अध्याय – 047 गया – माहात्म्य

अध्याय – 047 
गया – माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं – अब मैं गया के माहात्म्य का वर्णन करूँगा | गया श्रेष्ठ तीर्थों में सर्वोत्तम है | एक समय की बात हैं – गय नामक असुर ने बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की | उससे देवता संतप्त हो उठे और उन्होंने क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णु के समीप जाकर कहा – ‘भगवन ! आप गयासुरसे हमारी रक्षा कीजिये |’ ‘तथास्तु’ कहकर श्रीहरि गयासुर के पास गये और उससे बोले – ‘कोई वर माँगो |’ दैत्य बोला – ‘भगवन ! मैं सब तीर्थो से अधिक पवित्र हो जाऊँ |’

भगवान ने कहा – ‘ऐसा ही होगा |’ – यों कहकर भगवान चले गये | फिर तो सभी मनुष्य उस दैत्य का दर्शन करके भगवान् के समीप जा पहुँचे | पृथ्वी सूनी हो गयी | स्वर्गवासी देवता और ब्रह्मा आदि प्रधान देवता श्रीहरि के निकट जाकर बोले – ‘देव ! श्रीहरि ! पृथ्वी और स्वर्ग सूने हो गये | दैत्य के दर्शनमात्र से सब लोग आपके धाम में चले गये हैं |’

यह सुनकर श्रीहरि ने ब्रह्माजी से कहा – ‘तुम सम्पूर्ण देवताओं के साथ गयासुर के पास जाओ और यज्ञभूमि बनाने के लिये उसका शरीर माँगो |’ भगवान् का यह आदेश सुनकर देवताओंसहित ब्रह्माजी गयासुर के समीप जाकर उससे बोले – ‘दैत्यप्रवर ! मैं तुम्हारे द्वारपर अतिथि होकर आया हूँ और तुम्हारे पावन शरीर को यज्ञ के लिये माँग रहा हूँ ‘ ||१-६||

‘तथास्तु’ कहकर गयासुर धरतीपर लेट गया | ब्रह्माजी ने उसके मस्तकपर यग्य आरम्भ किया | जब पूर्णाहुति का समय आया, तब गयासुर का शरीर चंचल हो उठा | यह देख प्रभु ब्रह्माजी ने पुन: भगवान् विष्णु से कहा – ‘देव ! गयासुर पूर्णाहुति के समय विचलित हो रहा है |’ तब श्रीविष्णु ने धर्म को बुलाकर कहा – ‘तुम इस असुर के शरीरपर देवमयी शिला रख दो और सम्पूर्ण देवता उस शिलापर बैठ जायँ | देवताओं के साथ मेरी गदाधरमूर्ति भी इसपर विराजमान होगी |’ यह सुनकर धर्म ने देवमयी विशाल शिला उस दैत्य के शरीरपर रख दी | (शिला का परिचय इसप्रकार है ) – धर्म से उनकी पत्नी धर्मवती के गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई थी, जिसका नाम ‘धर्मंव्रता’ था | वह बड़ी तपस्विनी थी | ब्रह्मा के पुत्र महर्षि मरीचि ने उसके साथ विवाह किया | जैसे भगवान् विष्णु श्रीलक्ष्मीजी के साथ और भगवान् शिव श्रीपार्वतीजी के साथ विहार करते हैं, उसीप्रकार महर्षि मरीचि धर्मव्रता के साथ रमण करने लगे ||७-११||

