अध्याय – 044 प्रयाग माहात्म्य
अध्याय – 044
प्रयाग माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं – ब्रह्मन ! अब मैं प्रयाग का माहात्म्य बताता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला तथा उत्तम है | प्रयाग में ब्रम्हा, विष्णु आदि देवता तथा बड़े-बड़े मुनिवर निवास करते हैं | नदियाँ, समुद्र, सिद्ध, गंधर्व तथा अप्सराएँ भी उस तीर्थ में वास करती हैं | प्रयाग में तीन अग्निकुंड हैं | उनके बीच में गंगा सब तीर्थों को साथ लिये बड़े वेग से बहती हैं | वहाँ त्रिभुवन- विख्यात सुर्यकन्या यमुना भी हैं | गंगा और यमुना का मध्यभाग पृथ्वी का ‘जघन’ माना गया हैं और प्रयाग को ऋषियों ने जघन के बीच का ‘उपस्थ भाग’ बताया हैं ||१-४||
प्रतिष्ठान (झूसी) सहित प्रयाग, कम्बल और अश्वतर नाग तथा भोगवती तीर्थ – वे ब्रह्माजी के यज्ञ की वेदी कहे गये हैं | प्रयाग में वेद और यज्ञ मूर्तिमान होकर रहते हैं | उस तीर्थ के स्तवन और नाम कीर्तन से तथा वहाँ की मिटटी का स्पर्श करनेमात्र से भी मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है | प्रयाग में गंगा और यमुना के सगमपर किये हुए दान, श्राद्ध और जप आदि अक्षय होते हैं ||५-७||
ब्रह्मन ! वेद अथवा लोक – किसी के कहने से भी अंतमे प्रयागतीर्थ के भीतर मरने का विचार नहीं छोड़ना चाहिये | प्रयाग में साथ करोड़, दस हजार तीर्थो का निवास हैं; अत: वह सबसे श्रेष्ठ है | वासुकि नाग का स्थान, भोगवती तीर्थ और हंसप्रपतन – ये उत्तम तीर्थ हैं | कोटि गोदान से जो फल मिलता हैं, वाही इनमें तीन दिनोंतक स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है | प्रयाग में माघ मास में मनीषी पुरुष ऐसा कहते हैं कि ‘गंगा सर्वत्र सुलभ हैं; किन्तु गंगाद्वार, प्रयाग और गंगा-सागर-संगम- इन तीन स्थानों में उनका मिलना बहुत कठिन है |’ प्रयाग में दान देनेसे मनुष्य स्वर्ग में जाता है और इस लोक में आनेपर राजाओं का भी राजा होता है ||८-१२||
अक्षयवट के मूल के समीप और संगम आदि में मृत्यु को प्राप्त हुआ मनुष्य भगवान् विष्णु के धाम में जाता है | प्रयाग में परम रमणीय उर्वशी-पुलिन, संध्यावट, कोटितीर्थ, दशाश्वमेध घाट, गंगा-यमुना का उत्तम संगम, रजोहीन मानसतीर्थ तथा वासरक तीर्थ – ये सभी परम उत्तम हैं ||१३-१४||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन’ नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||४४||
Comments
Post a Comment