अध्याय – 034 पावित्रारोपण के लिए पूजा-होमादि की विधि
अध्याय – 034
पावित्रारोपण के लिए पूजा-होमादि की विधि
अग्निदेव कहते हैं – मुनीश्वर ! निम्नांकित मन्त्र का उच्चारण करते हुए साधक यागमंडप में प्रवेश करे और सजावट से यज्ञ के स्थान की शोभा बढ़ावे (तथा निम्नांकित श्लोक पढकर भगवान् को नमस्कार करे ) – ‘वेंदों तथा ब्राह्मणों के हितकारी देवता अव्ययात्मा भगवान् श्रीधर को नमस्कार है |’ ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद आपके स्वरुप हैं; शब्दमात्र आपके शरीर हैं; आप भगवान् विष्णुको नमस्कार हैं | (नमो ब्रह्मण्यदेवाय श्रीधरायाव्ययात्मने | ऋग्यजु:सामरुपाय शब्ददेहाय विष्णवे ||) सायंकाल सर्वतोभद्रादि मंडल की रचना करके यजन-पूजन-सम्बन्धी द्रव्यों का संग्रह करे | हाथ-पैर धो ले | सब सामग्री को यथास्थान जँचाकर हाथ में अर्घ्य लेकर मनुष्य उसके जल से अपने मस्तक को सींचे | फिर द्वारदेश आदि में भी जल छिडके | तदनन्तर द्वारयाग (द्वारस्थ देवताओं का पूजन) आरम्भ करे | पहले तोरणेश्वरों की भलीभाँति पूजा करे | पूर्वादि दिशाओं के क्रम से अश्वत्थ, उदुम्बर, वट तथा पाकर – ये वृक्ष पूजनीय हैं | इनके सिवा पूर्व दिशामें ऋग्वेद, इंद्र तथा शोभनकी, दक्षिण में यजुर्वेद, यम तथा सुभद्र की, पश्चिम में सामवेद, वरुण तथा सुधन्वा की और उत्तर में अथर्ववेद, सोम एवं सुहोत्र की अर्चना करे ||१-५||
तोरण (फाटक) – के भीतर पताकाएँ फहरायी जायँ, दो-दो कलश स्थापित हों और कुमुद आदि दिग्गजों का पूजन हो | प्रत्यक दरवाजेपर दो-दो द्वारपालों की उनके नाम-मन्त्र से ही पूजा की जाय | पूर्व दिशामें पूर्ण और पुष्करका, दक्षिण दिशामें आनंद और नंदनका, पश्चिम में वीरसेन और सुषेण का तथा उत्तर दिशामें सम्भव और प्रभव नामक द्वारपालों का पूजन करना चाहिये | अस्त्र-मन्त्र (फट) के उच्चारणपूर्वक फुल बिखेरकर बिघ्नों का अपसारण करने के पश्च्यात मंडप के भीतर प्रवेश करे | भूतशुद्धि, न्यास और मुद्रा करके शिखा (वषट) के अन्तमें ‘फट’ जोड़कर उसका जप करते हुए सम्पूर्ण दिशाओं में सरसों छीटे | इसके बाद वासुदेव मन्त्र से गोमूत्र, संकर्षण मन्त्र से गोमय, प्रद्युम्न-मन्त्र से गोदुग्ध, अनिरुद्ध मन्त्र से दही और नारायण मन्त्र से घृत लेकर सबको घृतपात्र में एकत्र करे; अन्य वस्तुओं का भाग घीसे अधिक होना चाहिए | इन सबके मिलने से जो वस्तु तैयार होती है, उसे ‘पंचगव्य’ कहा गया है | पंचगव्य एक, दो या तीन बार अलग-अलग बनावे | इनमेंसे एक तो मंडप (तथा वहाँकी वस्तुओं) का प्रोक्षण करने के लिये हैं, दूसरा प्राशन के लिए और तीसरा स्नान के उपयोग में आता है | दस कलशों की स्थापना करके उनमें इन्द्रादि लोकपालों की पूजा करे | पूजन करके उन्हें श्रीहरि की आज्ञा सुनावे – ‘लोकपालगण ! आपको इस यज्ञ की रक्षा के लिये श्रीहरि की आज्ञा से यहाँ सदा स्थित रहना चाहिये’ ||६-१२||
