अध्याय – 036 भगवान् विष्णु के लिये पवित्रारोपण की विधि
अध्याय – 036
भगवान् विष्णु के लिये पवित्रारोपण की विधि
साधक पवित्रारोपण से अपनी सौ पूर्व पीढ़ियों का उद्धार करके दस पहले और दस बाद की पीढ़ियों को विष्णुलोक में स्थापित करता और स्वयं भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है |
अग्निदेव कहते हैं – मुने ! परत:काल स्नान आदि करके, द्वारपालों का पूजन करने के पश्च्यात गुप्त स्थान में प्रवेश करके, पूर्वाधिवासित पवित्रक में से एक लेकर प्रसादरूप से धारण कर ले | शेष द्रव्य-वस्त्र, आभूषण, गंध एवं सम्पूर्ण निर्माल्य को हटाकर भगवान् को स्नान कराने के पश्च्यात उनकी पूजा करे | पंचामृत, कषाय एवं शुद्ध गंधोदक से नहलाकर भगवान् के निमित्त पहलेसे रखे हुए वस्त्र, गंध और पुष्प को उनकी सेवामें प्रस्तुत करे | अग्नि में नित्यहोम की भाँती हवन करके भगवान् की स्तुति-प्रार्थना करने के अनन्तर उनके चरणों में मस्तक नवावे | फिर अपने समस्त कर्म भगवान् को अर्पित करके उनकी नैमित्तिकी पूजा करे | द्वारपाल, विष्णु, कुम्भ और वर्धनी की प्रार्थना करे | ‘अतो देवो:’ इत्यादि मन्त्र से, अथवा मूलमंत्र से कलशपर श्रीहरि की स्तुति-प्रार्थना करे – ‘हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! आपको नमस्कार है | इस पवित्रक को ग्रहण कीजिये | यह उपासक को पवित्र करने के लिये है और वर्षभर की हुई पूजा के सम्पूर्ण फल को देनेवाला है | नाथ ! पहले मुझसे जो दुष्कृत (पाप) बन गया हो, उसे नष्ट करके आप मुझे परम पवित्र बना दीजिये | देव ! सुरेश्वर ! आपकी कृपा से मैं शुद्ध हो जाऊँगा |’
ह्रदय, सर आदि मंत्रोद्वारा पवित्रक का तथा अपना भी अभिषेक करके विष्णुकलश का भी प्रोक्षण करने के बाद भगवान् के समीप जाय | उनके रक्षाबंधन को हटाकर उन्हें पवित्रक अर्पण करे और कहे – ‘प्रभो ! मैंने जो ब्रह्मसूत्र तैयार किया है, इसे आप ग्रहण करे | यह कर्म की पूर्तिका साधक है; अत: इस पवित्ररोपण कर्म को आप इस तरह सम्पन्न करें, जिससे मुझे दोष का भागी न होना पड़े’ ||१-९||
द्वारपाल, योगपीठासन तथा मुख्य गुरुओं को पवित्रक चढ़ावे | इनमें कनिष्ठ श्रेणीका (नाभितकका) पवित्रक द्वारपालों को, माध्यम श्रेणीका (जाँघतक लटकनेवाला) पवित्रक योगपीठासन को और उत्तम (घुटनेतक का)पवित्रक गुरुजनों को दे | साक्षात भगवान् को मूल-मन्त्र से वनमाला (पैरोंतक लटकनेवाला पवित्रक) अर्पित करे | ‘नमो विश्वक्सेनाय’ मन्त्र बोलकर विश्वक्सेन को भी पवित्रक चढ़ावे | अग्निमें होम करके अग्निस्थ विश्वादि देवताओं को पवित्रक अर्पित करे | तदनंतर पूजन के पश्च्यात मूल-मन्त्र से प्रायश्चित्त के उद्देश्य से पूर्णाहुति देनी चाहिये | मणि या मुन्गों की मालाओं से अथवा मन्दार-पुष्प आदिसे अष्टोत्तरशत की गणना करनी चाहिये | अन्तमें भगवान् से उस प्रकार प्रार्थना करे –‘गरुडध्वज ! यह आपकी वार्षिक पूजा सफल हो | देव! जैसे वनमाला आपके वक्ष:स्थल में सदा शोभा पाती है, उसी तरह पवित्रक के इन तंतुओं को और इनके द्वारा की गयी पूजा को भी आप अपने ह्रदय में धारण करें | मैंने इच्छासे या अनिच्छा से नियमपूर्वक की जानेवाली पूजामें जो त्रुटियाँ की हैं, विघ्नवश विधि के पालन में जो न्यूनता हुई है, अथवा कर्मलोप का प्रसंग आया है, वह सब आपकी कृपा से पूर्ण हो जाय | मेरे द्वारा की हुई आपकी पूजा पूर्णत: सफल हो ‘ ||१०-१५||
इसप्रकार प्रार्थना और नमस्कार करके अपराधों के लिये क्षमा माँगकर पवित्रक को मस्तकपर चढ़ावे | फिर यथायोग्य बलि अर्पित करके दक्षिणाद्वारा वैष्णव गुरु को संतुष्ट करे | यथाशक्ति एक दिन या एक पक्षतक ब्राह्मणों को भोजन-वस्त्र आदि से संतोष प्रदान करे | स्नानकाल में पवित्रक को उतारकर पूजा करे | उत्सव के दिन किसी को आनेसे ण रोके और सबको अनिवार्यरूप से अन्न देकर अंतमे स्वयं भी भोजन करे | विसर्जन के दिन पूजन करके पवित्रकोण का विसर्जन करे और इसप्रकार प्रार्थना करे – ‘हे पवित्रक ! मेरी इस वार्षिक पूजा को विधिवत सम्पादित करके अब तुम मेरे द्वारा विसर्जित हो विष्णुलोक को पधारो |’ उत्तर और ईशानकोण के बीच में विश्वक्सेना की पूजा करके उनके भी ब्राह्मण को दे दे | उस पवित्रक में जितने तन्तु कल्पित हुए है, उतने सहस्त्र युगोंतक उपासक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ||१६-२३||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘विष्णु-पवित्रारोपणविधि –निरूपण’ नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||३६||
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