अध्याय – 029 मन्त्र-साधन-विधि, सर्वतोभद्रादि मण्डलों के लक्षण

अध्याय – 029 
मन्त्र-साधन-विधि, सर्वतोभद्रादि मण्डलों के लक्षण
नारदजी कहते हैं – मुनिवरो ! साधक को चाहिये कि वह देव-मन्दिर आदिमें मन्त्र की साधना करे | घरके भीतर शुद्ध भूमिपर मंडल में परमेश्वर श्रीहरि का विशेष पूजन करके चौकोर क्षेत्र में मंडल आदि की रचना करे | दप सौ छप्पन कोष्ठों में ‘सर्वतोभद्र मंडल’ लिखे | (क्रम यह है कि पूर्व से पश्चिम की ओर तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बराबर सत्रह रेखाएँ खींचे | ऐसा करनेसे दो सौ छप्पन कोष्ठ हो जायेंगे | उनमेंसे बीच के छत्तीस कोष्ठों को एक करके उनके द्वारा कमल बनावे, अथवा उसे कमलका क्षेत्र निश्चित करे | इस कमलक्षेत्र के बाहर चारों ओर की एक-एक पंक्ति को मिटाकर उसके द्वारा पीठ की कल्पना करे, अथवा उसे पीठ समझे | फिर पीठसे भी बाहर की दो-दो पंक्तियों का मार्जन करके, उनके द्वारा ‘वीथी’ की कल्पना करे | फिर चारों दिशाओं में द्वार-निर्माण करे | पूर्वोक्त पद्मक्षेत्र में सब ओर बाहर के बारहवें भाग को छोड़ दे और सर्व-मध्य-स्थानपर सूत्र रखकर, पद्म-निर्माण के लिये विभागपूर्वक समान अंतर रखते हुए, सूत घुमाकर, तीन वृत्त बनावे | इसतरह उस चौकोर क्षेत्र को वर्तुल (गोल) बना दे | इन तीनों में से प्रथम तो कर्णिका का क्षेत्र हैं, दूसरा केसर का क्षेत्र है और तीसरा दल-संधियों का क्षेत्र है | शेष चौथा अंश दलाग्रभाग का स्थान है | कोणसुर्त्रों को फैलाकर कोण से दिशा के मध्यभाग तक ले जाय तथा केसर के अग्रभाग में सूत रखकर दल-संधियों को चिन्हित करे ||१-६||

फिर सूत गिराकर अष्टदलों का निर्माण करे | दलों के मध्यगत अंतराल का जो मान हैं, उसे मध्य में रखकर उसमें दलाग्र को घुमावे | तदनन्तर उसके भी अग्रभाग को घुमावे | उनके अंतराल-मान को उनके पार्श्वभाग ने रखकर बाह्यक्रम से एक-एक दलमें दो-दो केसरों का उल्लेख करे | यह सामान्यत: कमलका चिन्ह हैं | अब द्वादशदल कमलका वर्णन किया जाता है | कर्णिकार्धमान से पूर्व दिशाकी ओर सूत रखकर क्रमशः सब ओर घुमावे | उसके पार्श्वभाग में भ्रमणयोग से छ: कुंडलियाँ होंगी और बारह मत्स्यचिन्ह बनेंगे | उनके द्वारा द्वादशदल कमल सम्पन्न होगा | पंचदल आदि की सिद्धि के लिये भी इसीप्रकार मत्स्यचिन्हों से कमल बनाकर, आकाशरेखा से बाहर जो पीठभाग हैं, वहाँ के कोष्ठों को मिटा दे | पीठभाग के चारों कोणों में तीन-तीन कोष्ठकों को उस पीठ के पायों के रूप में कल्पित करे | अवशिष्ट जो चारों दिशाओं में दो-दो जोड़े, अर्थात चार-चार कोष्ठक हैं, उन सबको मिटा दे | वे पीठ के पाटे हैं | पीठ के बाहर चारों दिशाओं की दो-दो पंक्तियों को वीथी (मार्ग)- के लिये सर्वथा लुप्त कर दे (मिटा दे); तदनन्तर चारों दिशाओं में चार द्वारों की कल्पना करे | (वीथी के बाहर जो दो पक्तियाँ शेष हैं, उनमें से भीतरवाली पंक्ति के मध्यवर्ती दो-दो कोष्ठ और बाहरवाली पंक्ति के मध्यवर्ती चार-चार कोष्ठों को एक करके द्वार बनाने चाहिये |) ||७-१४||

द्वारों के पार्श्वभागों में विद्वान् पुरुष आठ शोभा स्थानों कीकल्पना करे और शोभा के पार्श्वभाग में उपशोभा-स्थान बनाये | उपशोभाओं की संख्या भी उतनी ही बतायी गयी है, जितनी कि शोभाओं की उपशोभाओं के समीप के स्थान ‘कोण’ कहे गये हैं | तदनन्तर चारों दिशोओं में दो-दो मध्यवर्ती कोष्ठकों का और उससे बाह्य पंक्ति के चार-चार मध्यवर्ती कोष्ठकों का द्वार के लिये चिन्तन करे | उन सबको एकत्र करके मिटा दे – इस तरह चार द्वार बन जाते हैं | द्वार के दोनों पार्श्वो में क्षेत्र की बाह्य-पंक्ति के एक-एक और भीतरी पंक्ति के तीन-तीन कोष्ठों को ‘शोभा’ बनाने के लिये मिटा दे | शोभा के पार्श्वभाग में उसके विपरीत करने से, अर्थात क्षेत्र की बाह्य-पंक्ति के तीन-तीन और भीतरी पंक्ति के एक-एक कोष्ठ को मिटाने से उपशोभा का निर्माण होता है | तत्पस्च्यात कोण के भीतर और बाहर के तीन-तीन कोष्ठों का भेद मिटाकर – एक करके चिन्तन करें ||१५-१८||

इसप्रकार सोलह-सोलह कोष्ठों से बननेवाले दो सौ छप्पन कोष्ठ्वाले मंडल का वर्णन हुआ | इसी तरह दूसरे मंडल भी बन सकते हैं | बारह-बारह कोष्ठों से (एक सौ चौवालीस) कोष्ठकों का जो मंडल बनता है, उसमें भी मध्यवर्ती छत्तीस पदों (कोष्ठों) – का कमल होता हैं |

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सर्वतोभद्र आदि मंडल के लक्षण का वर्णन’ नामक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||२९||

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