अध्याय – 013 महाभारत की कथा

अध्याय – 013 
महाभारत की कथा
अग्निदेव कहते है – अब मैं श्रीकृष्ण की महिमा को लक्षित करानेवाला महाभारत का उपाख्यान सुनाता हूँ, जिसमें श्रीहरिने पांडवों को निमित्त बनाकर इस पृथ्वी का भार उतारा था | भगवान विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए | ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रिसे चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानन्दन पुरुरवा का जन्म हुआ | पुरुरवा से आयु, आयुसे राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए | ययाति से पुरु हुए | पुरु के वंश में भरत और भरत के कुलमें राजा कुरु हुए | कुरु के वंश में शान्तनु का जन्म हुआ | शान्तनु से गंगानंदन भीष्म उत्पन्न हुए | उनके दो छोटे भाई और थे – चित्रागंद और विचित्रवीर्य | ये शान्तनु से सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न हुए थे | शान्तनु के स्वर्गलोक चले जानेपर भीष्म ने अविवाहित रहकर अपने भाई विचित्रवीर्य के राज्य का पालन किया | चित्रागंद बाल्यावस्था में ही चित्रागंद नामवाले गन्धर्व के द्वारा मारे गये | फिर भीष्म संगाम में विपक्षी को परास्त करके काशिराज की दो कन्याओं – अम्बिका और अम्बालिका को हर लाये | वे दोनों विचित्रवीर्य की भार्यायें हुई | कुछ काल के बाद राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मा से ग्रस्त हो स्वर्गवासी हो गये | तब सत्यवती की अनुमति से व्यासजी के द्वारा अम्बिका के गर्भ से राजा धृतराष्ट्र और अम्बालिका के गर्भ से पांडू उत्पन्न हुए | धृतराष्ट्र ने गांधारी के गर्भ से सौ पुत्रों को जन्म दिया, जिन में दुर्योधन सबसे बड़ा था ||१-८||

राजा पांडू वनमें रहते थे | वे एक ऋषिके शापवश शतश्रंग मुनिके आश्रम के पास स्त्री- समागम के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए | [पांडू शाप के ही कारण स्त्री-सम्भोग से दूर रहते थे,] इसलिए उनकी आज्ञा के अनुसार कुंती के गर्भ से धर्म के अंश से युधिष्ठिर का जन्म हुआ | वायु से भीम और इन्द्र से अर्जुन उत्पन्न हुए | पांडू की दूसरी पत्नी माद्री के गर्भ से अश्विनीकुमारों के अंश से नकुल-सहदेव का जन्म हुआ | [शापवश] एक दिन माद्री के साथ सम्भोग होने से पांडू की मृत्यु हो गयी और माद्री भी उनके साथ सती हो गयी | जब कुंती का विवाह नहीं हुआ था, उसी समय [सूर्य के अंश से ] उनके गर्भ से कर्ण का जन्म हुआ था | वह दुर्योधन के आश्रय में रहता था | दैवयोग से कौरवों और पांडवों में वैर की आग प्रज्वलित हो उठी | दुर्योधन बड़ी खोटी बुद्धि का मनुष्य था | उसने लाक्षा के बने हुए घर में पांडवों को रखकर आग लगाकर उन्हें जलाने का प्रयत्न किया; किंतु पाँचों पांडव अपनी माता के साथ उस जलते हुए घर से बाहर निकल गये | वहाँ से एकचक्रा नगरीमें जाकर वे मुनि के वेष में एक ब्राह्मण के घरमें निवास करने लगे | फिर बक नामक राक्षस का वध करके वे पांचाल-राज्य में, जहाँ द्रौपदी का स्वयंवर होनेवाला था, गये | वहाँ अर्जुन के बाहुबल से मत्स्यभेद होनेपर पाँचों पांडवों ने द्रौपदी को पत्नीरूप में प्राप्त किया | तत्पस्च्यात दुर्योधन आदि को उनके जीवित होने का पता चलनेपर उन्होंने कौरवों से अपना आधा राज्य भी प्राप्त कर लिया | अर्जुन ने अग्निदेव ने दिव्य गाण्डीव धनुष और उत्तम रथ प्राप्त किया था | उन्हें युद्ध में भगवान कृष्ण-जैसे सारथि मिले थे तथा उन्होंने आचार्य द्रोण से ब्रह्मास्त्र आदि दिव्य आयुध और कभी नष्ट न होनेवाले बाण प्राप्त किये थे | अभी पांडव सब प्रकार की विद्याओं में प्रवीण थे ||९-१६||

