अध्याय – 027 शिष्यों को दीक्षा देने की विधि का वर्णन
अध्याय – 027
शिष्यों को दीक्षा देने की विधि का वर्णन
नारदजी कहते हैं – महर्षिगण ! अब मैं सब कुछ देनेवाली दीक्षा का वर्णन करूँगा | कमलाकर मण्डल में श्रीहरि का पूजन करे | दशमी तिथि को समस्त यज्ञ-सम्बन्धी द्रव्य का संग्रह एव, संस्कार (शुद्धि) करके रख ले | नरसिंह-बीज-मन्त्र (क्षौं) – से सौ बार उसे अभिमंत्रित करके, उस मन्त्र के अन्तमें ‘फट’ लगाकर बोले तथा राक्षसों का विनाश करने के उद्देश्य से सब ओर सरसों छींटे | फिर वहाँ सर्वस्वरूपा प्रासादरूपिणी शक्ति का न्यास करे | सर्वोषधियों का संग्रह करके बिखेरने के उपयोग में आनेवाली सरसों आदि वस्तुओं को शुभ पात्र में रखकर साधक वासुदेव-मन्त्र से उनका सौ बार अभिमन्त्रण करे | तदनन्तर वासुदेव से लेकर नारायणपर्यन्त पूर्वोक्त पाँच मूर्तियों (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायण) – के मूल-मंत्रोद्वारा पंचगव्य तैयार करे और कुशाग्र से पंचगव्य छिड़ककर उस भूमिका प्रोक्षण करे | फिर वासुदेव-मन्त्र से उत्तान हाथ के द्वारा समस्त विकिर वस्तुओं को सब ओर बिखेरे | उससमय पूर्वाभिमुख खड़ा हो, मन-ही-मन भगवान् विष्णु का चिन्तन करते हुए तीन बार उन विकिर वस्तुओं को सब ओर छीटें | तत्पस्च्यात वर्धनीसहित कलशपर स्थापित भगवान् विष्णु का अंगसहित पूजन करे | अस्त्र-मन्त्र से वर्धनी को सौ बार अभिमंत्रित करके अवीछिन्न जलधारा से सींचते हुए उसे ईशानकोण कि ओर ले जाय | कलश को पीछे ले जाकर विकिरपर स्थापित करे | विकिर-द्रव्यों को कुशद्वारा एकत्र करके कुम्भेश और कर्करीका यजन करे ||१-८||
पंचरत्नयुक्त सवस्त्र वेदीपर श्रीहरि कि पूजा करे | अग्निमें भी उनकी अर्चना करके पूर्ववत मंत्रोद्वारा उनका संतर्पण करे | तत्पस्च्यात पुंडरिक मन्त्र ( ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा | य: स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचि: ||) उखा (पात्रविशेष) – का प्रक्षालन करके उसके भीतर सुगन्धयुक्त घी पोत दे | इसके बाद साधक उसमे गाय का दूध भरकर वासुदेव-मन्त्र से उसका अवेक्षण करे और संकर्षण – मन्त्र से सुसंस्कृत किये गये दूध में घृताक्त चावल छोड़ दे | इसके बाद प्रद्युम्न-मन्त्र से करछुलद्वारा उस दूध और चावल का आलोडन करके धीरे-धीरे उसे उलाटे-पलाटे | जब खीर या चरु पक जाय, तब आचार्य अनिरुद्ध-मन्त्र पढकर उसे आगसे नीचे उतार दे | तदनन्तर उसपर जल छिड़के और घ्रुतालेपन करके हाथमें भस्म लेकर उसके द्वारा नारायण-मन्त्र से ललाट एवं पार्श्व-भागों में ऊर्ध्व-पुंड्र करे | इसप्रकार सुंदर संस्कारयुक्त चरु के चार भाग करके एक भाग इष्टदेव को अर्पित करे, दूसरा भाग कलश को चढ़ावे, तीसरे भाग से अग्नि में तीन बार आहुति दे और चौथे भाग को गुरु शिष्यों के साथ बैठकर खाय; इससे आत्मशुद्धि होती है | (दूसरे दिन एकादशी को) प्रात:काल ऐसे वृक्ष से दाँतन ले, जो दूधवाला हो | उस दाँतन को नारायण-मन्त्र से सात बार अभिमंत्रित कर लें | उसका दन्तशुद्धि के लिये उपयोग करके फिर उसे त्याग दे | अपने पातक का स्मरण करके पूर्व, अग्निकोण, उत्तर अथवा ईशानकोण की ओर मुँह करके अच्छी तरह स्नान करे | फिर ‘शुभ’ एवं ‘सिद्ध’ की भावना करके, अर्थात ‘मैं निष्पाप एवं शुद्ध होकर शुभ सिद्धि की ओर अग्रसर हुआ हूँ’ – ऐसा अनुभव करके आचमन-प्राणायाम के पश्च्यात मन्त्रोप्देष्टा गुरु भगवान् विष्णु से प्रार्थना करके उनकी परिक्रमा के पश्च्यात पूजागृह में प्रवेश करे ||९-१७||
