अध्याय – 024 कुण्ड – निर्माण एवं अग्नि – स्थापन – सम्बन्धी कार्य आदि का वर्णन
अध्याय – 024
कुण्ड – निर्माण एवं अग्नि – स्थापन – सम्बन्धी कार्य आदि का वर्णन
नारदजी कहते हैं – महर्षियो ! अब मैं अग्नि-सम्बन्धी कार्य का वर्णन करूँगा, जिससे मनुष्य सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओं का भागी होता है | चौबीस अंगुल की चौकोर भूमिको सूतसे नापकर चिन्ह बना दे | फिर उस क्षेत्र को सब ओर से बराबर खोदे | दो अंगुल भूमि चारों ओर छोडकर खोदे हुए कुण्ड की मेखला बनावे | मेखलाएँ तीन होती हैं, जो ‘सत्त्व, रज और तम’ नामसे कही गयी है | उनका मुख पूर्व, अर्थात बाह्य दिशाकी ओर रहना चाहिये | मेखलाओं की अधिकतम ऊँचाई बारह अंगुल की रखे, अर्थात भीतर की ओर से पहली मेखलाकी ऊँचाई बारह अंगुल रहनी चाहिये | (उसके बाह्यभाग में दूसरी मेखलाकी ऊँचाई आठ अंगुल की और उसके भी बाह्यभाग तीसरी मेखलाकी ऊँचाई चार अंगुल की रहनी चाहिये |) इसकी चौड़ाई क्रमश: आठ, दो और चार अंगुल की होती हैं ||१-३||
योनि सुन्दर बनायीं जाय | उसकी लंबाई दस अंगुल की हो | वह आगे-आगेकी ओर क्रमश: छ: चार और दो अंगुल ऊँची रहे अर्थात उसका पिछला भाग छ: अंगुल, उससे आगे का भाग चार अंगुल और उससे भी आगे का भाग दो अंगुल ऊँचा होना चाहिये | योनिका स्थान कुण्ड की पश्चिम दिशा का मध्यभाग है | उसे आगे की ओर क्रमश: नीची बनाना चाहिये | उसकी आक्रति पीपल के पत्ते की – सी होनी चाहिये | उसका कुछ भाग कुण्ड में प्रविष्ट रहना चाहिये | योनिका आयाम चार अंगुल का रहे और नाल पन्द्रह अंगुल बड़ा हो | योनिका मूलभाग तीन अंगुल और उससे आगेका भाग छ: अंगुल विस्तृत हो | यह एक हाथ लंबे-चौड़े कुण्ड का लक्षण कहा गया हैं | दो हाथ या तीन हाथ के कुण्ड में नियमानुसार सब वस्तुएँ तदनुरूप द्विगुण या त्रिगुण बढ़ जायेंगी ||४-६||
अब मैं एक या तीन मेखलावाले गोल और अर्धचंद्राकर आदि कुण्डों का वर्णन करता हूँ | बीचमें सूत रखकर उसे किसी कोण की सीमातक ले जाय; मध्यभाग से कोणतक ले जानेमें सामान्य दिशाओं की अपेक्षा वह सूत जितना बढ़ जाय, उसके आधे भाग को प्रत्येक दिशामें बढाकर स्थापित करे और मध्यस्थान से उन्हीं बिन्दुओंपर सुतको सब ओर घुमावे तो गोल आकर बन जायगा | कुंडार्ध से बढ़ा हुआ जो कोण भागार्ध हैं, उसे उत्तर दिशामें बढाये तथा उसी सीध ने पूर्व और पश्चिम दिशामें भी बाहर की ओर यत्नपूर्वक बढ़ाकर चिन्ह कर दे | फिर मध्यस्थान में सूत का एक सिरा रखकर दूसरा छोर पूर्व दिशावाले चिन्हपर रखे और उसे दक्षिण की ओर से घुमाते हुए पश्चिम दिशा के चिन्हतक ले जाय | इससे अर्धचंद्राकर चिन्ह बन जायगा | फिर उस क्षेत्र को खोद्नेपर सुंदर अर्धचन्द्र-कुण्ड तैयार हो जायगा ||७-९||