पांडूकुमार अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ खाण्डव वन में इन्द्र के द्वारा की हुई वृष्टि का अपने बाणों की [छ्त्राकार] बांध से निवारण करते हुए अग्नि को तृप्त किया था | पांडवों ने सम्पूर्ण दिशोओं पर विजय पायी | युधिष्ठिर राज्य करने लगे | उन्होंने प्रचुर सुवर्णराशि से परिपूर्ण राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया | उनका यह वैभव दुर्योधन के लिये असह्य हो उठा | उसने अपने भाई दु:शासन और वैभवप्राप्त सुहृद कर्ण के कहने से शकुनिको साथ ले, ध्युत-सभा में जुए में प्रवृत्त होकर, युधिष्ठिर और उनके राज्य को कपट-ध्युत के द्वारा हँसते-हँसते जीत लिया | जुएमें परास्त होकर युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ वनमें चले गये | वहाँ उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बारह वर्ष व्यतीत किये | वन में भी पहलेही की भाँती प्रतिदिन बहुसंख्यक ब्राह्मणों को भोजन कराते थे | [एक दिन उन्होंने] अठासी हजार द्विजोंसहित दुर्वासा को [श्रीकृष्ण-कृपासे] परितृप्त किया | वहाँ उनके साथ उनकी पत्नी द्रौपदी तथा पुरोहित धौम्यजी भी थे | बारहवाँ वर्ष बीतनेपर वे विराटनगर में गये | वहाँ युधिष्ठिर सबसे अपरिचित रहकर ‘कंक’ नामक ब्राह्मण के रूप में रहने लगे | भीमसेन रसोइया बने थे | अर्जुन ने अपना नाम ‘ब्रह्न्नला’ रखा था | पांडवपत्नी द्रौपदी रनिवास में सैरन्ध्री के रूप में रहने लगी | इसीप्रकार नकुल-सहदेव ने भी अपने नाम बदल लिये थे | भीमसेन ने रात्रिकाल में द्रौपदी का सतीत्व-हरण करने की इच्छा रखनेवाले कीचक को मार डाला | तत्पश्चात कौरव विराट की गौओं को हरकर ले जाने लगे, तब उन्हें अर्जन ने परास्त किया | उससमय कौरवों ने पांडवों को पहचान लिया | श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा ने अर्जुनसे अभिमन्यु नामक पुत्र को उत्पन्न किया था | उसे राजा विराट ने अपनी कन्या उत्तरा ब्याह दी ||१७-२५||

धर्मराज युधिष्ठिर सात अक्षौहिणी सेना के स्वामी होकर कौरवों के साथ युद्ध करने को तैयार हुए | पहले भगवान श्रीकृष्ण परम क्रोधी दुर्योधन के पास दूर बनकर गये | उन्होंने ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी राजा दुर्योधन से कहा- ‘राजन ! तुम युधिष्ठिर को आधा राज्य दे दो या उन्हें पाँच तुम गाँव अर्पित कर दो; नहीं तो उनके साथ युद्ध करो |’ श्रीकृष्ण की बात सुनकर दुर्योधन ने कहा – ‘मैं उन्हें सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूँगा; हाँ, उनसे युद्ध अवश्य करूँगा |’ ऐसा कहकर वह भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने के लिये उद्यत हो गया | उससमय राजसभा में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम दुर्धर्ष विश्वरूप का दर्शन कराकर दुर्योधन भयभीत कर दिया | फिर विदुर ने अपने घर ले जाकर भगवान का पूजन और सत्कार किया | तदनन्तर वे युधिष्ठिर के पास लौट गये और बोले – ‘महाराज ! आप दुर्योधन के साथ युद्ध कीजिये/ ||२६-२९||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘आदिपर्व से आरम्भ करके [उद्योगपर्व-पर्यत] महाभारत कथा का संक्षिप्त वर्णन’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ||१३||

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