प्रार्थना इसप्रकार करे – ‘देव ! संसार-सागर में मग्न पशुओं को पाश से छुटकारा दिलाने के लिये आप ही शरणदाता हैं | आप सदा अपने भक्तोंपर वात्सल्यभाव रखते हैं | देवदेव ! आज्ञा दीजिये, प्राकृत पाश-बन्धनों से बंधे हुए इन पशुओं को आज आपकी कृपासे मैं मुक्त करूँगा |’ देवेश्वर श्रीहरि से इसप्रकार प्रार्थना करके पूजागृह में प्रविष्ट हो, गुरु पूर्ववत अग्नि आदि कि धारणाओंद्वारा शिष्यभूत समस्त पशुओं का शोधन करके संस्कार करने के पश्च्यात, उनका वासुदेवादि मूर्तियों से संयोग करे | शिष्यों के नेत्र बाँधकर उन्हें मूर्तियों की ओर देखने का आदेश दे | शिष्य उन मूर्तियों कि ओर पुष्पांजलि फेंके, तदनुसार गुरु उनका नाम निर्देश करें | पूर्ववत शिष्यों से क्रमश: मूर्तियोंका मन्त्ररहित पूजन करावे | जिस शिष्य के हाथ का फुल जिस मुर्तिपर गिरे, गुरु उस शिष्य का वही नाम रखे | कुमारी कन्या के हाथ से काता हुआ लाल रंग का सूत लेकर उसे छ: गुना करके बट दे | उस छ: गुने सूत कि लंबाई पैर के अँगूठे से लेकर शिखायतक की होनी चाहिये | फिर उसे भी मोडकर तिगुना कर ले | उक्त प्रकति देवी का चिन्तन करे, जिसमें सम्पूर्ण विश्व का लय होता हैं और जिससे ही समस्त जगतका प्रादुर्भाव हुआ करता हैं | उस सूत्र में प्राकृतिक पाशों को तत्त्व कि संख्या के अनुसार ग्रथित करे, अर्थात २४ गाँठे लगाकर उनको प्राकृतिक पाशों के प्रतीक समझे | फिर उस ग्रंथियुक्त सूत को प्याले में रखकर कुण्ड के पास स्थापित कर दे | तदनन्तर सभी तत्त्वों का चिन्तन करके गुरु उनका शिष्य के शरीर में न्यास करे | तत्त्वों का वह न्यास सृष्टि-क्रम के अनुसार प्रकतिसे लेकर पृथ्वीपर्यन्त होना चाहिये ||१८-२६||
तीन, पाँच, दस अथवा बारह जितने भी सूत्र-भेद सम्भव हों, उन सब सूत्र-भेदों के द्वारा बटे हुए उस सूत्र को ग्रथित करके देना चाहिये | तत्त्वचिंतक पुरुषों के लिये यही उचित है | ह्रदय से लेकर अस्त्रपर्यंत पाँच अंग-सम्बन्धी मन्त्र पढकर सम्पूर्ण भूतों को प्रकुतिक्रम से (अर्थात कार्य-तत्त्व का कारण-तत्त्व में लय के क्रम से) तन्मात्रास्वरुप में लीन करके उस मायामय सूत्र में और पशु (जीव ) – के शरीर में भी प्रकृति, लिंगशक्ति, कर्ता, बुद्धि तथा मनका उपसंहार करे | तदनन्तर पंचतन्मात्र, बुद्धि, कर्म और पंचमहाभूत – इन बारह रूपों में अभिव्यक्त द्वाद्शात्माका सूत्र और शिष्य के शरीर में चिन्तन करे | तत्पस्च्यात इच्छानुसार सृष्टि कि सम्पातविधि से हवन करके, सृष्टि-क्रम से एक-एक के लिये सौ-सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति करे | प्याले में रखे हुए ग्रथित सूत्र को ऊपर से ढककर उसे कुम्भेश को अर्पित करे | फिर यथोचित रीतिसे अधिवासन करके भक्त शिष्य को दीक्षा दे | करनी, कैंची, धूल या बालू, खड़िया मिट्टी और अन्य उपयोगी वस्तुओं का भी संग्रह करके उन सबको उसके वामभाग में स्थापित कर दे | फिर मूल-मन्त्र से उनका स्पर्श करके अधिवासित करे | तत्पस्च्यात श्रीहरि के स्मरणपूर्वक कुशोंपर भूतों के लिये बलि दे और कहे – ‘नमो भूतेभ्य: |’ इसके बाद चंदोवों, कलशों और लड्डुओं से मण्डप को सुसज्जित करके मंडल के भीतर भगवान् विष्णु का पूजन करे | फिर अग्निको घी से तृप्त करके, शिष्यों को पास बुलाकर बद्धपद्मासन से बिठावे और दीक्षा दे | बारी-बारी से उन सबका प्रोक्षण करके विष्णुहस्त से उनके मस्तक का स्पर्श करे | प्रकृतिसे विकृतिपर्यन्त, अधिभूत और अधिदेवतसहित सम्पूर्ण सृष्टि को अध्यात्मिक करके अर्थात सबको अपने आत्मा में स्थित मानकर, ह्रदय में ही क्रमश: उसका संहार करे ||२७-३६||
इससे तन्मात्रस्वरुप हुई सारी सृष्टि जीवके समान हो जाती है | इसके बाद कुम्भेश्वर से प्रार्थना करके गुरु पूर्वोक्त सूत्र का संस्कार करने के अनन्तर अग्नि के समीप आ उसको अपने पास ही रख ले | फिर मूल मंत्रसे सृष्टिशके लिये सौ आहुतियाँ दे | इसके बाद उदासीनभाव से स्थित सृष्टिश को पूर्णाहुति अर्पित करके गुरु श्वेत रज (बालू) हाथमें लेकर उसे मूल-मंत्रसे सौ बार अभिमंत्रित करे | फिर उससे शिष्य के ह्रदयपर ताडन करे | उससमय वियोगवाची क्रियापदसे युक्त बीज-मंत्रों एवं क्रमश: पादादि इन्द्रियों से घटित वाक्य कि योजना करके अंतमे ‘हं फट’ का उच्चारण करे | (‘ॐ रां (नम: कर्मेनिद्रयाणि वियुन्क्ष्व हूँ फट; ॐ यं (नम:) भूतानि वियुन्क्ष्व हूँ फट |’ इत्यादी |) इसप्रकार पृथ्वी आदि तत्त्वों का वियोग कराकर आचार्य भावनाद्वारा उन्हें अग्निमें होम दे | इसतरह कार्य-तत्त्वों का कारण-तत्त्वों में होम अथवा लय करते हुए क्रमश: अखिल तत्त्वों के आश्रयभूत श्रीहरि में सबका लय कर दे | विद्वान् पुरुष इसी क्रम से सब तत्त्वों को श्रीहरि तक पहुँचाकर. उन सम्पूर्ण तत्त्वों के अधिष्ठान का स्मरण करे | उक्त रीतिसे ताडनद्वारा भूतों और इन्दिर्यो से वियोग कराकर शुद्ध हुए शिष्य को अपनावे और प्रक्रति से उसकी समता का सम्पादन करके पूर्वोक्त अग्निमें उसके उस प्राकृतभाव का भी हवन कर दे | फिर गर्भाधान, जातकर्म, भोग और लय का अनुष्ठान करके उस-उस कर्म के निमित्त वहाँ आठ-आठ बार शुद्धर्थ होम करे | तदनन्तर आचार्य पूर्णाहुतिद्वारा शुद्ध तत्त्व का उद्धार करके अव्याकृत प्रकृतिपर्यत सम्पूर्ण जगत का क्रमानुसार परम तत्त्व में लय क्र दे | उस परम तत्त्व को भी ज्ञानयोग से परमात्मा में विलीन करके बंधनमुक्त हुए जीव को अविनाशी परमात्मपद में प्रतिष्ठित करे | तत्पस्च्यात विद्वान् पुरुष यह अनुभव करे कि ‘शिष्य शुद्ध,बुद्ध, परमानन्द-संदोह में निमग्र एवं कृतकृत्य हो चूका है |’ ऐसा चिन्तन करने के पश्चात गुरु पूर्णाहुति दे | इस प्रकार दीक्षा-कर्म कि समाप्ति होती है ||३७-४७||