कमलकी आक्रुतिवाले गोल कुण्ड की मेखलापर दलाकार चिन्ह बनाये जाय | होमके लिए एक सुंदर स्त्रुक तैयार करे, जो अपने बाहुदंड के बराबर हो | उसके दण्ड का मूलभाग चतुरस्त्र हो | उसका माप सात या पाँच अंगुलका बताया गया हैं | उस चतुरस्त्र के तिहाई भागको खुदवाकर गर्त बनावे | उसके मध्यभाग में उत्तम शोभायमान वृत्त हो | उक्त गर्त को नीचे से ऊपर तक तथा अगल-बगल में बराबर खुदावे | बाहर का अर्धभाग छीलकर साफ़ करा दे (उसपर रंदा करा दे ) | चारों ओर चौथाई अंगुल, जो शेष के आधे का आधा भाग है, भीतर से भी छीलकर साफ़ करा दे | शेषार्धभागद्वारा उक्त खातकी सुंदर मेखला बनवावे | मेखला के भीतरी भाग में उस खात का कंठ तैयार करावे, जिसका सारा विस्तार मेखला की तीन चौथाई के बराबर हो | कंठ की चौड़ाई एक या डेढ़ अंगुल के मापकी हो | उक्त स्त्रुक के अग्रभाग में उसका मुख रहे, जिसका विस्तार चार या पाँच अंगुल का हो ||१०-१४||
मुख का मध्य भाग तीन या दो अंगुल का हो | उसे सुंदर एवं शोभायमान बनाया जाय | उसकी लंबाई भी चौड़ाई के ही बराबर हो | उस मुख का मध्य भाग नीचा और परम सुंदर होना चाहिये | स्त्रुक के कंठदेश में एक ऐसा छेद रहे, जिसमें कनिष्ठिका अंगूलि प्रविष्ट हो जाय | कुण्ड (अर्थात स्त्रुक के मुख) – का शेष भाग अपनी रूचि के अनुसार विचित्र शोभसे सम्पन्न किया जाय | स्त्रुक के अतिरिक्त एक स्त्रुवा भी आवश्यक हैं, जिसकी लंबाई दण्डसहित एक हाथ की हो | उसके डंडे को गोल बनाया जाय | उस गोल डंडे की मोटाई दो अंगुल की हो | उसे खूब सुंदर बनाना चाहिये | स्त्रुवा का मुख-भाग कैसा हो ? यह बताया जाता है | थोड़ी-सी कीचड़ में गाय अथवा बछड़े का पैर पड़नेपर जैसा पदचिन्ह ऊभर आता हैं, ठीक वैसा ही स्त्रुवा का मुख बनाया जाय, अर्थात उस मुखका मध्य भाग दो भागोंमे विभक्त रहे | उपर्युक्त अग्निकुण्ड को गोबरसे लीपकर उसके भीतर की भूमिपर बीचमें एक अंगुल मोटी एक रेखा खीचे, जो दक्षिण से उत्तर की ओर गयी हो | उस रेखा को ‘वज्र’ की संज्ञा डी गयी है | उस प्रथम उत्तराग्र रेखापर उसके दक्षिण और उत्तर पार्श्वमें पुन: तीन पूर्वाग्र रेखाएँ खींचे | इन दोनों रेखाओं के बीचमें पुन: तीन पूर्वाग्र रेखाएँ खींचे | इनमें पहली रेखा दक्षिण भागमें हो और शेष दो क्रमश: उसके उत्तरोत्तर भाग में खींची जायँ | मन्त्रज्ञ पुरुष इसप्रकार उल्लेखन (रेखाकरण) करके उस भूमिका अभ्युक्षण (सेचन) करे | फिर प्रणव के उच्चारणपूर्वक भावनाद्वारा एक विष्टर (आसन) – की कल्पना करके उसके ऊपर वैष्णवी शक्तिका आवाहन एवं स्थापन करे ||१५-२०||
देवी के स्वरुप का इस प्रकार ध्यान करे – ‘वे दिव्य रूपवाली हैं और दिव्य वस्त्राभूषणों से विभूषित हैं|’ तत्पस्च्यात यह चिंतन करे कि ‘देवीको संतुष्ट करनेके लिये अग्निदेव के रूप में साक्षात श्रीहरि पधारे हैं |’ साधक (उन दोनों का पूजन करके शुद्ध कांस्यादि-पात्रमे रखी और ऊपरसे शुद्ध कांस्यादि – पात्र में रखी और ऊपरसे शुद्ध कांस्यादि पात्रद्वारा ढकी हुई अग्नि को लाकर, क्रव्याद-अंश को अलग क्रेक, ईक्षणादि से शोधित उस ) अग्नि को कुण्ड के भीतर स्थापित करे | तत्पस्च्यात उस अग्निमें प्रादेशमात्र (अँगूठे से लेकर तर्जनी के अग्रभाग के बराबर