अध्याय – 046 नर्मदा माहात्म्य

अध्याय – 046 
नर्मदा माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं – अब मैं नर्मदा आदि का माहात्म्य बाताऊँगा | नर्मदा श्रेष्ठ तीर्थ है | गंगा का जल स्पर्श करनेपर मनुष्य को तत्काल पवित्र करता हैं, किन्तु नर्मदा का जल दर्शनमात्र से ही पवित्र कर देता हैं | नर्मदातीर्थ सौ योजन लंबा और दो योजन चौड़ा है | अमरकण्टक पर्वत के चारों ओर नर्मदा सम्बन्धी साठ करोड़, साठ हजार तीर्थ है | कावेरी संगमतीर्थ बहुत पवित्र है | अब श्रीपर्वत का वर्णन सुनो ||१-३||

एक समय गौरी ने श्रीदेवी का रूपधारण करके भारी तपस्या की | इससे प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें वरदान देते हुए कहा – “देवि ! तुम्हें अध्यात्म-ज्ञान प्राप्त होगा और तुम्हारा यह पर्वत ‘श्रीपर्वत’ के नामसे विख्यात होगा | इसके चारों ओर सौ योजनतक का स्थान अत्यंत पवित्र होगा |” यहाँ किया हुआ दान, तप, जप तथा श्राद्ध सब अक्षय होता है | यह उत्तम तीर्थ सब कुछ देनेवाला है | यहाँ की मृत्यु शिवलोक की प्राप्ति करानेवाली है | इस पर्वतपर भगवान् शिव सदा पार्वतीदेवी के साथ क्रीडा करते हैं तथा हिरण्यकशिपु यहीं तपस्या करके अत्यंत बलवान हुआ था | मुनियों ने भी यहाँ तपस्या से सिद्धि प्राप्त की है ||४-७||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नर्मदा-माहात्म्य वर्णन’ नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||४३||

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