अब मैं उन प्रयोग-सम्बन्धी मन्त्रों का वर्णन करता हूँ, जिनसे दीक्षा, होम और लय सम्पादित होते हैं | ‘ॐ यं भूतानि वियुन्क्ष्व हूं फट |’ (अर्थात भूतों को मुझसे अलग करो |) – इस मंत्रसे ताडन करनेका विधान है | इसके द्वारा भूतों से वियोजन (बिलगाव) होता है | यहाँ वियोजन को दो मन्त्र हैं | एक तो वही है, जिसका ऊपर वर्णन हुआ है और दूसरा इसप्रकार है – ‘ॐ यं भुतान्यापातयेऽहम |’ (मैं भूतों को अपनेसे दूर गिराता हूँ ) | इस मंत्रसे ‘आपातन’ (वियोजन) करके पुन: दिव्य प्रकृति से यों संयोजन किया जाता है | उसके लिये मन्त्र सुनो – ‘ॐ यं भूतानि युन्क्ष्व |’ अब होम मन्त्र का वर्णन करता हूँ | उसके बाद पूर्णाहुतिका मन्त्र बताउँगा | ‘ॐ भूतानि संहर स्वाहा |’ यह होम-मन्त्र है और ‘ॐ अं ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अं वौषट |’ – यह पूर्णाहुति मन्त्र है | पूर्णाहुति के पश्च्यात त्त्त्वमें शिष्य को संयुक्त करे | विद्वान् पुरुष इसी तरह समस्त तत्त्वों का क्रमश: शोधन करे | तत्त्वों के अपने-अपने बीजके अन्तमें ‘नम:’ पद जोडकर ताडनादिपूर्वक तत्त्व-शुद्धि का सम्पादन करे ||४८-५३||
‘ॐ रां (नम:) कर्मेंद्रियाणि |’, ‘ॐ दें (नम:) बुद्धीन्द्रियाणि |’ – इन पदों के अंतमे ‘वियुन्क्ष्व हूं फट |’ की संयोजना करे | पूर्वोक्त ‘यं’ बीज के समान ही इन उपर्युक्त बीजों से भी ताडन आदि का प्रयोग होता हैं | ‘ ॐ सुं गंधतन्मात्रे बिम्बं युन्क्ष्व हुं फट |’, ‘ॐ सं पाहि हां ॐ स्वं स्वं युन्क्ष्व प्रकृत्या अं जं हुं गंधतन्मात्रे संहर स्वाहा |’ – ये क्रमश: संयोजन और होम के मन्त्र है | तदनन्तर पूर्णाहुतिका विधान है | इसी प्रकार उत्तरवर्ती कर्मों में भी प्रयोग किया जाता है | ‘ॐ रां रसतन्मात्रे | ॐ तें रूपतन्मात्रे | ॐ वं स्पर्शतन्मात्रे | ॐ यं शब्दतन्मात्रे | ॐ मं नम: | ॐ सों अहंकारे | ॐ नं बुद्धौ | ॐ ॐ प्रकृतौ |’ यह दीक्षायोग एकव्यूहात्मक मूर्तिके लिये संक्षेपसे बताया गया है | नवव्युहादिक मूर्तियों के विषय में भी ऐसा ही प्रयोग हैं | मनुष्य प्रकृति को दग्ध करके उसे निर्वाणस्वरुप परमात्मा में लीन कर दे | फिर भूतों की शुद्धि करके कर्मेन्द्रियों का शोधन करे ||५४-५९||
तत्पस्च्यात ज्ञानेन्द्रियों का, तन्मात्राओं का, मन, बुद्धि एवं अहंकार का तथा लिंगात्माका शोधन करके सबके अन्तमें पुन: प्रकृति की शुद्धि करे | ‘शुद्ध हुआ प्राकृत पुरुष ईश्वरीय धाम में प्रतिष्ठित हैं | उसने सम्पूर्ण भोगों का अनुभव कर लिया है और अब वह मुक्तिपद में स्थित है |’ – इसप्रकार ध्यान करे और पूर्णाहुति दे | यह अधिकार-प्रदान करनेवाली दीक्षा हैं | पूर्वोक्त मन्त्र के अंगोद्वारा आराधना करके, तत्त्वसमूह को समभाव (प्रकृत्यवस्था) – में पहुँचाकर, क्रमश: इसी रीतिसे शोधन करके, अन्तर्मे साधक अपनेको सम्पूर्ण सिद्धियों से युक्त परमात्मरूप से स्थित अनुभव करते हुए पूर्णाहुति दे – यह साधकविषयक दीक्षा कही गयी है | यदि यज्ञोंपयोगी द्रव्यका सम्पादन (संग्रह) न हो सके, अथवा अपने में असमर्थता हो तो समस्त उपकरणोंसहित श्रेष्ठ गुरु पूर्ववत इष्टदेव का पूजन करके, तत्काल उन्हें अधिवासित करके, द्वादशी तिथि में शिष्य को दीक्षा दे दे | जो गुरुभक्त, विनयशील