अध्याय – 010 युद्धकाण्ड की कथा
अध्याय – 010
नारदजी कहते हैं – तदनन्तर श्रीरामचंद्रजी के आदेश से अंगद रावण के पास गये और बोले- ‘रावण ! तुम जनककुमारी सीताको ले जाकर शीघ्र ही श्रीरामचंद्रजी को सौंप दो | अन्यथा मारे जाओगे |’ यह सुनकर रावण उन्हें मारने को तैयार हो गया | अंगद राक्षसों को मार-पीटकर लौट आये और श्रीरामचंद्रजी से बोले- ‘भगवन ! रावण केवल युद्ध करना चाहता है |’ अंगद की बात सुनकर श्रीराम ने वानरों की सेना साथ ले युद्ध के लिये लंका में प्रवेश किया | हनुमान, मैंद, द्विविद, जाम्बवान, नल, नील, तार, अंगद, धूम्र, सुषेण, केसरी,गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, महाबली कम्पन, गवाक्ष, दधिमुख, गवय और गन्धमादन – ये सब तो वहाँ आये ही, अन्य भी बहुत-से वानर आ पहुँचे | इन असंख्य वानरोंसहित [कपिराज] सुग्रीव भी युद्ध के लिये उपस्थित थे | फिर तो राक्षसों और वानरों में घमासान युद्ध छिड़ गया | राक्षस वानरों को बाण, शक्ति और गडा आदि के द्वारा मारने लगे और वानर नख, दाँत एवं शिला आदि के द्वारा राक्षसों का संहार करने लगे | राक्षसों की हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों से युक्त चतुरंगिणी सेना नष्ट-भ्रष्ट हो गयी | हनुमान ने पर्वतशिखर से अपने वैरी धूम्राक्ष का वध कर डाला | नील ने भी युद्ध के लिये सामने आये हुए अकम्पन और प्रहस्त को मौत के घाट उतार दिया ||१-८||
श्रीराम और लक्ष्मण यद्दपि इन्द्रजित के नागास्त्र से बंध गये थे, तथापि गरुड़ की दृष्टि पड़ते ही उससे मुक्त हो गये | तत्पश्चात उन दोनों भाइयों ने बाणों से राक्षसी सेना का संहार आरम्भ किया | श्रीराम ने रावण को यद्ध में अपने बाणों की मारसे जर्जरित कर डाला | इससे दु:खित होकर रावण ने कुम्भकर्ण को सोते से जगाया | जाग्नेप्र कुम्भकर्ण ने हजार घड़े मदिरा पीकर कितने ही भैंस आदि पशुओं का भक्षण किया | फिर रावण से कुम्भकर्ण बोला –‘सीता का हरण करके तुमने पाप किया है | तुम मेरे बड़े भाई हो, इसलिए तुम्हारे कहने से युद्ध करने जाता हूँ | मैं वानरोंसहित रामको मार डालूँगा’ ||९-१२||
ऐसा कहकर कुम्भकर्ण ने समस्त वानरों को कुचलना आरम्भ किया | एक बार उसने सुग्रीव को पकड़ लिया, तब सुग्रीव ने उसकी नाक और कान काट लिये | नाक और कान से रहित होकर वह वानरों का भक्षण करने लगा | यह देख श्रीरामचंद्रजी ने अपने बाणों से कुम्भकर्ण की दोनों भुजाएँ काट डाली | इसके बाद उसके दोनों पैर तथा मस्तक काटकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया | तदनन्तर कुम्भ, निकुम्भ, राक्षस, मकराक्ष, महोदर, महापार्श्व, मत्त, राक्षसश्रेष्ठ उन्मत, प्रघस, भासकर्ण, विरुपाक्ष, देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय युद्ध में कूद पड़े | तब इनको तथा और भी बहुत-से युद्धपरायण राक्षसों को श्रीराम, लक्ष्मण, विभीषण एवं वानरों ने पृथ्वीपर सुला दिया | तत्पश्च्यात इन्द्रजित (मेघनाद)-ने मायासे युद्ध करते हुए वरदान में प्राप्त हुए नागपाशद्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को बाँध लिया | उससमय हनुमानजी के द्वारा लाये हुए पर्वतपर उगी हुई ‘विशल्या’ नाम की ओषधि से श्रीराम और लक्ष्मण के घाव अच्छे हुए || उनके शरीर से बाण निकाल दिये गये | हनुमानजी पर्वत को जहाँ से लाये थे, वहीँ उसे पुन: रख आये | इधर मेघनाद निकुम्भिलादेवी के मंदिर में होम आदि करने लगा | उस समय लक्ष्मण ने अपने बाणों से इन्द्र को भी परास्त कर देनेवाले उस वीर को युद्ध में मार गिराया | पुत्र की मृत्यु का समाचार पाकर रावण शोक से संतप्त हो उठा और सीता को मार डालने के लिये उद्यत हो उठा; किंतु अविन्ध्य के मना करनेसे वह मान गया और रथपर बैठकर सेनासहित युद्धभूमि में गया | तब इन्द्र के आदेश से मातलि ने आकर श्रीरघुनाथजी को भी देवराज इन्द्र के रथपर बिठाया ||१३-२२||
