अध्याय – 020 सर्ग का वर्णन
अध्याय – 020
सर्ग का वर्णन
अग्निदेव कहते हैं – मुने ! (प्रकृतिसे) पहले महत्तत्त्व की सृष्टि हुई, इसे ब्राह्मसर्ग समझना चाहिये | दूसरी तन्मात्राओं की सृष्टि हुई, इसे भूतसर्ग कहा गया है | तीसरी वैकारिक सृष्टि हैं, इसे ऐन्द्रियकसर्ग कहते हैं | इस प्रकार यह बुद्धिपूर्वक प्रकट हुआ प्राकृतसर्ग तीन प्रकार का हैं | चौथे प्रकार की सृष्टि को ‘मुख्यसर्ग’ कहते हैं | ‘मुख्य’ नाम है – स्थावरों (वृक्ष-पर्वत आदि) – का | जो ‘तिर्यक्स्त्रोता’ कहा गया हैं, अर्थात जिससे पशु-पक्षियों की उत्पत्ति हुई है, वह तैर्यग्योन्य-सर्ग पाँचवाँ हैं | ऊर्ध्व स्त्रोताओं की सृष्टि को देव-सर्ग कहते हैं, यह छठा सर्ग है | इसके पश्चात अर्वाक्स्त्रोताओं की सृष्टि हुई – यही सातवाँ मानव-सर्ग हैं | आठवाँ अनुग्रह-सर्ग हैं, जो सात्त्विक और तामस भी है | ये अन्तवाले पाँच ‘वैकृतसर्ग’ है और आरम्भ के तीन ‘प्राकृतसर्ग’ कहे गये हैं | प्राकुत और वैकृत सर्ग तथा नवें प्रकारका कौमार-सर्ग- ये कुल नौ सर्ग ब्रह्माजी से प्रकट हुए, जो इस जगत के मूल कारण हैं | ख्याति आदि दक्ष-कन्याओं से भृगु आदि महर्षियों ने ब्याह किया | कुछ लोग नित्य, नैमित्तिक और प्राकृत- इस भेदसे तीन प्रकार की सृष्टि मानते हैं | जो प्रतिदिन होनेवाले अवांतर-प्रलय से प्रतिदिन जन्म लेते रहते हैं, वह ‘नित्यसर्ग’ कहा गया हैं ||१-८||
भृगु से उनकी पत्नी ख्यातिने धाता-विधाता नामक दो देवताओं को जन्म दिया तथा लक्ष्मी नाम की कन्या भी उत्पन्न की, जो भगवान विष्णु की पत्नी हुई | इन्द्र ने अपने अभ्युदय के लिये इन्हीं का स्तवन किया था | धाता और विधाता के क्रमशः प्राण और मृकंडु नामक दो पुत्र हुए | मृकंडुसे मार्कण्डेय का जन्म हुआ | उनसे वेद्शिरा उत्पन्न हुए | मरिचिके सम्भूति के गर्भ से पौर्णमास नामक पुत्र हुआ और अंगिरा के स्मृति के गर्भ से अनेक पुत्र तथा सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति नामक चार कन्याएँ हुई | अत्रि के अंश से अनसूयाने सोम, दुर्वासा और दत्तात्रेय नामक पुत्रों को जन्म दिया | इनमें दत्तात्रेय महान योगी थे | पुलस्त्य मुनिकी पत्नी प्रीति के गर्भ से दत्तोलि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ | पुलह से क्षमा के गर्भ से सहिष्णु एवं सर्वपादिक (कर्मपादिक) का जन्म हुआ | क्रतु के सन्नतिसे बालखिल्य नामक साथ हजार पुत्र उत्पन्न हुए, जो अँगूठे के पोरुओं के बराबर और महान तेजस्वी थे | वसिष्ठ से ऊर्जा के गर्भ से राजा, गात्र, ऊर्ध्वबाहु, सवन, अनघ, शुक्र और सुतपा – ये सात ऋषि प्रकट हुए ||९-१५||
स्वाहा एवं अग्निसे पावक, पवमान और शुचि नामक पुत्र हुए | इसीप्रकार अज से अग्निष्वात्त, बर्हिषद, अनग्रि एवं साग्रि पितर हुए | पितरों से स्वधा के गर्भ से मेना और वैधारिणी नामक दो कन्याएँ हुई | अधर्म की पत्नी हिंसा हुई; उन दोनों से अमृत नामक पुत्र और निकृति नामवाली कन्या की उत्पत्ति हुई | (इन दोनों ने परस्पर विवाह किया और) इनसे भय तथा नरक का जन्म हुआ | क्रमशः माया और वेदना इनकी पत्नियाँ हुई | इनमें से माया ने (भय के सम्पर्क से) समस्त प्राणियों के प्राण लेनेवाले मृत्यु को जन्म दिया और वेदना ने नरक के संयोग से दुःख नामक पुत्र उत्पन्न किया | इसके पश्चात मृत्यु से व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध की उत्पत्ति हुई | ब्रह्माजी से एक रोता हुआ पुत्र हुआ, जो रुदन करने के कारण ‘रुद’ नामसे प्रसिद्ध हुआ | तथा हे द्विज ! उन पितामह (ब्रह्माजी)- ने उसे भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र और महादेव आदि नामों से पुकारा | रुद की पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष पर कोप करने के कारण देहत्याग किया और हिमवान की कन्या-रूप में प्रकट होकर पुन: वे शंकरजी की ही धर्मपत्नी हुई | किसी समय नारदजी ने ऋषियों के प्रति विष्णु आदि देवताओं की पूजा का विधान बतलाया था | स्नानादि-पूर्वक की जानेवाली उन पूजाओं का विधिवत अनुष्ठान करके स्वायम्भुव मनु आदिने भोग और मोक्ष-दोनों प्राप्त किये थे ||१६-२३||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘जगत-सृष्टि का वर्णन’ नामक वीसावाँ अध्याय पूरा हुआ ||२०||
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