अध्याय – 006 अयोध्याकाण्ड की संक्षिप्त कथा
अध्याय – 006
अयोध्याकाण्ड की संक्षिप्त कथा
नारदजी कहते हैं – भरत के ननिहाल चले जानेपर [लक्ष्मणसहित] श्रीरामचन्द्रजी ही पिता-माता आदि के सेवा-सत्कार में रहने लगे | एक दिन राजा दशरथ ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा – ‘रघुनन्दन ! मेरी बात सुनो | तुम्हारे गुनोंओर अनुरक्त हो प्रजाजनों ने मन-ही-मन तुम्हें राज-सिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया हैं – प्रजा की यह हार्दिक इच्छा है कि तुम युवराज बनो; अत: कल प्रात:काल मैं तुम्हें युवराजपद प्रदान कर दूँगा | आज रात में तुम सीता-सहित उत्तम व्रत का पालन करते हुए संयमपूर्वक रहो |’
राजा के आठ मन्त्रियों तथा वसिष्ठजी ने भी उनकी इस बात का अनुमोदन किया | उन आठ मन्त्रियों के नाम इसप्रकार है – दृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, राज्यवर्धन, अशोक, धर्मपाल तथा सुमन्त्र | इनके अतिरिक्त वसिष्ठजी भी [मन्त्रणा देते थे] | पिता और मन्त्रियों की बातें सुनकर श्रीरघुनाथजी ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और माता कौशल्या को यह शुभ समाचार बताकर देवताओं की पूजा करके वे संयम में स्थित हो गये |
उधर महाराज दशरथ वसिष्ठ आदि मन्त्रियों को यह कहकर कि ‘आपलोग श्रीरामचन्द्र के राज्याभिषेक की सामग्री जुटाये’, कैकेयी के भवन में चले गये | कैकेयी के मन्थरा नामक एक दासी थी, जो बड़ी दुष्टा थी | उसने अयोध्या की सजावट होती देख, श्रीरामचंद्रजी के राज्याभिषेक की बात जानकर रानी कैकेयी से सारा हाल कह सुनाया | एक बार किसी अपराध के कारण श्रीरामचंद्रजी ने मन्थरा को उसके पैर पकडकर घसीटा था | उसी वैर के कारण वह सदा यही चाहती थी कि राम का वनवास हो जाय || १ – ८ ||
मन्थरा बोली – कैकेयी ! तुम उठो, राम का राज्याभिषेक होने जा रहा है | यह तुम्हारे पुत्र के लिए, मेरे लिये और तुम्हारे लिये भी मृत्यु के समान भयंकर वृतान्त है – इसमें कोई संदेह नहीं है || ९ ||
मन्थरा कुबड़ी थी | उसकी बात सुनकर रानी कैकेयी को प्रसन्नता हुई | उन्होंने कुब्जा को एक आभूषण उतारकर दिया और कहा –‘मेरे लिये तो जैसे राम हैं, वैसे ही मेरे पुत्र भरत भी हैं | मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे भरत को राज्य मिल सके |’ मन्थरा ने उस हार को फेंक दिया और कुपित होकर कैकेयी से कहा || १०-११ ||
मन्थरा बोली – ओ नादान ! तू भरत को, अपने को और मुझे भी राम से बचा | कल राम राजा होंगे | फिर राम के पुत्रों को राज्य मिलेगा |कैकेयी ! अब राजवंश भरत से दूर हो जायगा | [मैं भरत को राज्य दिलाने का एक उपाय बताती हूँ |] पहले की बात है | देवासुर-संग्राम में शम्बरासूर ने देवताओं को मार भगाया था | तेरे स्वामी भी उस युद्ध गये थे | उससमय तूने अपनी विद्या से रात में स्वामी की रक्षा की थी | इसके लिये महाराज ने तुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी | इससमय उन्हीं दोनों वरों को उनसे माँग | एक वर के द्वारा राम का चौदह वर्षो के लिये वनवास और दुसरे के द्वारा भरत का युवराज-पद पर अभिषेक माँग ले | राजा इससमय वे दोनों वर दे देंगे || १२-१५ ||