की ) समिधाएँ देकर कुशोंद्वारा तीन बार परिसमुहन करे | फिर पूर्वादि सभी दिशाओं में कुशास्तरण करके अग्नि की उत्तर दिशामें पश्चिम से आरम्भ करके क्रमश: पूर्वादि दिशामें पात्रासादन करे – समिधा, कुशा, स्त्रुक, स्त्रुवा, आज्यस्थाली, चरुस्थाली तथा कुशच्छादित घी, (प्रणितामात्र, प्रोक्षणीपात्र) आदि वस्तुएँ रखे | इसके बाद प्रणिता को सामने रखकर उसे जलसे भर दे और कुशा से प्रणीता का जल लेकर प्रोक्षणीपात्रका प्रोक्षण करे | तदनन्तर उसे बायें हाथमें लेकर दाहिने हाथ में गृहीत प्रणीता के जल से भर दे | प्रणीता और हाथके बीचमें पवित्री का अंतर रहना चाहिये | प्रोक्षणी में गिराते समय प्रणीता के जल को भूमिपर नहीं गिरने देना चाहिये | प्रोक्षणी में अग्निदेव का ध्यान करके उसे कुण्ड की योनिके समीप अपने सामने रखे | फिर उस प्रोक्षणी के जलसे आसादित वस्तुओं को तीन बार सींचकर समिधाओ के बोझ को खोलकर उसके बंधन को सरकाकर सामने रखे | प्रणीतापात्र में पुष्प छोडकर उसमें भगवान विष्णु का ध्यान करके उसे अग्नि से उत्तर दिशामें कुश के ऊपर स्थापित कर दे ( और अग्नि तथा प्रणीता के मध्य भाग में प्रोक्षणीपात्र को कुशापर रख दे) ||२१-२५||
तदनन्तर आज्यस्थाली को घीसे भरकर अपने आगे रखे | फिर उसे आगपर चढ़कर सम्प्लवन एवं उत्पवन की क्रियाद्वारा घी का संस्कार करे | (उसकी विधि इसप्रकार है – ) प्रादेशमात्र लंबे दो कुश हाथ में ले | उनके अग्रभाग खंडित न हुए हों तथा उनके गर्भ में दूसरा कुश अंग्कुरित न हुआ हो | दोनों हाथों का उत्तान रखे और उनके अंगुष्ठ एवं कनिष्ठिका अँगुलिसे उन कुशों को पकड़े रहे | इस तरह उन कुशोंद्वारा घी को थोडा=थोडा उठाकर ऊपर की ओर तीन बार उछाले | प्रज्वलित तृण आदि लेकर घी को देखे और उसमें कोई अपद्रव्य (खराब वस्तु) हो तो उसे निकाल दे | इसके बाद तृण अग्नि में फेंककर उस घी को आगपर से उतार ले और सामने रखे | फिर स्त्रुक और स्त्रुवा के लेकर उनके द्वारा होम-सम्बन्धी कार्य करे | पहले जलसे उनको धो ले | फिर अग्निसे तपाकर सम्मार्जन कुशोंद्वारा उनका मार्जन करे | (उन कुशों के अग्रभागोद्वारा स्त्रुक-स्त्रुवा के भीतरी भाग का तथा मूल भाग से उनके बाह्यभाग का मार्जन करना चाहिये )| तत्पस्च्यात पुन: उन्हें जलसे धोकर आगसे तपावे और अपने दाहिने भाग में स्थापित कर दे | उसके बाद साधक प्रणव से ही अथवा देवता के नाम के आदिमें ‘प्रणव’ तथा अंत में ‘नम:’ पद लगाकर उसके उच्चारणपूर्वक होम करे ||२६-२९||
हवन से पहले अग्नि के गर्भाधान से लेकर सम्पूर्ण संस्कार अंग-व्यवस्था के अनुसार सम्पन्न करने चाहिये | मतान्तर के अनुसार नामांतव्रत, व्रतबंधान्तव्रत (यज्ञोपवीतांत), समावर्तनान्त अथवा यज्ञाधिकारांत संस्कार अंगानुसार करने चाहिये | साधक सर्वत्र प्रणव का उच्चारण करते हुए पूजनोपचार अर्पित करे और अपने वैभव के अनुसार प्रत्येक संस्कार के लिये अंग-संबंधी मंत्रोद्वारा होम करे | पहला गर्भाधान-संस्कार है, दूसरा पुंसवन, तीसरा सीमान्तोन्न्यन, चौथा जातकर्म, पाँचवाँ नामकरण, छठा चूडाकरण, सातवाँ व्रतबंध (यज्ञोपवित), आठवाँ वेदारम्भ, नवाँ समावर्तन तथा दसवाँ पत्नीसंयोग (विवाह) संस्कार है | जो यज्ञ के लिए अधिकार प्रदान करनेवाला है | क्रमश: एक-एक संस्कार-कर्म का चिंतन और तदनुरूप पूजन करते हुए ह्रदय आदि अंग-मंत्रोद्वारा पूजन प्रति कर्म के लिये आठ-आठ आहुतियाँ अर्पित करे ||३०-३५||
