अध्याय – 026 मुद्राओं के लक्षण

अध्याय – 026 
मुद्राओं के लक्षण
नारदजी कहते हैं – मुनिगण ! अब मैं मुद्राओं का लक्षण बताऊँगा | सांनिध्य (संनिधापिनी) [दोनों हाथों के अंगूठों को ऊपर करके मुट्ठी बाँधकर दोनों मुट्ठियों को परस्पर सटानेसे ‘संनिधापिनी मुद्रा’ होती है |] आदि मुद्रा के प्रकार – भेद हैं | पहली मुद्रा अंजलि है, दूसरी वन्दनी है तीसरी ह्र्द्यानुगा है | बायें हाथ की मुट्ठी से दाहिने हाथ के अंगूठे को बाँध ले और बायें अंगुष्ठ को ऊपर उठाये रखे | सारांश यह है कि बायें और दाहिने – दोनों हाथों के अंगूठे ऊपर की ओर ही उठे रहें | यही ‘ह्र्द्यानुगा’ मुद्रा है | (इसीको कोई ‘संरोधिनी’ और कोई ‘निष्ठुरा’ कहते हैं) | व्युहार्चन में तिन मुद्राएँ साधारण हैं | अब आगे ये असाधारण (विशेष) मुद्राएँ बतायी जाती हैं | दोनों हाथों में अंगूठे से कनिष्ठातक कि तीन अँगुलियों को नवाकर कनिष्ठा आदि को क्रमश: मुक्त करने से आठ मुद्राएँ बनती हैं | ‘अ क च ट त प य श’ – ये जो आठ वर्ग हैं, उनके जो पूर्व बीज (अं कं चं टं इत्यादि) हैं, उनको ही सूचित करनेवाली उक्त आठ मुद्राएँ है – ऐसा निश्चय करे | फिर पाँचों अँगुलियों को ऊपर करके हाथ को सम्मुख करने से जो नवी मुद्रा बनती है, वह नवम बीज (क्षं) – के लिए हैं ||१-४||

दाहिने हाथ के ऊपर बायें हाथ को उतान रखकर उसे धीरे-धीरे नीचे को झुकाये | यह वराह कि मुद्रा मानी गयी है | ये क्रमश: अंगों कि मुद्राएँ हैं | बायीं मुट्ठी में बंधी हुई एक-एक अंगुली को क्रमश: मुक्त करे और पहले की मुक्त हुई अँगुली को फिर सिकोड़ ले | बायें हाथ में ऐसा करने के बाद दाहिने हाथ में भी यही क्रिया करे | बायीं मुट्ठी के अँगूठे को ऊपर उठाये रखे | ऐसा करने से मुद्राएँ सिद्ध होती है ||५ – ७ ||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘मुद्रालक्षण-वर्णन’ नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||२६||

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