अध्याय – 048 गया – यात्रा की विधि
अध्याय – 048
गया – यात्रा की विधि
अग्निदेव कहते हैं – यदि मनुष्य गया जाने को उद्यत हो तो विधिपूर्वक श्राद्ध करके तीर्थयात्री का वेष धारणकर अपने गाँव की परिक्रमा कर ले; फिर प्रतिदिन पैदल यात्रा करता रहे | मन और इन्द्रियों को वश में रखे | किसी से कुछ दान न ले | गया जाने के लिये घरसे चलते ही पग-पगपर पितरों के लिये स्वर्ग में जाने की सीढी बनने लगती हैं | यदि पुत्र (पितरों का श्राद्ध करने के लिये) गया चला जाय तो उससे होनेवाले पुण्य के सामने ब्रह्मज्ञान की क्या कीमत है ? गौओं को संकट से छुडाने के लिये प्राण देनेपर भी क्या उतना पुण्य होना सम्भव है ? फिर तो कुरुक्षेत्र में निवास करने की भी क्या आवश्यकता है ? पुत्र को गया में पहुँचा हुआ देखकर पितरों के यहाँ उत्सव होने लगता है | वे कहते हैं – ‘क्या यह पैरों से भी जल का स्पर्श करके हमारे तर्पण के लिये नहीं देगा ?’ ब्रह्मज्ञान, गया में किया हुआ श्राद्ध, गोशाला में मरण और कुरुक्षेत्र में निवास – ये मनुष्यों की मुक्ति के चार साधन हैं | नरक के भय से डरे हुए पितर पुत्र की अभिलाषा रखते हैं | वे सोचते हैं, जो पुत्र गया में जायगा, वह हमारा उद्धार कर देगा ||१- ६||
मुंडन और उपवास – यह सब तीर्थो के लिये साधारण विधि है | गयातीर्थ में काल आदि का कोई नियम नहीं हैं | वहाँ प्रतिदिन पिंडदान देना चाहिये | जो वहाँ तीन पक्ष (डेढ़ मास) निवास करता हैं, वह सात पीढ़ी तक के पितरों को पवित्र कर देता हैं | अष्टका तिथियों में, आभ्युदयिक कार्यों में तथा पिता आदि की क्षयाह – तिथि को भी यहाँ गया में माता के लिये पृथक श्राद्ध करने का विधान है | एनी तीर्थों में स्त्री का श्राद्ध उसके पति के साथ ही होता है | गया में पिता आदि के क्रम से ‘नव देवताक’ अथवा ‘द्वादशदेवताक’ श्राद्ध करना आवश्यक है ||७-९||
पहले दिन उत्तर-मानस-तीर्थ में स्नान करे | परम पवित्र उत्तर-मानस-तीर्थ में किया हुआ स्नान आयु और आरोग्य की वृद्धि, सम्पूर्ण पापराशियों का विनाश तथा मोक्ष की सिद्धि करनेवाला है; अत: वहाँ अवश्य स्नान करे | स्नान के बाद पहले देवता और पितर आदि का तर्पण करके श्राद्धकर्ता पुरुष पितरों को पिंडदान दे | तर्पण के समय यह भावना करे कि ‘मैं स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमिपर रहनेवाले सम्पूर्ण देवताओं को तृप्त करता हैं |’ स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमि के देवता आदि एवं पिता-माता आदि का तर्पण करे | फिर इसप्रकार कहे – ‘पिता, पितामह और प्रपितामह; माता, पितामही और प्रपितामही तथा मातामह, प्रमातामह और वृद्ध प्रमातामह – इन सबको तथा अन्य पितरों को भी उनके उद्धार के लिये मैं पिंड देता हूँ | सोम, मंगल और बुधस्वरुप तथा बृहस्पति, शुक्र, शनैश्वर, राहू और केतुरूप भगवान् सूर्य को प्रणाम है |’ उत्तर-मानस-तीर्थ में स्नान करनेवाला पुरुष अपने समस्त कुल का उद्धार कर देता है ||१०-१६||
सूर्यदेव को नमस्कार करके मनुष्य मौनभाव से दक्षिण-मानस-तीर्थ को जाय और यह भावना करे – ‘मैं पितरों की तृप्ति के लिये दक्षिण-मानस-तीर्थ में स्नान करता हूँ | मैं गया में इसी उद्देश्य से आया हूँ कि मेरे सम्पूर्ण पितर स्वर्गलोक को चले जायँ | तदनन्तर श्राद्ध और पिंडदान करके भगवान् सूर्य को प्रणाम करते हुए इसप्रकार कहे – ‘सबका भरण-पोषण करनेवाले भगवान् भानु को नमस्कार हैं | प्रभो ! आप मेरे अभ्युदय के साधक हों | मैं आपका ध्यान करता हूँ | आप मेरे सम्पूर्ण पितरों को भोग और