इसप्रकार मन्थरा के प्रोत्साहन देनेपर कैकेयी अनर्थ में ही अर्थ की सिद्धि देखने लगी और बोली –‘कुब्जे ! तूने बड़ा अच्छा उपाय बताया है | राजा मेरा मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगे |’ ऐसा कहकर वह कोपभवन में चली गयी और पृथ्वीपर अचेत-सी होकर पड रही | उधर महाराज दशरथ ब्राह्मण आदि का पूजन करके जब कैकेयी के भवन में आये तो उसे रोष में भरी हुई देखा | तब राजाने पूछा – ‘सुन्दरी ! तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही हैं ? तुम्हे कोई रोग तो नही सता रहा है ? अथवा किसी भयसे व्याकुल तो नहीं हो ? बताओ, क्या चाहती हो ? मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करता हूँ | जिन श्रीराम के बिना मैं क्षणभर भी जीवित नही रह सकता, उन्हीं की शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण करूँगा | सच-सच बताओ, क्या चाहती हो ?’ कैकेयी बोली – ‘राजन ! यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हों, तो अपने सत्य की रक्षा के लिए पहले के दिये हुए दो वरदान देने की कृपा करें | मैं चाहती हूँ, राम चौदह वर्षों तक संयमपूर्वक वनमें निवास करें और इन सामग्रियों के द्वारा आज ही भरत का युवराज पदपर अभिषेक हो जाय | महाराज ! यदि ये दोनों वरदान आप मुझे नहीं देंगे तो मैं विष पीकर मर जाऊँगी |’ यह सुनकर राजा दशरथ वज्र से आहत हुए की भाँती मूर्छित होकर भूमिपर गिर पड़े | फिर थोड़ी देर में चेत होनेपर उन्होंने कैकेयी से कहा || १६-२३||
दशरथ बोले – पापपूर्ण विचार रखनेवाली कैकेयी ! तू समस्त संसार का अप्रिय करनेवाली है | अरी ! मैंने या राम ने तेरा क्या बिगाड़ा हैं, जो तू मुझसे ऐसी बात कहती है ? केवल तुझे प्रिय लगनेवाला यह कार्य करके मैं संसार में भलीभाँति निन्दित हो जाऊँगा | तू मेरी स्त्री नहीं, कालरात्रि है | मेरा पुत्र भरत ऐसा नहीं है | पापिनी ! मेरे पुत्र के चले जानेपर जब मैं मर जाऊँगा तो तू विधवा होकर राज्य करना || २५- २५.५ ||
राजा दशरथ सत्य के बन्धन में बँधे थे | उन्होंने श्रीरामचंद्रजी को बुलाकर कहा – ‘बेटा ! कैकेयी ने मुझे ठग लिया | तुम मुझे कैद करके राज्य को अपने अधिकार में कर लो | अन्यथा तुम्हे वन में निवास करना होगा और कैकेयी का पुत्र भरत राजा बनेगा |’ श्रीरामचंद्रजी ने पिता और कैकेयी को प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा की और कौसल्या के चरणों में मस्तक झुकाकर उन्हें सांत्वना डी | फिर लक्ष्मण और पत्नी सीता को साथ ले, ब्राह्मणों, दीनों और अनाथों को दान देकर, सुमन्त्रसहित रथपर बैठकर वे नगर से बाहर निकले | उससमय माता-पिता आदि शोक से आतुर हो रहे थे | उस रात में श्रीरामचंद्रजी ने तमसा नदी के तटकर निवास किया | उनके साथ बहुत-से पुरवासी भी गये थे | उन सबको सोते छोडकर वे आगे बढ़ गये | प्रात:काल होनेपर जब श्रीरामचंद्रजी नहीं दिखायी दिये तो नगरनिवासी निराश होकर पुन: अयोध्या लौट आये | श्रीरामचंद्रजी के चले जाने से राजा दशरथ बहुत दु:खी हुए | वे रोते-रोते कैकेयी का महल छोडकर कौसल्या के भवन में चले आये | उससमय नगर के समस्त स्त्री-पुरुष और रनिवास की स्त्रियाँ फुट-फुटकर रो रही थी | श्रीरामचंद्रजी ने चीरवस्त्र धारण कर रखा था | वे रथपर बैठे-बैठे श्रुंगवेरपुर जा पहुँचे | वहाँ निषादराज गुह ने उनका पूजन, स्वागत-सत्कार किया | श्रीरघुनाथजी ने इन्गदी-वृक्ष की जड़ के निकट विश्राम किया | लक्ष्मण और गुह दोनों रातभर जागकर पहरा देते रहे || २६-३३ ||
प्रात:काल श्रीराम ने रथसहित सुमन्त्र को विदा कर दिया तथा स्वयं लक्ष्मण और सीता के साथ नाव से गंगा पार हो वे प्रयाग में गये | वहाँ उन्होंने महर्षि भरद्वाज को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वहाँ से चित्रकूट पर्वत को प्रस्थान किया | चित्रकूट पहुँचकर उन्होंने वास्तुपुजा करने के अनन्तर (पर्णकुटी बनाकर) मन्दाकिनी के तटपर निवास किया | रघुनाथजी ने सीता को चित्रकूट पर्वत का रमणीय दृश्य दिखलाया | इसीसमय एक कौए ने सीताजी के कोमल श्रीअंग में