अध्याय – 045 वाराणसी का माहात्म्य

अध्याय – 045 
वाराणसी का माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं – वाराणसी परम उत्तम तीर्थ है | जो वहाँ श्रीहरि का नाम लेते हुए निवास करते हैं, उन सबको वह भोग और मोक्ष प्रदान करता हैं | महादेवजी ने पार्वती से उसका माहात्म्य इसप्रकार बतलाया हैं ||१||

महादेवजी बोले – गौरि ! इस क्षेत्र को मैंने कभी मुक्त नहीं किया –सदा ही वहाँ निवास किया हैं, इसलिये यह ‘अविमुक्त’ कहलाता है | अविमुक्त – क्षेत्र में किया हुआ जप, तप, होम और दान अक्षय होता है | पत्थर से दोनों पैर तोडकर बैठ रहे, परन्तु काशी कभी न छोड़े | हरिश्चन्द्र, आम्रातकेश्वर, जप्येश्वर, श्रीपर्वत, महालय, भृगु, चंडेश्वर और केदारतीर्थ – ये आठ अविमुक्त – क्षेत्र में परम गोपनीय तीर्थ हैं |

मेरा अविमुक्त-क्षेत्र सब गोपनीयोंमें भी परम गोपनीय हैं | वह दो योजन लंबा और आधा योजन चौड़ा है | ’वरणा’ और ‘नासी’ (असी) – इन दो नदियों के बीचमें ‘वाराणसीपूरी’ है | इसमें स्नान, जप, होम, मृत्यु, देवपूजन, श्राद्ध, दान और निवास – जो कुछ होता है, वह सब भोग एवं मोक्ष प्रदान करता हैं ||२-७||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘वाराणसी-माहात्म्यवर्णन’ नामक पैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||४५||

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