अध्याय – 023 देवताओं तथा भगवान विष्णु की सामान्य पूजा-विधि

अध्याय – 023
देवताओं तथा भगवान विष्णु की सामान्य पूजा-विधि
नारदजी बोले – ब्रह्मर्षियो ! अब मैं पूजा की विधि का वर्णन करुँगा,जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता हैं | हाथ-पैर धोकर, आसनपर बैठकर आचमन करे | फिर मौनभाव से रहकर सब ओर से अपनी रक्षा करे | (अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा: सर्वोतोदिशम | सर्वेषामविरोधेन पुजाकर्म समरभें || इत्यादि मंत्रोद्वारा अथवा कवच आदि के मन्त्रों से रक्षा करे | दाहिने हाथ में रक्षा-सूत्र बाँधकर भी रक्षा की जाती है | इसका मंत्र है – येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: | तेन त्वां प्रतिबंधामि रक्षे मा चल मा चल || )

पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके स्वस्तिकासन या पद्मासन आदि कोई-सा आसन बाँधकर स्थिर बैठे और नाभिके मध्यभाग में स्थित धुएँ के समान वर्णवाले, प्रचंड वायुरूप ‘यं’ बीज का चिंतन करते हुए अपने शरीर से सम्पूर्ण पापों को भावनाद्वारा पृथक करे | फिर हृदय-कमल के मध्य में स्थित तेजकी राशिभूत ‘ क्षौं ‘ बीज का ध्यान करते हुए ऊपर, नीचे तथा अगल-बगल में फैली हुई आग्नि की प्रचण्ड ज्वालाओं से उस पाप को जला डाले | इसके बाद बुद्धिमान पुरुष आकाश में स्थित चन्द्रमा की आकृति के समान किसी शांत ज्योतिका ध्यान करे और उससे प्रवाहित होकर ह्रदय-कमल में व्याप्त होनेवाली सुधामय सलिल की धाराओं से, जो सुषुम्रा – योनि के मार्ग से शरीर की सब नादियों में फ़ैल रही है, अपने निष्पाप शरीर को आप्लावित करे | इसप्रकार शरीर की शुद्धि करके तत्वों का नाश करे फिर हस्तशुद्धि करे | इसके लिये पहले दोनों हाथों में अस्त्र एवं व्यापकमुद्रा करे और दाहिने अँगूठे से आरम्भ करके करतल और करपृष्ठतक न्यास करें ||१-६||

इसके बाद एक-एक अक्षर के क्रम से बारह अंगोवाले द्वादशाक्षर मूल-मंत्र का अपने देह में बारह मंत्र-वाक्योंद्वारा न्यास करे | ह्रदय, सिर, शिखा, कवच, अस्त्र, नेत्र, उदर, पीठ, बाहू, ऊरु. घुटना, पैर – ये शरीर के बारह स्थान हैं, इनमे ही द्वादशाक्षर के एक – एक वर्ण का न्यास करे | (यथा- ॐ ॐ नम: ह्रदये | ॐ नं नम: शिरसि | ॐ मों नम: शिखायाम | इत्यादि) | फिर मुद्रा समर्पणकर भगवान विष्णु का स्मरण करें और अष्टोत्तरशत (१०८) मंत्र का जप करके पूजन करे ||७-८||

बायें भाग में जलपात्र और दाहिने भाग में पूजा का सामान रखकर ‘अस्त्राय फट् |’ इस मंत्र से उसको धो दें; इसके पश्च्यात गन्ध और पुष्प आदि से युक्त दो अर्घ्यपात्र रखे | फिर हाथ में जल लेकर ‘अस्त्राय फट् |’ इस मंत्र से अभिमंत्रित कर योगपीठ को सींच दे | उसके मध्य भाग में सर्वव्यापी चेतन ज्योतिर्मय परमेश्वर श्रीहरि का ध्यान करके उस योगपीठपर पूर्व आदि दिशाओं के क्रम से धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अग्नि आदि दिक्पाल तथा अधर्म आदि के विग्रह की स्थापना करे | उस पीठपर कच्छप, अनन्त, पद्म, सूर्य आदि मंडल और विमला आदि शक्तियों की कमल के केसर के रूप में और ग्रहों की कर्णिका में स्थापना करे | पहले अपने हृदय में ध्यान करे | फिर मंडल में आवाहन करके पूजन करे | (आवाहन के अनन्तर) क्रमश: अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि को पुण्डरीकाक्ष – विद्या (ॐ नमो भगवते पुण्डरीकाषाय |’ – इस मंत्र) – से अर्पण करे ||९-१४||

मंडल के पूर्व आदि द्वारों पर भगवान के विग्रह की सेवा में रहनेवाले पार्षदों की पूजा करे | पूर्व के दरवाजेपर गरुड़ की, दक्षिणद्वार पर चक्र की, उत्तरवाले द्वारपर गदा की और ईशान तथा अग्निकोण में शंख एवं धनुष की स्थापना करे | भगवान के बायें-दायें दो तूणीर, बायें भाग में तलवार और चर्म (ढाल), दाहिने भाग में लक्ष्मी और वाम भाग में पुष्टि देवी की स्थापना करे | भगवान के सामने वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ को स्थापित करे | मंडल के बाहर दिक्पालों की स्थापना करे | मंडल के भीतर और बाहर स्थापित किये हुए सभी देवताओं की उनके नाम-मन्त्रों से पूजा करे | सबके अंत में भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिये ||१५-१७||

अन्गोंसहित पृथक-पृथक बीज-मंत्रो से और सभी बीज-मन्त्रों को एक साथ पढकर भी भगवान का अर्चन करे | मंत्र-जप करके भगवान की परिक्रमा करे और स्तुति के पश्चात अर्घ्य-समर्पण कर ह्रदय में भगवान की स्थापना कर ले | फिर यह ध्यान करे कि ‘परब्रह्म भगवान विष्णु मैं ही हूँ’ (-इसप्रकार अभेदभाव से चिंतन करके पूजन करना चाहिये) | भगवान का आवाहन करते समय ‘आगच्छ’ (भगवन ! आइये |) इसप्रकार पढना चाहिये और विसर्जन के समय ‘क्षमस्व’ (हमारी त्रुटियों को क्षमा कीजियेगा |) – ऐसी योजना करनी चाहिये ||१८-१९||

इसप्रकार अष्टाक्षर आदि मन्त्रों से पूजा करके मनुष्य मोक्ष का भागी होता है | यह भगवान के एक विग्रह का पूजन बताया गया | अब नौ व्यूहों के पूजन की विधि सुनो ||२०||

दोनों अंगूठों और तर्जनी आदि में वासुदेव, बलभद्र आदि का न्यास करे | इसके बाद शरीर में अर्थात सिर, ललाट, मुख, हृदय, नाभि, गुह्यअंग, जानु और चरण आदि अंगों में न्यास करे | फिर मध्य में एवं पूर्व आदि दिशाओं में पूजन करे | इसप्रकार एक पीठपर एक व्यूह के क्रम से पूर्ववत नौ व्यूहों के लिये नौ पीठों की स्थापना करे | नौ कमलों में नौ मूर्तियों के द्वारा पूर्ववत नौ व्यूहों का पूजन करें | कमल के मध्यभाग में जो भगवान का स्थान हैं, उसमे वासुदेव की पूजा करे ||२१-२३||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सामान्य पूजा-विषयक वर्णन’ नामक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||२३||

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