याग-द्रव्य आदि की रक्षा की व्यवस्था करके विकिर (शारदातिलक (प्त्ल४ श्लोक १४-१५) में लाजा, चंदन, सरसों, भस्म, दुर्वांकुर तथा अक्षत को ‘विकिर’ कहा है | समस्त विघ्नसमूह का नाश करनेवाला है ) द्रव्यों को बिखेरे | सात बार अस्त्र-समबन्धी मूल-मन्त्र (अस्त्राय फट) – का जप करते हुए ही उक्त वस्तुओं को सब ओर बिखेरना चाहिये | फिर उसी तरह अस्त्र मन्त्र का जप करके कुश – कूर्च ले आवे | उन्हें ईशान कोण में रखकर उन्हीं के ऊपर कलश और वर्धनी को स्थापित करे | कलश में श्रीहरि का सांग पूजन करके वर्धनी में अस्त्र की अर्चना करे | वर्धनी की छिन्न धारासे यागमंडप को प्रदक्षिणाक्रम से सींचते हुए कलश को उसके उपयुक्त स्थानपर ले जाय और स्थिर आसनपर स्थापित करके उसकी पूजा करे | कलश के भीतर पंचरत्न डाले | उसके ऊपर वस्त्र लपेटे | फिर उसपर गंध आदि उपचारोंद्वारा श्रीहरि का पूजन करें | वर्धनी में भी सोने का टुकड़ा डाले | उसके बाद उसपर अस्त्र की पूजा करके, उसके वाम-भाग में पास ही, वास्तु-लक्ष्मी तथा ‘भुविनायक’ की अर्चना करे | संक्रांति आदि समय इसीप्रकार श्रीविष्णु के स्नान-अभिषेक की व्यवस्था करे | मंडप के कोणों और दिशाओं में कुल मिलकर आठ और मध्य में एक – इसप्रकार नौ पूर्ण कलशोको, जिनमे छिद्र न हों, स्थापित करके उनमे पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा पंचगव्य डाले | पूर्व आदिके कलशों में उक्त वस्तुएँ डालनी चाहिये | अग्निकोण आदि के कलशों में उक्त वास्तुओं के अतिरिक्त पंचामृतयुक्त जल अधिक डालने का विधान है | पाद्य की अंगभूता चार वस्तुएँ हैं – दही, दूध, मधु और गरम जल ||१३-१९||
किन्हीं के मतमें कमल, श्यामाक (तिन्निका चावल), दूर्वादल और विष्णुकांता ओषधि – इन चार वस्तुओं से युक्त जल ‘पाद्य’ कहलाता हैं | इसी तरह अर्घ्य के भी आठ अंग कहे गए हैं | जौ, गंध, फल, अक्षत, कुश, सरसों, फुल और तिल – इन आठ द्रव्यों का अर्घ्य के लिये संग्रह करना चाहिये | जाती (जायफल), लवंग और कक्कोलयुक्त जल का आचमन देना चाहिये | इष्टदेव को मूलमंत्र से पंचामृतद्वारा स्नान करावे | बीचवाले कलश से भगवान् के मस्तकपर शुद्ध जल का छींटा दे | कलश से निकले हुए जल एवं कुर्चाग्र का स्पर्श करे | फिर शुद्ध जलसे पाद्य, अर्ध्य और आचमनीय निवेदन करे | तत्पस्च्यात वस्त्र से भगवान् के श्रीविग्रह को पोंछकर वस्त्र धारण करावे और वस्त्र के सहित उन्हें मंडल में ले जाय | वहाँ भलीभाँति पूजा करके प्राणायामपूर्वक कुण्ड आदि में होम करे | (हवन की विधि) दोनों हाथ धोकर कुण्ड में या वेदिपर तीन पूर्वाग्र रेखाएँ खींचे | (ये भी दाहिने से आरम्भ करके क्रमश: बाएं खींची जायँ ) ||२०-२५||
