अध्याय – 012 हरिवंश का वर्णन एवं श्रीकृष्णावतार की कथा
अध्याय – 012
हरिवंश का वर्णन एवं श्रीकृष्णावतार की कथा
जो इस हरिवंश का पाठ करता है वह सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त करके अन्तमें श्रीहरि के समीप जाता हैं
अग्निदेव कहते हैं – अब मैं हरिवंश का वर्णन करूँगा | श्रीविष्णु के नाभि-कमलसे ब्रह्माजी का प्रादुर्भाव हुआ | ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रिसे सोम, सोमसे [बुध एवं बुधसे] पुरुरवा उत्पन्न हुए | पुरुरवासे आयु, आयुसे नहुष तथा नहुष से ययाति का जन्म हुआ | ययाति की पहली पत्नी देवयानी ने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रों को जन्म दिया | उनकी दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा के गर्भ से, जो वृषपर्वा की पुत्री थी, द्रुह्यु, अनु और पुरु – ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए | यदु के वंशमें ‘यादव’ नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए | उन सबमें भगवान वासुदेव सर्वश्रेष्ठ थे | परम पुरुष भगवान विष्णु ही इस पृथ्वी का भार उतारने के लिये वसुदेव और देवकी के पुत्ररूप में प्रकट हुए थे | भगवान विष्णु की प्रेरणासे योग-निद्राने क्रमशः छ: गर्भ, जो पूर्वजन्म में हिरण्यकशिपु के पुत्र थे, देवकी के उद्र्में स्थापित किये | देवकी के उदरसे सातवें गर्भ के रुपमे बलभद्रजी [प्रकट हुए थे | ये देवकीसे रोहिणी के गर्भ से खींचकर लाये गये थे, इसलिये [संकर्षण तथा] रौहीणेय कहलाये | तदनन्तर श्रावण मासके कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात के समय चार भुजाधारी भगवान श्रीहरि प्रकट हुए | उससमय देवकी और वसुदेव ने उनका स्तवन किया | फिर वे दो बाँहोंवाले नन्हें-से बालक बन गये | वसुदेव ने कंस के भयसे अपने शिशु को यशोदा की शय्यापर पहुँचा दिया और यशोदा की नवजात बालिका को देवकी की शय्यापर लाकर सुला दिया | बच्चे के रोने की आवाज सुनकर कंस आ पहुँचा और देवकी के मना करनेपर भी उनसे उस बालिका को उठाकर शिलापर पटक दिया | उसने आकाशवाणी से सुन रखा था कि देवकी के आठवे गर्भ से मेरी मृत्यु होगी | इसलिये उसने देवकी के उत्पन्न हुए सभी शिशुओं को मार डाला था ||१-९||
कंस के द्वारा शिलापर पटकी हुई वह बालिका आकाश में उड़ गयी और वहीँ से इसप्रकार बोली-‘कंस ! मुझे पटकने से तुम्हारा क्या लाभ हुआ? जिनके हाथ से तुम्हारा वध होगा वे देवताओं के सर्वस्वभूत भगवान तो इस पृथ्वी का भार उतारने के लिये अवतार ले चुके’ ||१०-११||
ऐसा कहकर वह चली गयी | उसीने देवताओं की प्रार्थना से शुम्भ आदि दैत्यों का वध किया | तब इन्द्र ने इसप्रकार स्तुति की – ‘जो आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रकाली, भद्रा, क्षेम्या, क्षेमकरी तथा नैकबाहु आदि नामों से प्रसिद्ध हैं, उन जगदम्बा को मैं नमस्कार करता हूँ |’ जो तीनों समय इन नामों का पाठ करता हैं, उसकी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं | उधर कंस भी (बालिका की बात सुनकर) नवजात शिशुओं का वध करने के लिये पूतना आदि को सब और भेजा | कंस आदिसे डरे हुए वासुदेव ने अपने दोनों पुत्रों