मोक्ष देनेवाले हों | कव्यवाट, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात, बर्हिषद तथा पदार्पण करें | आपलोगों के द्वारा सुरक्षित जो मेरे पिता-माता,पितामह आदि पितर हैं, उनको पिंडदान करने के उद्देश्य से मैं इस गयातीर्थ में आया हूँ |’ मुंडपृष्ठ के उत्तर भाग में देवताओं और ऋषियों से पूजित जो ‘कनखल’ नामक तीर्थ हैं, वह तीनों लोकों में विख्यात है | सिद्ध पुरुषों के लिये आनंददायक और पापियों के लिये भयंकर बड़े-बड़े नाग, जिनकी जीभ लपलपाती रहती है, उस तीर्थ की प्रतिदिन रक्षा करते हैं | वहाँ स्नान करके मनुष्य इस भूतलपर सुखपूर्वक क्रीडा करते और अंत में स्वर्गलोक को जाते हैं ||१७-२४||
तत्पश्च्यात महानदी में स्थित परम उत्तम फल्गु-तीर्थपर जाय | यह नाग, जनार्दन, कूप, वट और उत्तर-मानस में भी उत्कृष्ट हैं | इसे ‘गया का शिरोभाग’ कहा गया है | गयाशिर को ही ‘फल्गु-तीर्थ’ कहते हैं | यह मुंडपृष्ठ और नग आदि तीर्थ की अपेक्षा सारसे भी सार वास्तु है | इसे ‘आभ्यन्तर-तीर्थ’ कहा गया है | जिसमें लक्ष्मी, कामधेनु गौ, जल और पृथ्वी सभी फलदायक होते है तथा जिससे दृष्टी रमणीय, मनोहर वस्तुएँ फलित होती हैं, वह ‘फल्गु-तीर्थ’ है | फल्गु-तीर्थ किसी हलके फुलके तीर्थ के समान नहीं हैं | फल्गु-तीर्थ में स्नान करके मनुष्य भगवान् गदाधर का दर्शन करे तो इससे पुण्यात्मा पुरुषों को क्या नहीं प्राप्त होता ? भूतलपर समुद्र पर्यन्त जितने भी तीर्थ और सरोवर हैं, वे सब प्रतिदिन एक बार फल्गु-तीर्थ में जाया करते हैं | जो तीर्थराज फल्गु-तीर्थ में श्रद्धा के साथ स्नान करता हैं, उसका वह स्नान पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति करानेवाला तथा अपने लिये भोग और मोक्ष की सिद्धि करनेवाला होता हैं ||२५-३०||
श्राद्धकर्ता पुरुष स्नान के पश्च्यात भगवान् ब्रह्माजी को प्रणाम करे | (उससमय इसप्रकार कहे ) – ‘कलियुग में सब लोग महेश्वर के उपासक हैं, किन्तु इस गया तीर्थ में भगवान् गदाधर उपास्यदेव हैं | यहाँ लिंगस्वरूप ब्रह्माजी का निवास हैं, उन्हीं महेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ | भगवान् गदाधर (वासुदेव), बलराम (संकर्षण), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रम्हा, विष्णु, नृसिंह तथा वराह आदिको मैं प्रणाम करता हूँ |’ तदनन्तर श्रीगदाधर का दर्शन करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियों का उद्धार कर देता हैं | दुसरे दिन धर्मारण्य-तीर्थ का दर्शन करे | वहाँ मतंग मुनि के श्रेष्ठ आश्रम में मतंग वापी के जलमें स्नान करके श्राद्धकर्ता पुरुष पिंडदान करे | वहाँ मतंडेश्वर एवं सुसिद्धेश्वर को मस्तक झुकाकर इसप्रकार कहे – ‘सम्पूर्ण देवता प्रमाणभूत होकर रहें, समस्त लोकपाल साक्षी हों, मैंने इस मतंग-तीर्थ में आकर पितरों का उद्धार कर दिया |’ तत्पस्च्यात ब्राह्मतीर्थ नामक कूप में स्नान, तर्पण और श्राद्ध आदि करे | उस कूप और यूप के मध्यभाग में किया हुआ श्राद्ध सौ पीढ़ियों का उद्धार करनेवाला हैं | वहाँ धर्मात्मा पुरुष महाबोधि वृक्ष को नमस्कार करके स्वर्गलोक का भागी होता है | तीसरे दिन नियम एवं व्रत का पालन करनेवाला पुरुष ‘ब्रह्म-सरोवर/ नामक तीर्थ में स्नान करे | उससमय इसप्रकार प्रार्थना करे – मैं ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित ब्रह्म-सरोवर-तीर्थ में पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति कराने के लिये स्नान करता हूँ |’ श्राद्धकर्ता पुरुष तर्पण करके पिंडदान दे | फिर वृक्ष को सीचें | जो वाजपेय–यज्ञ का फल पाना चाहता हो, वह ब्रह्माजीद्वारा स्थापित यूप की प्रदक्षिणा करे ||३१-३९||