तदनन्तर साधक मूलमंत्रद्वारा स्त्रुवा से पूर्णाहुति दे | उससमय मंत्र के अंतमे ‘ वौषट’ पद लगाकर प्लुतस्वर से सुस्पष्ट मंत्रोच्चारण करना चाहिये | इस तरह वैष्णव-अग्नि का संस्कार करके उसपर विष्णु-देवता के निमित्त चरु पकावे | वेदिप्र भगवान विष्णु की स्थापना एवं आराधना करके मंत्रो का स्मरण करते हुए उनका पूजन करे | अंग और आवरण-देवताओं सहित इष्टदेव श्रीहरि को आसन आदि उपचार अर्पित करते हुए उत्तम रीतिसे उनकी पूजा करनी चाहिये | फिर गन्ध – पुष्पोंद्वारा अर्चना करके सुरश्रेष्ठ नारायणदेव का ध्यान करने के अनन्तर अग्नि में समिधा का आधान करे और अग्रिश्वर श्रीहरि के समीप ‘आघार’ संज्ञक दो घृताहुतियाँ दे | इनमें से एक को तो वायव्यकोण में दे और दूसरी को नैऋत्य कोण में | यही इनके लिये क्रम हैं | तत्पश्च्यात ‘आज्यभाग’ नामक दो आहुतियाँ क्रमशः दक्षिण और उत्तर दिशामें दे और उनमें अग्निदेव के दायें-बायें नेत्र की भावना करे | शेष सब आहुतियों को इन्हीं के बीच में देवताओं की पूजा की गयी है, उसी क्रम से उनके लिये आहुति देने का विधान है |घी से इष्टदेव की मूर्ति को तृप्त करे | इष्टदेव-सम्बन्धी हवन-संख्या की अपेक्षा दशांश से अंग-देवताओं के लिये होम के | घृत आदि से, समिधाओं से अथवा घ्रुतात्क तिलों से सदा यजनीय देवताओं के लिये एक-एक सहस्त्र या एक-एक शत आहुतियाँ देनी चाहिये | इसप्रकार होमान्त-पूजन समाप्त करके स्नानादि से शुद्ध हुए शिष्यों को गुरु बुलाकर अपने आगे बिठावे | वे सभी शिष्य उपवासव्रत किये हों | उनमे पाश-बद्ध पशु की भावना करके उनका प्रोक्षण करे ||३६-४२||
तदनन्तर उन सब शिष्यों को भावनाद्वारा अपने आत्मासे संयुक्त करके अविद्या और कर्म के बन्धनों से आबद्ध हो लिंगशरीर का अनुवर्तन करनेवाले चैतन्य (जीव) का, जो लिंगशरीर के साथ बंधा हुआ है, ध्यानमार्ग से साक्षात्कार करके उसका सम्यक प्रोक्षण करने के पश्च्यात वायुबीज ( यं ) के द्वारा उसके शरीरका शोषण करे | इसके बाद अग्निबीज ( रं ) के चिंतन से अग्नि प्रकट करके यह भावना करे कि ‘ब्रह्मांड’ संज्ञक सारी सृष्टि दग्ध होकर भस्म की पर्वताकार राशि के समान स्थित हैं | तत्पश्च्यात भाव्नाद्वर ही जलबीज ( वं ) के चिंतन से अपार जलराशि प्रकट करके उस भस्मराशि को बहा दे और संसार अब वानिमात्र में ही शेष रह गया है – ऐसा स्मरण करे | तदनन्तर वहाँ ( लं ) बीजस्वरूपा भगवान की पार्थिवी शक्ति का न्यास करे | फिर ध्यानद्वारा देखे कि समस्त तन्मात्राओं से आवृत शुभ पार्थिव – तत्त्व विराजमान है | उससे एक अंड प्रकट हुआ है, जो उसी के आधारपर स्थित है और वही उसका उपादान भी है | उस अंड के भीतर प्रणवस्वरूपा मूर्ति का चिंतन करे ||४३-४७||