की रक्षा के लिये उन्हें गोकुल में यशोदापति नंदजी को सौंप दिया था | वहाँ बलराम और श्रीकृष्ण – दोनों भाई गौओं तथा ग्वालबालों के साथ विचरा करते थे | यद्यपि वे सम्पूर्ण जगत के पालक थे, तो भी व्रज में गोपालक बनकर रहे | एक बार श्रीकृष्ण के ऊधम से तंग आकर मैया यशोदा ने उन्हें रस्सी से ऊखल में बाँध दिया | वे ऊखल घसीटते हुए दो अर्जुन-वृक्षों के बीचसे निकले | इससे वे दोनों वृक्ष टूटकर गिर पड़े | एक दिन श्रीकृष्ण एक छकड़े के नीचे सो रहे थे | वे माता का स्तनपान करने की इच्छासे अपने पैर फेंक-फेंककर रोने लगे | उनके पैर क हल्का-सा आघात लगते ही छकड़ा उलट गया ||१२-१७||
पूतना अपना स्तन पिलाकर श्रीकृष्ण को मारने के लिये उद्यत थी; किंतु श्रीकृष्ण ही उसका काम तमाम कर दिया | उन्होंने वृन्दावन में जाने के पश्च्यात कालियनाग को परास्त किया और उसे यमुना के कुण्ड से निकालकर समुद्र में भेज दिया | बलरामजी के साथ जा, गदेह का रूप धारण करनेवाले धेनुकासुर को मारकर, उन्होंने तालवान को क्षेमयुक्त स्थान बना दिया तथा वृषभरूपधारी अरिष्टासुर और अश्वरूपधारी केशी को मार डाला | फिर श्रीकृष्ण ने इन्द्र्याग के उत्सव को बंद कराया और उसके स्थान में गिरिराज गोवर्धन की पूजा प्रचलित की |इससे कुपित हो इन्द्र ने जो वर्षा आरम्भ की, उसका निवारण श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को धारण करके किया | अन्त में महेंद्र ने आकर उनके चरणों में मस्तक झुकाया और उन्हें ‘गोविंद’ की पदवी दी | फिर अपने पुत्र अर्जुन को उन्हें सौंपा | इससे संतुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने पुन: इन्द्र्याग का भी उत्सव कराया | तदनन्तर एक दिन वे दोनों भाई कंस का संदेश लेकर आये हुए अक्रूर के साथ रथपर बैठकर मथुरा चले गये | जाते समय श्रीकृष्ण में अनुराग रखनेवाली गोपियाँ, जिनके साथ वे भाँती-भाँती की मधुर लीलाएँ कर चुके थे, उन्हें बहुत देरतक निहारती रहीं | मार्ग में अक्रूर ने उनकी स्तुति की | मथुरा में एक रजक (धोबी) को, जो बहुत बढ़-बढकर बातें बना रहा था, मारकर श्रीकृष्ण ने उससे सारे वस्त्र ले लिये ||१८-१९||
एक माली के द्वारपर उन्होंने बलरामजी के साथ फुल की मालाएँ धारण की और माली को उत्तम वर दिया | कंस की दासी कुब्जाने उनके शरीर में चंद्रन का लेप कर दिया, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसका कुबड़ापन दूर कर दिया- उसे सुडौल एवं सुन्दरी बना दिया | आगे जानेपर रंगशाला के द्वारपर खड़े हुए कुवलयापीड नामक नामक मतवाले हाथी को मारा और रंगभूमि में प्रवेश करके श्रीकृष्ण ने मंचपर बैठे हुए कंस आदि राजाओं के समक्ष चाणूर नामक मल्ल के साथ [उसके ललकारने पर ] कुश्ती लड़ी और बलराम ने मुष्टिक नामवाले पहलवान के साथ दंगल शुरू किया | उन दोनों भाइयों ने चाणूर, मुष्टिक तथा अन्य पहलवानों को भी [बात-की-बातमें] मार गिराया | तत्पस्च्यात श्रीहरी ने मठुराधिपति कंस को मारकर उसके पिता उग्रसेन को यदुवंशियों का राजा बनाया | कंस के दो रानियाँ थी – अस्ति और प्राप्ति | वे दोनों जरासन्ध की पुत्रियाँ थीं | उनकी प्रेरणा से जरासन्ध ने मथुरापुरी पर घेरा डाल दिया और यदुवंशियों