उस तीर्थ में एक मुनि रहते थे, वे जल का घडा और कुश का अग्रभाग हाथ में लिये आम के पेड़ की जडमें पानी देते थे | इससे आम भी सींचे गये और पितरों की भी तृप्ति हुई | इसप्रकार एक ही क्रिया दो प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हो गयी | ब्रह्माजी को नमस्कार करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियों का उद्धार कर देता हैं | चौथे दिन फल्गु-तीर्थ में स्नान करके देवता आदि का तर्पण करे | फिर गयाशिर्ष में श्राद्ध और पिंडदान करे | गया का क्षेत्र पाँच कोसका हैं | उसमें एक कोस केवल ‘गयाशिर्ष’ हैं | उसमें पिंडदान करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियों का उद्धार कर सकता हैं | परम बुद्धिमान महादेवजी ने मुंडपृष्ठ में अपना पैर रखा हैं | मुंडपृष्ठ में ही गयासुर का साक्षात सिर हैं, अतएव उसे ‘गया-शिर’ कहते हैं | जहाँ साक्षात गयाशिर्ष हैं, वहीँ फल्गु-तीर्थ का आश्रय है | फल्गु अमृत की धारा बहाती है | वहाँ पितरों के उद्देश्यसे किया हुआ दान अक्षय होता है | दशाश्वमेघ तीर्थ में स्नान तथा ब्रह्माजी का दर्शन करके महादेवजी के चरण (रुद्र्पाद) का स्पर्श करनेपर मनुष्य पुन: इस लोक में जन्म नहीं लेता | गयाशीर्ष में शमी के पत्ते बराबर पिंड देने से भी नरकों में पड़े हुए पितर स्वर्ग को चले जाते हैं और स्वर्गवासी पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है | वहाँ खीर, आटा, सत्तू, चरु और चावलसे पिंडदान करे | तिलमिश्रित गेहूँ से भी रुद्र्पाद में पिंडदान करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियों का उद्धार कर सकता हैं ||४०-४८||
इसप्रकार ‘विष्णुपदी’ में भी श्राद्ध और पिंडदान करनेवाला पुरुष पितृ-ऋण से छुटकारा पाता है और पिता आदि ऊपरकी सौ पीढ़ियों तथा अपने को भी तार देता हैं | ‘ब्रह्मपद’ में श्राद्ध करनेवाला मानव अपने पितरों को ब्रह्मलोक में पहुँचाता हैं | दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य-अग्नि तथा आहवनीय-अग्नि के स्थान में श्राद्ध करनेवाला पुरुष यज्ञफल का भागी होता है | आवसथ्याग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, गणेश, अगस्त्य और कार्तिकेय के स्थान में श्राद्ध करनेवाला मनुष्य अपने कुल का उद्धार कर देता है | मनुष्य सूर्य के रथ को नमस्कार करके कर्णादित्य को मस्तक झुकावे | कनकेश्वर के पद को प्रणाम करके गया-केदार-तीर्थ को नमस्कार करे | इससे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पाकर अपने पितरों को ब्रह्मलोक में पहुँचा देता हैं | विशाल भी गयाशीर्ष में पिंडदान करनेसे पुत्रवान हुए |
कहते हैं, विशाला नगरीमें एक ‘विशाल’ नामसे प्रसिद्ध राजपुत्र थे | उन्होंने ब्राह्मणों से पूछा – ‘मुझे पुत्र आदि की उत्पत्ति किसप्रकार होगी? ‘ यह सुनकर ब्राह्मणों ने विशाल से कहा – ‘गया में पिंडदान करनेसे तुम्हें सब कुछ प्राप्त होगा |’ तब विशाल ने भी गयाशीर्ष में पितरों को पिंडदान किया | उससमय आकाश में उन्हें तीन पुरुष दिखायी दिये, जो क्रमश: श्वेत, लाल और काले थे | विशाल ने उनसे पूछा – ‘आप लोग कौन है ?’ उनमें से एक श्वेतवर्णवाले पुरुष ने विशाल से कहा – ‘मैं तुम्हारा पिता हूँ; मेरा वर्ण श्वेत हैं; अपने शुभकर्म से इन्द्रलोक में गया था | बेटा ! ये लाल रंगवाले मेरे पिता और काले रंगवाले मेरे पितामह थे | ये नरक में पड़े थे; तुमने हम सबको मुक्त कर दिया | तुम्हारे पिंडदान से हमलोग ब्रह्मलोक में जा रहे हैं |’ यों कहकर वे तीनों चले गये | विशाल को पुत्र-पौत्र आदि को प्रप्ति हुई | उन्होंने राज्य भोगकर मृत्यु के पश्च्यात भगवान् श्रीहरि को प्राप्त कर लिया ||४९-५९||