श्रीराम और रावण का युद्ध श्रीराम और रावण के युद्ध के ही समान था – उसकी कहीं भी दूसरी कोई उपमा नहीं था | रावण वानरोंपर प्रहार करता था और हनुमान आदि वानर रावणको चोट पहुँचाते थे | जैसे मेघ पानी बरसाता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजीने रावण के ऊपर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी | उन्होंने रावण के रथ, ध्वज, अश्व, सारथि, धनुष, बाहू और मस्तक काट डाले | काटे हुए मस्तकों के स्थानपर दूसरे ने मस्तक उत्पन्न हो जाते थे | यह देखकर श्रीरामचंद्रजीने ब्रह्मास्त्र के द्वारा रावण का वक्ष:स्थल विदीर्ण करके उसे रणभूमि में गिरा दिया | उस समय [मरनेसे बचे हुए सब] राक्षसों के साथ रावण की अनाथा स्त्रियाँ विलाप करने लगी | तब श्रीरामचंद्रजी की आज्ञा से विभीषण ने उन सबको सान्त्वना दे, रावण के शव का दाह-संस्कार किया | तदनंतर श्रीरामचंद्रजी ने हनुमानजी के द्वारा सीताजी को बुलवाया | यद्यपि वे स्वरुप से ही नित्य शुद्ध थी, तो भी उन्होंने अग्नि में प्रवेश करके अपनी विशुद्धता का परिचय दिया | त्त्पश्च्यात रघुनाथजी ने उन्हें स्वीकार किया | इसके बाद इन्द्रादि देवताओं ने उनका स्तवन किया |फिर ब्रम्हाजी तथा स्वर्गवासी महाराज दशरथ ने आकर स्तुति करते हुए कहा – ‘श्रीराम ! तुम राक्षसों का संहार करनेवाले साक्षात् श्रीविष्णु हो |’ फिर श्रीराम के अनुरोध से इन्द्र ने अमृत बरसाकर मरे वानरों को जीवित कर दिया | समस्त देवता युद्ध देखकर, श्रीरामचंद्रजी के द्वारा पूजित हो, स्वर्गलोक में चले गये | श्रीरामचंद्रजी ने लंका का राज्य विभीषण को दे दिया और वानरों का विशेष सम्मान किया ||२३-२९||
फिर सबको साथ ले, सीतासहित पुष्पक विमानपर बैठकर श्रीराम जिस मार्ग से आये थे, उसीसे लौट चले | मार्ग में वे सीता को प्रसन्नचित्त होकर वनों और दुर्गम स्थानों को दिखाते जा रहे थे | प्रयाग में महर्षि भरद्वाज को प्रणाम करके वे अयोध्या के पास नन्दीग्राम में आये | वहाँ भरत ने उनके चरणों में प्रणाम किया | फिर वे अयोध्या में आकर वहीं रहने लगे | सबसे पहले उन्होंने महर्षि वसिष्ठ आदि को नमस्कार करके क्रमश: कौसल्या, कैकयी और सुमित्रा के चरणों में मस्तक झुकाया | फिर राज्य-ग्रहण करके ब्राह्मणों आदि का पूजन किया | अश्वमेघ-यज्ञ करके उन्होंने अपने आत्मस्वरूप श्रीवासुदेव का यजन किया, सब प्रकार के दान दिये और प्रजाजनों का पुत्रवत पालन करने लगे | उन्होंने धर्म और कामादिका भी सेवन किया तथा वे दुष्टों को सदा दण्ड देते रहे | उनके राज्यमें सब लोक धर्मपरायण थे तथा पृथ्वीपर सब प्रकार की खेती फली-फूली रहती थी | श्रीरघुनाथजी के शासनकाल में किसी की अकालमृत्यु भी नहीं होती थी ||३०-३५||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘रामायण-कथा के अन्तर्गत युद्धकाण्ड की कथा का वर्णन’ नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||१०||
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