के साथ बाणों से युद्ध करने लगा | बलराम और श्रीकृष्ण जरासन्ध को परास्त करके मथुरा छोडकर गोमन्त पर्वतपर चले आये और द्वारका नगरी का निर्माण करके वहाँ यदुवंशियों के साथ रहने लगे | उन्होंने युद्ध में वासुदेव नाम धारण करनेवाले पौंड्रिक को भी मारा तथा भूमिपुत्र नरकासुर का वध करके उसके द्वारा हरकर लायी हुई देवता, गन्धर्व तथा यक्षों की कन्याओं के साथ विवाह किया | श्रीकृष्ण के सोलह हजार आठ रानियाँ थीं, उनमे रुक्मिणी आदि प्रधान थीं ||२४-३१||
इसके बाद नरकासुर का दमन करनेवाले भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरुडपर आरूढ़ हो स्वर्गलोक में गये | वहाँ से इन्द्र को परास्त करके रत्नोंसहित मणिपर्वत तथा पारिजात वृक्ष उठा लाये और उन्हें सत्यभामा के भवन में स्थापित कर दिया | श्रीकृष्ण ने सांदीपनि मुनिसे अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी | शिक्षा पाने के अनन्तर उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप में गुरु के मरे हुए बालक को लाकर दिया था | इसके लिये उन्हें ‘पंचजन’ नामक दैत्य को परास्त करके यमराज के लोकमें भी जाना पड़ा था | वहाँ यमराज ने उनकी बड़ी पूजा की थी | उन्होंने राजा मुचुकुन्द के द्वारा कालयवन का वध करवा दिया | उस समय मुचुकुन्द ने भी भगवान की पूजा की | भगवान श्रीकृष्ण वसुदेव, देवकी तथा भगवद्भक्त ब्राह्मणों का बड़ा आदर-सत्कार करते थे | बलभद्रजी के द्वारा रेवती के गर्भ से निशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए | श्रीकृष्ण द्वारा जाम्बवती के गर्भ से साम्ब का जन्म हुआ | इसीप्रकार अन्य रानियों से अन्यान्य पुत्र उत्पन्न हुए | रुक्मिणी के गर्भसे प्रद्दुम्न का जन्म हुआ था | वे अभी छ: दिन के थे, तभी शम्बरासूर उन्हें मायाबल से हर ले गया | उसने बालक को समुद्र में फेंक दिया | समुद्र में एक मत्स्य उसे निगल गया | उस मत्स्य को एक मल्लाह ने पकड़ा और शम्बरासूर को भेंट किया | फिर शम्बरासूर ने उस मत्स्य को मायावती के हवाले कर दिया | मायावती ने मत्स्य के पेट में अपने पति को देखकर बड़े आदरसे उसका पालन-पोषण किया | बड़े हो जानेपर मायावती ने प्रद्दुम्न से कहा- ‘नाथ ! मैं आपकी पत्नी रति हूँ और आप मेरे पति कामदेव हैं | पूर्वकाल में भगवान शंकर ने आपको अनन्ग (शरीररहित) कर दिया था | आपके न रहने से शम्बरासूर मुझे हर लाया है | मैंने उसकी पत्नी होना स्वीकार नहीं किया हैं | आप माया के ज्ञाता हैं, अत: शम्बरासूर का वध किया और अपनी भार्या मायावती के साथ वे श्रीकृष्ण के पास चले गये | उनके आगमन से श्रीकृष्ण और रुक्मिणी को बड़ी प्रसन्नता हुई | प्रद्दुम्न से उदारबुद्धि अनिरुद्ध का जन्म हुआ | बड़े होनेपर वे उषा के स्वामी हुए | राजा बलि के बाण नामक पुत्र था | उषा उसीकी पुत्री थी | उसका निवासस्थान शोणितपुर में था | बाण ने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसको अपना पुत्र मान लिया था | एक दिन शिवजी ने बलोन्मत्त बाणासुर की युद्धविषयक इच्छा से संतुष्ट होकर उससे कहा –‘बाण ! जिस दिन तुम्हारे महल का मयूरध्वज अपने-आप टूटकर गिर जाय, उस दिन यह समझना कि तुम्हें युद्ध प्राप्त