एक दिन की बात है | महर्षि जंगल से कुषा और पुष्प आदि ले आकर बहुत थक गये थे | उन्होंने भोजन करके धर्मव्रता से कहा – ‘प्रिये ! मेरे पैर दबाओ |’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर प्रिया धर्मवता थके-माँदे मुनि के चरण दबाने लगी | मुनि सो गये; इतने में ही वहाँ ब्रह्माजी आ गये | धर्मव्रता ने सोचा –‘ मैं ब्रह्माजी का पूजन करूँ या अभी मुनि की चरण-सेवा में ही लगी रहूँ | ब्रह्माजी गुरुके भी गुरु हैं – मेरे पति के भी पूज्य हैं; अत: इनका पूजन करना ही उचित है |’ ऐसा विचारकर वह पूजन – समाग्रियों से ब्रह्माजी की पूजा में लग गयी | नींद टूटनेपर जब मरीचि मुनि ने धर्मव्रता को अपने समीप नहीं देखा, तब आज्ञा-उल्लघन के अपराध से उसे शाप देते हुए कहा – ‘तू शिला हो जायगी |’ यह सुनकर धर्मव्रता कुपित हो उनसे बोली – ‘मुने ! चरण – सेवा छोडकर मैंने आपके पूज्य पिता की पूजा की हैं, अत: मैं सर्वथा निर्दोष हूँ; ऐसी दशामें भी आपने मुझे शाप दिया है, अत: आपको भी भगवान् शिव से शाप की प्राप्ति होगी |’ यों कहकर धर्मव्रता ने शाप को पृथक रख दिया और स्वयं अग्नि में प्रवेश करके वह हजारों वर्षोंतक कठोर तपस्या में संलग्न रही | इससे प्रसन्न होकर श्रीविष्णु आदि देवताओं ने कहा – ‘वर माँगो |’ धर्मव्रता देवताओं से बोली –‘आपलोग मेरे शाप को दूर कर दें ‘ ||१२-१८||

देवताओं ने कहा – शुभे ! महर्षि मरीचि का दिया हुआ शाप अन्यथा नहीं होगा | तुम देवताओं के चरण-चिन्ह से अंगित परमपवित्र शिला होओगी | गयासुर के शरीर को स्थिर रखने के लिये तुम्हें शिला का स्वरुप धारण करना होगा | उस समय तुम देवव्रता, देवशिला, सर्वदेवस्वरूपा, सर्वतीर्थमयी तथा पुण्यशिला कहलाओगी ||१९-२०||

देवव्रता बोली – देवताओं ! यदि आपलोग मुझपर प्रसन्न हों तो शिला होने के बाद मेरे ऊपर ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र आदि देवता और गौरी-लक्ष्मी आदि देवियाँ सदा विराजमान रहें ||२१||
अग्निदेव कहते हैं – देवव्रता की बात सुनकर सब देवता ‘तथास्तु’ कहकर स्वर्ग को चले गये | उस देवमयी शिला को ही धर्म ने गयासुर के शरीरपर रखा | परन्तु वह शिला के साथ ही हिलने लगा | यह देख रूद्र आदि देवता भी उस शिलापर जा बैठे | अब वह देवताओं को साथ लिये हिलने-डोलने लगा | तब देवताओं ने क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया | श्रीहरि ने उनको अपनी गदाधरमूर्ति प्रदान की और कहा – ‘देवगण ! आपलोग चलिये; इस देवगम्य मूर्ति के द्वारा मैं स्वयं ही वहाँ उपस्थित होऊँगा |’ इस प्रकार उस दैत्य के शरीर को स्थिर रखने के लिये व्यक्ताव्यक्त उभयस्वरुप साक्षात गदाधारी भगवान् विष्णु वहाँ स्थित हुए | वे आदि-गदाधर के नामसे उस तीर्थमें विराजमान हैं ||२२-२५||