तदनन्तर अपने आत्मा में स्थित पूर्वसंस्कृत लिंगशरीर का उस पुरुष में संक्रमण करावे, अर्थात यह भावना करे कि वह पुरुष लिंगशरीर से युक्त है | उसके उस शरीर में सभी इन्द्रियों के आकार पृथक-पृथक अभिव्यक्त हैं तथा वह पुरुष क्रमशः बढ़ता और पुष्ट होता जा रहा है | फिर ध्यान में देखे कि वह अंड एक वर्षतक बढकर और पुष्ट होकर फुट गया है | उसके दो टुकड़े हो गये हैं | उसमें ऊपरवाला टुकड़ा द्युलोक है और नीचेवाला भूलोक | इन दोनों के बीच में प्रजापति पुरुष का प्रार्दुभाव हुआ है | इसप्रकार वहाँ उत्पन्न हुए प्रजपतिका ध्यान करके पुन: प्रणव से उन शिशुरुप प्रजापति का प्रोक्षण करे | फिर यथास्थान पूर्वोक्त न्यास करके उनके शरीर को मंत्रमय बना दे | उनके ऊपर विष्णुहस्त रखे और उन्हें वैष्णव माने | इस तरह एक अथवा बहुत-से लोगों के जन्म का ध्यानद्वारा प्रत्यक्ष करे (शिष्यों के भी नूतन दिव्य जन्म की भावना करे) | तदनन्तर मूलमंत्र से शिष्यों के दोनों हाथ पकडकर मंत्रोपदेष्टा गुरु नेत्रमंत्र (वौषट) के उच्चारणपूर्वक नूतन एवं छिद्ररहित वस्त्र से उनके नेत्रों को बाँध दे | फिर देवाधिदेव भगवान की यथोचित पूजा सम्पन्न करके तत्वज्ञ आचार्य हाथ में पुष्पांजलि धारण करनेवाले उन शिष्यों को अपने पास पूर्वाभिमुख बैठावे ||४८-५३||
इसप्रकार गुरुद्वारा दिव्य नूतन जन्म पाकर वे शिष्य भी श्रीहरि को पुष्पांजलि अर्पित करके पुष्प आदि उपचारों से उनका पूजन करें | तदनन्तर पुन: वासुदेव की अर्चना करके वे गुरु के चरणों का पूजन करें | दक्षिणारूप में उन्हें अपना सर्वस्व अथवा आधी सम्पत्ति समर्पित कर दें | इसके बाद गुरु शिष्यों को आवश्यक शिक्षा दें और वे (शिष्य) नाम- मंत्रोंद्वारा श्रीहरि का पूजन करें | फिर मंडल में विराजमान शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले भगवान विष्वक्सेन का यजन करें, जो द्वारपाल के रूप में अपनी तर्जनी अँगुली से लोगों को तर्जना देते हुए अनुचित क्रियासे रोक रहे हैं | इसके बाद श्रीहरि की प्रतिमा का विसर्जन करे | भगवान विष्णु का सारा निर्माल्य विष्वक्सेन को अर्पित कर दें |
तदनन्तर प्रणीता के जलसे अपना और अग्निकुण्ड का अभिषेक करके वहाँ के अग्निदेव को अपने आत्मा में लीं कर लें | इसके पश्च्यात विष्वक्सेन का विसर्जन करे | ऐसा करने से भोग की इच्छा रखनेवाला साधक सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तु को पा लेता है और मुमुक्ष पुरुष श्रीहरि में विलीन होता – सायुज्य मोक्ष प्राप्त करता हैं ||५४—५८||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘कुण्डनिर्माण और अग्नि – स्थापनसम्बन्धी कार्य आदि का वर्णन’ विषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||२४||
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