का पाठ करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोक का भागी होता है |
अग्निदेव कहते हैं – गायत्री मन्त्र से ही महानदी में स्नान करके संध्योपासना करे | प्रात:काल गायत्री के सम्मुख किया हुआ श्राद्ध और पिंडदान अक्षय होता है | सूर्योदय के समय तथा मध्याह्नकाल में स्नान करके गीत और वाद्य के द्वारा सावित्री देवी की उपासना करे | फिर उन्हीं के सम्मुख संध्या करके नदीके तटपर पिंडदान करे | तदनन्तर अगस्त्यपद में पिंडदान करे | फिर ‘योनिद्वार’ (ब्रह्मयोनि) – में प्रवेश करके निकले | इससे वह फिर माता की योनि में नहीं प्रवेश करता, पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है | तत्पस्च्यात काकशिलापर बलि देकर कुमार कार्तिकेय को प्रणाम करे | इसके बाद स्वर्गद्वार, सोमकुंड और वायु-तीर्थ में पिंडदान करे | फिर आकाशगंगा और कपिला के तटपर पिंड दे | वहाँ कपिलेश्वर शिव को प्रणाम करके रुक्मिणीकुंड पर पिंडदान करे ||१-५||
कोटि-तीर्थ में भगवान् कोटीश्वर को नमस्कार करके मनुष्य अमोघपद, गदालोल, वानरक एवं गोप्रचार तीर्थ में पिंडदान दे | वैतरणी में गौ को नमस्कार एवं दान करके मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है | वैतरणी के तटपर श्राद्ध एवं पिंडदान करे | उसके बाद क्रौंचपाद में पिंड दे | तृतीया तिथि को विशाला, निश्चिरा, ऋणमोक्ष तथा पापमोक्ष तीर्थ में भी पिंडदान करे | भस्मकुंड में भस्म से स्नान करनेवाला पुरुष पाप से मुक्त हो जाता है | वहाँ भगवान् जनार्दन को प्रणाम करे और इस प्रकार प्रार्थना करे –‘जनार्दन ! यह पिंड मैंने आपके हाथमें समर्पित किया हैं | परलोक में जानेपर यह मुझे अक्षयरुप में प्राप्त हो |’ गया में साक्षात भगवान् विष्णु ही पितृदेव के रूप में विराजमान हैं ||६-१०||
उन भगवान् कमलनयन का दर्शन करके मानव तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है | तदनंतर मार्कण्डेयेश्वर को प्रणाम करके मनुष्य ग्रुध्रेश्वर को नमस्कार करना चाहिये | महादेवजी के मुलक्षेत्र धारा में पिंडदान करना चाहिये | इसीप्रकार गृध्रकूट, गृध्रवट और धौतपाद में पिंडदान करना उचित है | पुष्करिणी, कर्दमाल और रामतीर्थ में पिंड दे | फिर प्रभासेश्वर को नमस्कार करके प्रेतशिलापर पिंडदान दे | उस समय इसप्रकार कहे – ‘दिव्यलोक, अन्तरिक्षलोक तथा भुमिलोक में जो मेरे पितर और बांधव आदि सम्बन्धी प्रेत आदि के रूप में रहते हो, वे सब लोग इन मेरे दिये हुए पिंडों के प्रभाव से मुक्ति-लाभ करे |’ प्रेतशिला तीन स्थानों में अत्यंत पावन मानी गयी हैं – गयाशीर्ष, प्रभासतीर्थ और प्रेतकुंड | इनमे पिंडदान करनेवाला पुरुष अपने कुल का उद्धार कर देता है ||११-१५||
वसिष्ठेश्वर को नमस्कार करके उनके आगे पिंडदान दे | गयानाभि, सुषुम्ना तथा महाकोष्ठी में भी पिंडदान करे | भगवान् गदाधर के सामने मुंडपृष्ठपर देवी के समीप पिंडदान करे | पहले क्षेत्रपाल आदिसहित मुंडपृष्ठ को नमस्कार कर लेना चाहिये | उनका पूजन करनेसे भय का नाश होता है, विष और रोग आदि का कुप्रभाव भी दूर हो जाता है | ब्रह्माजी को प्रणाम करने से मनुष्य अपने कुल को ब्रह्मलोक में पहुँचा देता हैं | सुभद्रा, बलभद्र तथा भगवान् पुरुषोत्तम का पूजन करने से मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करके अपने कुल का उद्धार कर देता और अंत में स्वर्गलोक का भागी होता है | भगवान् हृषिकेश को नमस्कार करके उनके आगे पिंडदान देना चाहिये | श्रीमाधव का पूजन करके मनुष्य विमानचारी देवता होता है ||१६-२०||
भगवती महालक्ष्मी, गौरी तथा मंगलमयी सरस्वती की पूजा करके मनुष्य अपने पितरों का उद्धार करता, स्वयं भी स्वर्गलोक में जाता और वहाँ भोग भोगने के पश्च्यात इस लोकमें आकर शास्त्रों का विचार करनेवाला पंडित होता है | फिर बारह आदित्यों का, अग्नि का, रेवंत का और इंद्र का पूजन करके मनुष्य रोग आदि से छुटकारा पा जाता है और अंत में स्वर्गलोक का निवासी होता है | ‘श्रीकपर्दी विनायक’ तथा कार्तिकेय का पूजन करनेसे मनुष्य को निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धि प्राप्त होती है | सोमनाथ, कालेश्वर, केदार, प्रपितामह, सिद्धेश्वर, रुद्रेश्वर, रामेश्वर तथा ब्रह्मकेश्वर – इन आठ गुप्त लीगों का पूजन करनेसे मनुष्य सब कुछ पा लेता हैं | यदि लक्ष्मीप्राप्ति की कामना हो तो भगवान् नारायण, वाराह, नरसिंह को नमस्कार करे ब्रह्मा, विष्णु तथा त्रिपुरनाशक महेश्वर को भी प्रणाम करे | वे सब कामनाओं को देनेवाले हैं ||२१-२५||
सीता, राम, गरुड़ तथा वामन का पूजन करनेसे मानव अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता हैं और पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति करा देता हैं | देवताओंसहित भगवान् श्रीआदि-गदाधर का पूजन करनेसे मनुष्य तीनों ऋणों से मुक्त होकर अपने सम्पूर्ण कुल को तार देता है | प्रेतशिला देवरुपा होने से परम पवित्र है | गया में वह शिला देवमयी ही है | गया में ऐसा कोई स्थान नहीं हैं, जहाँ तीर्थ न हो | गयामें जिसके नाम से भी पिंड दिया जाता है, उसे वह सनातन ब्रह्म में प्रतिष्ठित कर देता है |
देव ! भगवान् गदाधर ! मैं पितरों का श्राद्ध करने के निमित्त गया में आया हूँ | आप यहाँ मेरे साक्षी होईये | आज मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया | ब्रह्मा और शंकर आदि देवता मेरे लिये साक्षी बनें | मैंने गया में आकर अपने पितरों का उद्धार कर दिया | श्राद्ध आदि में गया के इस माहात्म्य का पाठ करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोक का भागी होता है | गया में पितरों का श्राद्ध अक्षय होता है | वह अक्षय ब्रह्मलोक देनेवाला है || २६-४३ ||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गयामें श्राद्ध की विधि’ विषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ||४९||
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