पूर्वकाल में ‘गद’ नामसे प्रसिद्ध एक भयंकर असुर था | उसे श्रीविष्णु ने मारा और उसकी हड्डियों से विश्वकर्मा ने गदा का निर्माण किया | वही ‘आदि-गदा’ है | उस आदि-गदा के द्वारा भगवान् गदाधर ने ‘हेति’ आदि राक्षसों का वध किया था, इसलिए वे ‘आदि-गदाधर’ कहलाये | पूर्वोक्त देवमयी शिलापर आदि-गदाधर के स्थित होनेपर गयासुर स्थिर हो गया; तब ब्रह्माजी ने पूर्णाहुति दी | तदनन्तर गयासुर ने देवताओं से कहा – ‘किसलिये मेरे साथ वंचना की गयी है? क्या मैं भगवान् विष्णु के कहनेमात्र से स्थिर नहीं हो सकता था ? देवताओं ! यदि आपने मुझे शिला आदि के द्वारा दबा रखा हैं, तो आपको मुझे वरदान देना चाहिये’ ||२६-३०||

देवता बोले – ‘दैत्यप्रवर ! तीर्थ-निर्माण के लिये हमने तुम्हारे शरीर को स्थिर किया है; अत: यह तुम्हारा क्षेत्र भगवान् विष्णु, शिव तथा ब्रह्माजी का निवास-स्थान होगा | सब तीर्थों से बढकर इसकी प्रसिद्धी होगी तथा पितर आदिके लिये यह क्षेत्र ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाला होगा |’ – यों कहकर सब देवता वहीँ रहने लगे | देवियों और तीर्थ आदि ने भी उसे अपना निवास-स्थान बनाया | ब्रम्हाजी ने यज्ञ पूर्ण करके उस समय ऋत्विजों को दक्षिणाए दी | पाँच कोस का गया-क्षेत्र और पचपन गाँव अर्पित किये | यही नहीं, उन्होंने सोने के अनेक पर्वत बनाकर दिये | दूध और मधु की धारा बहनेवाली नदियाँ समर्पित कीं | दही और घी के सरोवर प्रदान किये | अन्न आदिके बहुत से पहाड़, कामधेनु गाय, कल्पवृक्ष तथा सोने-चाँदी के घर भी दिये | भगवान् ब्रह्मा ने ये सब वस्तुएँ देते समय ब्राह्मणों से कहा – ‘विप्रवरों ! अब तुम मेरी अपेक्षा अल्प-शक्ति रखनेवाले अन्य व्यक्तियों से कभी याचना न करना |’ यों कहकर उन्होंने वे सब वस्तुएँ उन्हें अर्पित कर दिन ||३१-३५||

तत्पश्च्यात धर्म ने यज्ञ किया | उस यज्ञ में लोभवश धन आदि का दान लेकर जब वे बाह्मण पुन: गया में स्थित हुए, तब ब्रह्माजी ने उन्हें शाप दिया – ‘अब तुमलोग विद्याविहीन और लोभी हो जायोगे | इन नदियों में अब दूध आदि का अभाव हो जायगा और ये सुवर्ण-शैल भी पत्थर मात्र रह जायेंगे |’ तब ब्राह्मणों ने ब्रह्माजी से कहा – ‘भगवन ! आप के शाप से हमारा सब कुछ नष्ट हो गया | अब हमारी जीविका के लिये कृपा कीजिये |’ यह सुनकर वे ब्राह्मणों से बोले – ‘अब इस तीर्थसे ही तुम्हारी जीविका चलेगी | जबतक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे, तबतक इसी वृत्तिसे तुम जीवननिर्वाह करोगे | जो लोग गया-तीर्थ में आयेंगे, वे तुम्हारी पूजा करेंगे | जो हव्य, कव्य, धन और श्राद्ध आदि के द्वारा तुम्हारा सत्कार करेंगे, उनकी सौ पीढ़ियों के पितर नरक से स्वर्गमें चले जायेंगे और स्वर्ग में ही रहनेवाले पितर परमपद को प्राप्त होंगे’ ||३६-४०||

महाराज गय ने भी उस क्षेत्र में बहुत अन्न और दक्षिणा से सम्पन्न यज्ञ किया था | उन्हीं के नाम से गयापुरी की प्रसिद्धि हुई | पांडवों ने भी गया में आकर श्रीहरि की आराधना की थी ||४१||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गया-माहात्म्य-वर्णन’ नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||४७||

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