एवं समस्त शारीरिक सद्गुणों से सम्पन्न हो, ऐसा शिष्य यदि अधिक धनवान न हो तो वेदीपर इष्टदेव का पूजनमात्र करके दीक्षा ग्रहण करे | आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक, सम्पूर्ण अध्वा का सृष्टिक्रम से शिष्य के शरीर में चिन्तन करके, गुरु पहले बारी-बारीसे आठ आहुतियोंद्वारा एक-एक की तृप्ति करने के पश्च्यात, सृष्टिमान हो, वासुदेव आदि विग्रहों का उनके निज-निज मंत्रोद्वारा पूजन एवं हवन करे और हवन-पूजन के पश्चात अग्नि आदि का विसर्जन कर दे | तत्पस्च्यात पूर्वोक्त होमद्वारा संहारक्रम से तत्त्वों का शोधन करे ||६०-६८||
दीक्षाकर्म में पहले जिन सूत्रों में गाँठे बाँधी गयी थीं, उनकी वे गाँठे खोल, गुरु उन्हें शिष्य के शरीरसे लेकर, क्रमश: उन तत्त्वों का शोधन करे | प्राकृतिक अग्नि एवं आधिदैविक विष्णु में अशुद्ध-मिश्रित शुद्ध-तत्त्व को लीन करके पूर्णाहुतिद्वारा शिष्य को उस तत्त्व से संयुक्त करे | इसप्रकार शिष्य प्रकृतिभाव को प्राप्त होता हैं | तत्पस्च्यात गुरु उसके छुटकारा दिलावे | ऐसा करके वे शिशुस्वरूप उन शिष्यों को अधिकार में नियुक्त करे | तदनन्तर भावमें स्थित हुआ आचार्य भक्तिभावसे शरणमें आये हुए यतियों तथा निर्धन शिष्य को ‘शक्ति’ नामवाली दूसरी दीक्षा दे | वेदीपर भगवान् विष्णु की पूजा करके पुत्र (शिष्यविशेष) – को अपने पास बिठा ले | फिर शिष्य देवता के सम्मुख हो तिर्यग-दिशा कि ओर मुँह करके स्वयं बैठे | गुरु शिष्य के शरीर में अपने ही पर्वों से कल्पित सम्पूर्ण अध्वाका ध्यान करके आधिदैविक यजन के लिये प्रेरित करनेवाले इष्टदेवका भी ध्यानयोग के द्वारा चिन्तन करे | फिर पूर्ववत ताडन आदि के द्वारा क्रमश: सम्पूर्ण तत्त्वों का वेदिगत श्रीहरि में शोधन करे | ताडनद्वारा तत्त्वों का वियोजन करके उन्हें आत्मा में गृहीत करे और पुन: इष्टदेव के साथ उनका संयोजन एवं शोधन करके, स्वभावतः ग्रहण करने के अनन्तर ले आकर क्रमश: शुद्ध तत्त्व के साथ संयुक्त करे | सर्वत्र ध्यानयोग एवं उत्तान मुद्राद्वारा शोधन करे ||६९-७७||
सम्पूर्ण तत्त्वों की शुद्धि हो जानेपर जब प्रधान (प्रकुति) तथा परमेश्वर स्थित रह जायँ, तब पूर्वोक्त रीतिसे प्रकुति को दग्ध करके शुद्ध हुए शिष्यों को परमेश्वरपद में प्रतिष्ठित करे | श्रेष्ठ गुरु साधक को इस तरह सिद्धिमार्ग से ले चले | अधिकारारूढ गृहस्थ भी इसीप्रकार आलस्य छोडकर समस्त कर्मों का अनुष्ठान करे | जबतक राग (आसक्ति) का सर्वथा नाश न हो जाय, तबतक आत्म-शुद्धि का सम्पादन करता रहे | जब यह अनुभव हो जाय कि ‘मेरे ह्र्द्यका राग सर्वथा क्षीण हो गया है’, तब पापसे शुद्ध हुआ संयमशील पुरुष अपने पुत्र या शिष्य को अधिकार सौंपकर मायामय पाश को दग्ध करके संन्यास ले, आत्मनिष्ठ हो, देहपातकी प्रतीक्षा करता रहे | अपने सिद्धिसम्बन्धी किसी चिन्ह को दूसरोंपर व्यक्त न होने दे ||७८-८१||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सर्वदीक्षा-विधि-कथन’ नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||२७||
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