अध्याय – 043 गणपति पूजन की विधि और गंगाजी की महिमा

अध्याय – 043 
गणपति पूजन की विधि और गंगाजी की महिमा
भगवान् महेश्वर ने कहा – कार्तिकेय ! मैं विघ्नों के विनाश के लिये गणपति पूजा की विधि बतलाता हूँ, जो सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थो को सिद्ध करनेवाली हैं | ‘गणंजयाय स्वाहा’ – हृदय, ‘एकदंष्ट्राय हुं फट’ – सिर, ‘अचलकर्णिने नमो नम: |’– शिखा, ‘गजवक्त्राय नमो नम: |’ – कवच, ‘महोदराय चन्डाय नम: |’ – नेत्र एवं ‘सुदंडहस्ताय हुं फट |’ – अस्त्र है | इन मंत्रोद्वारा अंगन्यास करे | गण, गुरु, गुरु-पादुका, शक्ति, अनंत और धर्म – इनका मुख्य कमल-मंडल के ऊर्ध्व तथा निम्न दलों में पूजन करे एवं कमलकर्णिका में बीज की अर्चना करे | तीव्रा, ज्वालिनी, नंदा, भोगदा, कामरूपिणी, उग्रा, तेजोवती, सत्या एवं विघ्ननाशिनी – इन नौ पीठशक्तियों की भी पूजा करे | फिर चंदन के चूर्ण को आसन समर्पित करे | ‘यं’ शोषकवायु, ‘रं’ अग्नि, ‘लं’ प्लव (पृथ्वी) तथा ‘वं ‘ अमृत का बीज माना गया है |

‘ॐ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् |’ – यह गणेश-गायत्री-मन्त्र है | गणपति, गणाधिप, गणेश, गणनायक, गणक्रीड, वक्रतुंड, एकदंष्ट्र, महोदर, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, धुम्रवर्ण तथा इंद्र आदि दिक्पाल – इन सबका गणपति की पूजा में अंगरूप से पूजन करे ||१-८||

गंगाजी की महिमा
अग्निदेव कहते हैं – अब गंगा का माहात्म्य बतलाता हूँ | गंगा का सदा सेवन करना चाहिये | वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं | जिनके बीचसे गंगा बहती हैं, वे सभी देश श्रेष्ठ तथा पावन हैं | उत्तम गति की खोच करनेवाले प्राणियों के लिये गंगा ही सर्वोत्तम गति हैं | गंगा का सेवन करनेपर वह माता और पिता – दोनों के कुलों का उद्धार करती हैं | एक हजार चान्द्रायण-व्रत की अपेक्षा गंगाजी के जल का पीना उत्तम हैं | एक मास गंगाजी का सेवन करनेवाला मनुष्य सब यज्ञों का फल पाता हैं ||९-१२||

गंगादेवी सब पापों को दूर करनेवाली तथा स्वर्गलोक देनेवाली हैं | गंगा के जल में जबतक हड्डी पड़ी रहती है, तबतक वह जीव स्वर्ग में निवास करता हैं | अंधे आदि भी गंगाजी का सेवन करके देवताओं के समान हो जाते हैं | गंगा-तीर्थ से निकली हुई मिटटी धारण करनेवाला मनुष्य सूर्यके समान पापों का नाशक होता हैं | जो मानव गंगा का दर्शन, स्पर्श, जलपान अथवा ‘गंगा’ इस नाम का कीर्तन करता हैं, वह अपनी सैकड़ो-हजारों पीढ़ियों के पुरुषों को पवित्र कर देता हैं ||१३-१६||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गणपतिजी व गंगाजी की महिमा’ नामक त्रेचालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||४३||

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