होगा |’ एक दिन कैलास पर्वतपर भगवती पार्वती भगवान शंकर के साथ क्रीडा कर रही थीं | उन्हें देखकर उषा के मनमें भी पति की अभिलाषा जाग्रत हुई | पार्वतीजी ने उसके मनोभाव को समझकर कहा – ‘वैशाख मास की द्वादशी तिथि को रात के समय स्वप्न में जिस पुरुष का तुम्हें दर्शन होगा, वही तुम्हारा पति होगा |’ पार्वतीजी की यह बात सुनकर उषा बहुत प्रसन्न हुई | उक्त तिथि को जब वह अपने घरमें सो गयी, तो उसे वैसा ही स्वप्न दिखायी दिया | उषा की एक सखी चित्रलेखा थी | वह बाणासुर के मन्त्री कुम्भाण्ड की कन्या थी | उसके बनाये हुए चित्रपट से उषा ने अनिरुद्ध को पहचाना कि वे ही स्वप्नमें उससे मिले थे | उसने चित्रलेखा के ही द्वारा श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्ध को द्वारका से अपने यहाँ बुला मँगाया | अनिरुद्ध आये और उषा के साथ विहार करते हुए रहने लगे | इसीसमय मयूरध्वज के रक्षकों ने बाणासुर को ध्वज के गिरने की सुचना दी | फिर तो अनिरुद्ध और बाणासुर में भयंकर युद्ध हुआ ||४०-४७||
नारदजी के मुखसे अनिरुद्ध के शोणितपुर पहुंचने का समाचार सुनकर, भगवान श्रीकृष्ण प्रद्दुम्न और बलभद्र को साथ ले, गरूडपर बैठकर वहाँ गये और अग्नि एवं माहेश्वर ज्वर को जीतकर शंकर में परस्पर बाणों के आघात-प्रत्याघात से युक्त भीषण युद्ध होने लगा | नन्दी, गणेश और कार्तिकेय आदि प्रमुख वीरों को गरुड़ आदि ने तत्काल परास्त कर दिया | श्रीकृष्ण ने जृम्भणास्त्र का प्रयोग किया, जिससे भगवान शंकर जँभाई लेते हुए सो गये | इसी बिचमें श्रीकृष्ण ने बाणासुर की हजार भुजाएँ काट डालीं | जृम्भणास्त्र का प्रभाव कम होनेपर शिवजी ने बाणासुर के लिये अभयदान माँगा, तब श्रीकृष्ण ने दो भुजाओं के साथ बाणासुर को जीवित छोड़ दिया और शंकरजी से कहा ||४८-५१||
श्रीकृष्ण बोले – भगवन ! आपने जब बाणासुर को अभयदान दिया हैं, तो मैंने भी दे दिया | हम दोनों में कोई भेद नहीं है | जो भेद मानता हैं, वह नरक में पड़ता हैं ||५२||
श्रीकृष्ण उवाच – त्वया यदभवं दत्तं बाणस्यास्य मयापि तत | आवयोर्नास्ति भेदों वें भेदी नरकमाप्नुयात || (अग्नि. १२/५२)
अग्निदेव कहते हैं – तदनन्तर शिव आदि ने श्रीकृष्ण का पूजन किया | वे अनिरुद्ध और उषा आदि के साथ द्वारका में जाकर उग्रसेन आदि यादवों के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ||५३||
अनिरुद्ध के वज्र नामक पुत्र हुआ | उसने मार्कण्डेय मुनि से सब विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया | बलभद्रजी ने प्रलम्बासूर को मारा, यमुना की धारा को खींचकर फेर दिया, द्विविद नामक वानर का संहार किया तथा अपने हलके अग्रभाग से हस्तिनापुर को गंगा में झुकाकर कौरवों के घमंड को चूर-चूर कर लिया | भगवान श्रीकृष्ण अनेक रूप धारण करके अपनी रुक्मिणी आदि रानियों के साथ विहार करते रहें | उन्होंने असंख्य पुत्रों को जन्म दिया |[अन्तमें यादवों का उपसंहार करके वे परमधाम को पधारे | ] ||५४-५६||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘हरिवंश का वर्णन’ नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ||१२||
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