तत्पस्च्यात अर्घ्य के जलसे इन रेखाओं का प्रोक्षण करे और योनिमुद्रा दिखावे | अग्निका आत्मरूप से चिन्तन करके मनुष्य योनियुक्त कुण्ड में उसकी स्थापना करे | इसके बाद दर्भ, स्रुक, स्रुवा आदि के साथ पात्रासादन करे | बाहुमात्र की परिधियाँ, इध्मव्रश्चन, प्रणीतापात्र, प्रोक्षणीपात्र, आज्यस्थाली, घी, दो-दो सेर चावल तथा अधोमुख स्रुक और स्रुवा की जोड़ी | प्रणीता एवं प्रोक्षणी में पूर्वाग्र कुश रखे | प्रणीता को जलसे भरकर भगवान का ध्यान-पूजन करके उसको अग्नि के पश्चिम अपने आगे और आसादित द्रव्यों के मध्यमें रखे | प्रोक्षणी को जलसे भरकर पूजन के पश्च्यात दाहिने रखे | आगपर चरु को चढ़ाकर पकावे और अग्नि से दक्षिण दिशामें ब्रह्माजी की स्थापना करे | कुण्ड या वेदी के चारों ओर पुर्वादि दिशामें कुश (बर्हिष) बिछाकर परिधियों को स्थापित करे | तदनंतर गर्भाधानादि संस्कार के द्वारा अग्नि का वैष्णवीकरण करे | गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म एवं नामकरणादि – समवार्तनान्त संस्कार करके प्रत्येक कर्म के लिये आठ-आठ आहुतियाँ दे तथा स्रुवायुक्त स्रुक के द्वारा पूर्णाहुति प्रदान करे ||२६-३३||
कुण्ड के भीतर ऋतूस्राता लक्ष्मी का ध्यान करके हवन करे | कुण्ड के भीतर जो लक्ष्मी हैं, उन्हें ‘कुण्डलक्ष्मी’ कहा गया है | वे ही त्रिगुणात्मिका प्रकृति हैं | ‘वे सम्पूर्ण भूतों की तथा विद्या एवं मन्त्र-समुदाय की योनि हैं | परमात्मस्वरुप अग्निदेव मोक्ष के कारण एवं मुक्तिदाता हैं | पूर्व दिशाकी ओर कुण्डलक्ष्मी का सिर है, ईशान और अग्निकोण की ओर उसकी भुजाएँ हैं, वायव्य तथा नैऋत्यकोण में जंघाएँ हैं, उदर को ‘कुण्ड’ कहा है तथा योनि के स्थान में कुण्ड-योनि का विधान है | सत्त्व, रज और तम – ये तीन गुण ही तीन मेखलाएँ हैं |’ पन्द्रह समिधाओं का होम करे | फिर वायु से लेकर अग्निकोण तक ‘आधार’ नामक दो आहुतियाँ दे | इसी तरह आग्नेय से ईशानन्ततक ‘आज्य-भाग’ नामक आहुतियों का हवन करे | आज्यस्थाली में से उत्तर, दक्षिण और मध्यभाग से घृत लेकर द्वादशान्त से, अर्थात मूल को बारह बार जप कर अग्नि में भी उन्हीं दिशाओं में उसकी आहुति दे और वहीँ उसका त्याग करे | इसके बाद ‘भू: स्वाहा’ इत्यादि रूप से व्याहृति-होम करे | कमल के मध्यभाग में संस्कारसम्पन्न अग्निदेव का ‘विष्णु’ रुपमे ध्यान करे | ‘वे सात जिव्हाओं से युक्त हैं, करोड़ों सूर्यो के समान उनकी प्रभा हैं, चंद्रोपम मुख है और सूर्य-सदृश देदीप्यमान नेत्र है |’ इस तरह ध्यान करके उनके लिये एक सौ आठ आहुतियाँ दे | अथवा मूल-मन्त्र से उसकी आधी एवं आता आहुतियाँ दे | अंगों के लिये भी दस-दस आहुतियाँ दे ||३४-४१||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पवित्रारोपण –सम्बन्धी पूजा-होम-विधि का वर्णन’ विषयक चौतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||३४||
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