एक प्रेतों का राजा था, जो अन्य प्रेतों के साथ बहुत पीड़ित रहता था | उसने एक दिन एक वणिक से अपनी मुक्ति के लिये इसप्रकार कहा – ‘भाई ! हमारे द्वारा एक ही पुण्य हुआ था, जिसका फल यहाँ भोगते हैं | पूर्वकाल में एक बार श्रवण नक्षत्र और द्वादशी तिथि का योग आनेपर हमने अन्न और जलसहित कुम्भदान किया था; वही प्रतिदिन मध्याह्न के समय हमारी जीवन-रक्षा के लिये उपस्थित होता है | तुम हमसे धन लेकर गया जाओ और हमारे लिये पिंडदान करो |’ वणिक ने उससे धन लिया और गया में उसके निमित्त पिंडदान किया | उसका फल यह हुआ कि वह प्रेतराज अन्य सब प्रेतों के साथ मुक्त होकर श्रीहरि के धाम में जा पहुँचा | गयाशीर्ष में पिंडदान करनेसे मनुष्य अपने पितरों का तथा अपना भी उद्धार कर देता हैं ||६०-६३||
वहाँ पिंडदान करते समय इसप्रकार कहना चाहिये – ‘मेरे पिताके कुल में तथा माता के वंश में और गुरु, श्वशुर एवं बंधुजनों के वंश में जो मृत्यु को प्राप्त हुए हैं, उनके अतिरिक्त भी जो बंधू-बांधव मरे हैं, मेरे कुल में जिनका श्राद्ध कर्म-पिंडदान आदि लुप्त हो गया है, जिनके कोई स्त्री-पुत्र नहीं रहा हैं, जिनके श्राद्धकर्म नहीं होने पाये हैं, जो जन्मके अंधे, लँगड़े और विकृत रूपवाले रहे हैं, जिनका अपक्व गर्भ के रूप में निधन हुआ है, इसप्रकार जो मेरे दिये हुए इस पिंडदान से सदा के लिये तृप्त हो जायँ | जो कोई मेरे पितर प्रेतरूप से स्थित हों, वे सब यहाँ पिंड देने से सदा के लिये तृप्ति को प्राप्त हों |’ अपने कुल को तारनेवाली सभी संतानों का कर्तव्य हैं कि वे अपने सम्पूर्ण पितरों के उद्देश्य से वहाँ पिंड दें तथा अक्षय लोक की इच्छा रखनेवाले पुरुष को अपने लिये भी पिंड अवश्य देना चाहिये ||६४-६८||
बुद्धिमान पुरुष पाँचवे दिन ‘गदालोल’ नामक तीर्थ में स्नान करे | उससमय इस मन्त्र का पाठ करे –‘भगवान् जनार्दन ! जिसमें आपकी गदा का प्रक्षालन हुआ था, उस अत्यंत्य पावन ‘गदालोल’ नामक तीर्थ में मैं संसाररूपी रोग की शान्ति के लिये स्नान करता हूँ ||६९||
‘अक्षय स्वर्ग प्रदान करनेवाले अक्षयवट को नमस्कार है | जो पिता-पितामह आदि के लिये अक्षय आश्रय है तथा सब पापों का क्षय करनेवाला हैं, उस अक्षय वट को नमस्कार है |’ यों प्रार्थना कर वट के नीचे श्राद्ध करके ब्राह्मण भोजन करावे ||७०-७१||
वहाँ एक ब्राह्मण को भोजन कराने से कोटि ब्राह्मणों को भोजन करानेका पुण्य होता हैं | फिर यदि बहुत से ब्राह्मणों को भोजन कराया जाय, तब तो उसके पुण्यका क्या कहना हैं ? वहाँ पितरों के उद्देश्य से जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय होता है | पितर उसी पुत्र से अपने को पुत्रवान मानते हैं, जो गया में जाकर उनके लिये अन्नदान करता हैं | वट तथा वटेश्वर को नमस्कार करके अपने प्रपितामह का पूजन करे | ऐसा करनेवाला पुरुष अक्षय लोक में जाता हैं और अपनी सौ पीढ़ियों का उद्धार कर देता हैं | क्रम से हो या बिना क्रमसे, गया की यात्रा महान फल देनेवाली होती है ||७२-७४||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गया-यात्रा की विधि का वर्णन’ नामक अडतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||४८||
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