नखों से प्रहार किया | यह देख श्रीराम ने उसके ऊपर सींक के अस्त्र का प्रयोग किया | जब वह कौआ देवताओं का आश्रय छोडकर श्रीरामचंद्रजी की शरण में आया, तब उन्होंने उसकी केवल एक आँख नष्ट करके उसे जीवित छोड़ दिया | श्रीरामचंद्रजी के वनगमन जे पश्चात छठे दिन की रात में राजा दशरथ ने कौसल्या से पहले की एक घटना सुनायी, जिसमें उनके द्वारा कुमारावस्था में सरयू के तटपर अनजान में यज्ञदत्त-पुत्र श्रवणकुमार के मारे जाने का वृतान्त था | “श्रवणकुमार पानी लेने के लिये आया था | उससमय उसके घड़े के भरने से जो शब्द हो रहा था, उसकी आहट पाकर मैंने उसे कोई जंगली जन्तु समझा और शब्दवेधी बाण से उसका वध कर डाला | यह समाचार पाकर उसके पिता और माता को बड़ा शोक हुआ | वे बारंबार विलाप करने लगे | उससमय श्रवणकुमार के पिताने मुझे शाप देंते हुए कहा – ‘राजन ! हम दोनों पति-पत्नी पुत्र के बिना शोकातुर होकर प्राणत्याग कर रहे हैं; तुम भी हमारी ही तरह पुत्रवियोग के शोक से मरोगे; [तुम्हारे पुत्र मरेंगे तो नहीं, किंतु] उससमय तुम्हारे पास कोई पुत्र मौजूद न होगा |’ कौसल्ये ! आज उस शाप का मुझे स्मरण हो रहा है | जान पड़ता है, अब इसी शोक से मेरी मृत्यु होगी |” इतनी कथा कहने के पश्च्यात राजाने ‘हां राम !’ कहकर स्वर्गलोक को प्रयाण किया | कौसल्या ने समझा, महाराज शोक से आतुर हैं; इससमय नींद आ गयी होगी | ऐसा विचार करके वे सो गयी | प्रात:काल जगानेवाले सूत, मागध और बन्दीजन सोते हुए महाराज को जगाने लगे; किंतु वे न जगे || ३४-४२ ||
तब उन्हें मारा हुआ जान रानी कौसल्या ‘हाय ! मैं मारी गयी’ कहकर पृथ्वीपर गिर पड़ी | फिर तो समस्त नर-नारी फुट-फुटकर रोने लगे | तत्पस्च्यात महर्षि वसिष्ठ ने राजा के शव को तैलभरी नौका में रखवाकर भरत को उनके ननिहाल से तत्काल बुलवाया | भरत और शत्रुघ्न अपने मामा के राजमहल से निकलकर सुमन्त्र आदि के साथ शीघ्र ही अयोध्यापुरी में आये | यहाँ का समाचार जानकर भरत को बड़ा दुःख हुआ | कैकेयी को शोक करती देख उसकी कठोर शब्दों में निंदा करते हुए बोले – ‘अरी ! तूने मेरे माथे कलंक का टिका लगा दिया – मेरे सिरपर अपयश का भारी बोझ लाद दिया |’ फिर उन्होंने कौसल्या की प्रशंसा करके तैलपूर्ण नौका में रखे हुए पिता के शव का सरयूतट पर अंतेष्टि-संस्कार किया | तदनन्तर वसिष्ठ आदि गुरुजनों ने कहा – ‘भरत ! अब राज्य ग्रहण करो |’ भरत बोले = ‘मैं तो श्रीरामचंद्रजी को ही राजा मानता हूँ | अब उन्हें यहाँ लाने के लिए वन में जाता हूँ |’ ऐसा कहकर वे वहाँ से दल-बलसहित चल दिये और श्रुंगवेरपुर होते हुए प्रयाग पहुँचे | वहाँ महर्षि भरद्वाज ने उन सबको भोजन कराया | फिर भरद्वाज को नमस्कार करके वे प्रयाग से चले और चित्रकूट में श्रीराम एव, लक्ष्मण के समीप आ पहुँचे | वहाँ भरत ने श्रीराम से कहा – ‘रघुनाथजी ! हमारे पिता महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गये | मैं आप की आज्ञा का पालन करते हए वनमें जाऊँगा |’ यह सुनकर श्रीराम ने पिता का तर्पण किया और भरत से कहा –‘तुम मेरी चरणपादुका लेकर अयोध्या लौट जाओ | मैं राज्य करने के लिए नहीं चलूँगा | पिता के सत्य की रक्षा के लिये चीर एवं जटा धारण करके वनमें ही रहूँगा |’ श्रीराम के ऐसा कहनेपर सदल-बल भरत लौट गये और अयोध्या छोडकर नन्दीग्राम में रहने लगे | वहाँ भगवान की चरण-पादुकाओं की पूजा करते हुए वे राज्य का भलीभाँति पालन करने लगे || ४३-५१ ||
इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘रामायण-कथा के अन्तर्गत अयोध्याकाण्ड की कथा का वर्णन’ नामक छठा अध्याय पूरा हुआ || ६ ||
Comments
Post a Comment