अध्याय – 017 जगतकी सृष्टि का वर्णन

अध्याय – 017 
जगतकी सृष्टि का वर्णन
अग्निदेव कहते हैं – ब्रह्मन ! अब मैं जगतकी सृष्टि आदि का, जो श्रीहरि की लीलामात्र है, वर्णन करूँगा; सुनो |

श्रीहरि ही स्वर्ग आदि के रचयिता हैं | सृष्टि और प्रलय आदि उन्हीं के स्वरुप हैं | सृष्टि के आदिकारण भी वे ही हैं | वे ही निर्गुण हैं और वे ही सगुण हैं | सबसे पहले सत्स्वरूप अव्यक्त ब्रह्म ही था; उससमय न तो आकाश था और न रात-दिन आदि का ही विभाग था | तदनन्तर सृष्टि कालमें परमपुरुष श्रीविष्णु ने प्रकृति में प्रवेश करके उसे क्षुब्ध (विकृत) कर दिया | फिर प्रकृति से महत्तत्त्व और उससे अहंकार प्रकट हुआ | अहंकार तीन प्रकार का है – वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और भूतादिरूप तामस | तामस अहंकार से शब्द-तन्मात्रावाला आकाश उत्पन्न हुआ | आकाश से स्पर्श-तन्मात्रावाले वायु का प्रादुर्भाव हुआ | वायुसे रूप-तन्मात्रावाला अग्नितत्त्व प्रकट हुआ | अग्नि से रस-तन्मात्रावाले जल की उत्पत्ति हुई और जल से गन्ध-तन्मात्रावाली भूमिका प्रादुर्भाव हुआ | यह सब तामस अहंकार से होनेवाली सृष्टि है | इन्द्रियाँ तैजस अर्थात राजस अहंकार से प्रकट हुई है | दस इन्द्रियों के अधिष्ठाता दस देवता और ग्यारहवीं इन्द्रिय मन ( के भी अधिष्ठाता देवता) – ये वैकारिक अर्थात सात्त्विक अहंकार की सृष्टि हैं | तत्पस्च्यात नाना प्रकार की प्रजा को उत्पन्न करने की इच्छावाले भगवान स्वयम्भुने सबसे पहले जल की ही सृष्टि की और उसमें अपनी शक्ति (वीर्य) का आधान किया | जल को ‘नार’ कहा गया हैं; क्योंकि वह नर से उत्पन्न हुआ है | ‘नार’ (जल) ही पूर्वकाल में भगवान का ‘अयन’ (निवास-स्थान) था; इसलिए भगवान को ‘नारायण’ कहा गया है ||१-७||

स्वयम्भू श्रीहरि ने जो वीर्य स्थापित किया था, वह जलमे सुवर्णमय अंड के रूप में प्रकट हुआ | उसमें साक्षात स्वयम्भू भगवान ब्रह्माजी प्रकट हुए, ऐसा हमने सुना हैं | भगवान हिरण्यगर्भ ने एक वर्षतक उस अंड के भीतर निवास करके उसके दो भाग किये | एक का नाम ‘ध्युलोक] हुआ और दुसरे का ‘भूलोक’ | उन दोनों अंड-खंडों के बिचमें उन्होंने आकाश की सृष्टि की | जल के ऊपर तैरती हुई पृथ्वी को रखा और दसों दिशाओं के विभाग किये | फिर सृष्टि की इच्छावाले प्रजापति ने वहाँ काल, मन, वाणी, काम, क्रोध तथा रति आदि की तत्तरूप से सृष्टि की | उन्होंने आदि में विद्युत्, वज्र, मेघ, रोहित इन्द्रधनुष, पक्षियों तथा पर्जन्य का निर्माण किया | तत्पस्च्यात यज्ञ की सिद्धि के लिये मुखसे ऋक, यजु, और सामवेद को प्रकट किया | उनके द्वारा साध्यगणों ने देवताओं का यजन किया | फिर ब्रह्माजी ने अपनी भुजसे ऊँचे-नीचे (या छोटे-बड़े) भूतों को उत्पन्न किया, सनत्कुमार की उत्पत्ति की तथा क्रोध से प्रकट होनेवाले रुद को जन्म दिया | मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ – इन सात ब्रह्मपुत्रों को ब्रह्माजी ने निश्चय ही अपने मनसे प्रकट किया | साधुश्रेष्ठ ! ये तथा रुद्रगण प्रजावर्ग की सृष्टि करते हैं | ब्रह्माजी ने अपने शरीर के दो भाग किये | आधे भागसे वे पुरुष हुए और आधेसे स्त्री बन गये; फिर उस नारी के गर्भ से उन्होंने प्रजाओं की सृष्टि की | (ये ही स्वायम्भुव मनु तथा शतरूपा के नामसे प्रसिद्ध हुए | इनसे ही मानवीय सृष्टि हुई |) ||८-१७||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘जगतकी सृष्टि का वर्णन’ नाम सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ||१७||

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