अध्याय – 005 श्रीरामावतार-वर्णन के प्रसंग में रामायण-बालकाण्ड की संक्षिप्त कथा

अध्याय – 005
श्रीरामावतार-वर्णन के प्रसंग में रामायण-बालकाण्ड की संक्षिप्त कथा

इसका पाठ भोग और मोक्ष – दोनों को देनेवाला है 

अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! अब मैं ठीक उसीप्रकार रामायण का वर्णन करूँगा, जैसे पूर्वकाल में नारदजी ने महर्षि वाल्मीकिजी को सुनाया था ||१||

देवर्षि नारद कहते हैं – वाल्मीकिजी ! भगवान विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं | ब्रह्माजी के पुत्र हैं मरीचि | मरीचि से कश्यप, कश्यप से सूर्य और सूर्य से वैवस्वतमनु का जन्म हुआ | उसके बाद वैवस्वतमनु से इक्ष्वाकु की उत्पत्ति हुई | इक्ष्वाकु के वंश में ककुत्स्थ नामक राजा हुए | ककुत्स्थ के रघु, रघु के अज और अज के पुत्र दशरथ हुए | उन राजा दशरथ से रावण आदि राक्षसों का वध करने के लिये साक्षात् भगवान विष्णु चार रूपों में प्रकट हुए | उनकी बड़ी रानी कौसल्या के गर्भ से श्रीरामचन्द्रजी का प्रादुर्भाव हुआ | कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ | महर्षि ऋष्यश्रृंग ने उन तीनों रानियों को यज्ञसिद्ध चरु दिये थे, जिन्हें खाने से उन चारों कुमारों का आविर्भाव हुआ | श्रीराम आदि सभी भाई अपने पिता के समान पराक्रमी थे।

एक समय मुनिवर विश्वामित्र ने अपने यज्ञ में विघ्न डालनेवाले निशाचरों का नाश करने के लिये राजा दशरथ से प्रार्थना की (कि आप अपने पुत्र श्रीराम को मेरे साथ भेज दें) | तब राजाने मुनि के साथ श्रीराम और लक्ष्मण को भेज दिया | श्रीरामचन्द्रजी ने वहाँ जाकर मुनिसे अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा पायी और ताड़का नामवाली निशाचरी का वध किया | फिर उन बलवान वीर ने मारीच नामक राक्षस को मानवास्त्र से मोहित करके दूर फेंक दिया उअर यज्ञविघातक राक्षस सुबाहु को दल-बलसहित मार डाला | इसके बाद वे कुछ कालतक मुनि के सिद्धाश्रम में ही रहें | तत्पश्चात विश्वामित्र आदि महर्षियों के साथ लक्ष्मणसहित श्रीराम मिथिला-नरेश का धनुष-यज्ञ देखने के लिये गये ||२ – ९||

[अपनी माता अहल्या के उद्धार की वार्ता सुनकर संतुष्ट हुए] शतानन्दजी ने निमित्त-कारण बनकर श्रीराम से विश्वामित्र मुनिके प्रभाव का वर्णन किया | राजा जनक के अपने यज्ञ में मुनियोंसहित श्रीरामचन्द्रजी का पूजन किया | श्रीराम ने धनुष को चढ़ा दिया और उसे अनायास ही तोड़ डाला | तदनन्तर महाराज जनक ने अपनी अयोनिजा कन्या सीता को, जिसके विवाह के लिये पराक्रम ही शुल्क निश्चित किया गया था, श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया | श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ आदि गुरुजनों के मिथिला में पधारने पर सबके सामने सीता का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया | उससमय लक्ष्मण ने भी मिथिलेश – कन्या उर्मिला को अपनी पत्नी बनाया | राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज थे | उनकी दो कन्याएँ थीं – श्रुतकीर्ति और माण्डवी | इनमे माण्डवी के साथ भरत ने और श्रुतकीर्ति के साथ शत्रुघ्न ने विवाह किया | तदनन्तर राजा जनक से भलीभाँति पूजित हो श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठ आदि महर्षियों के साथ वहाँ से प्रस्थान किया | मार्ग में जमदग्निनन्दन परशुराम को जीतकर वे अयोध्या पहुँचे | वहाँ जानेपर भरत और शत्रुघ्न अपने मामा राजा युधाजित को राजधानी को चले गये ||१०-१५||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘श्रीरामायण-कथा के अन्तर्गत बालकाण्ड में आये हुए विषय का वर्णन’ सम्बन्धी पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ || ५ ||

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