अध्याय – 003 समुद्र-मन्थन, कर्म तथा मोहिनी-अवतार की कथा

अध्याय – 003
समुद्र-मन्थन, कर्म तथा मोहिनी-अवतार की कथा
अग्निदेव कहते हैं : 
वसिष्ठ ! अब मैं कुर्मावतार का वर्णन करूँगा | यह सुननेपर सब पापों का नाश हो जाता है | पूर्वकाल की बात हैं, देवासुर-संग्राम में दैत्यों ने देवताओं को परास्त कर दिया | वे दुर्वासा के शाप से भी लक्ष्मी से रहित हो गये थे | तब सम्पूर्ण देवता क्षीरसागर में शयन करनेवाले भगवान विष्णु के पास जाकर बोले – ‘भगवन ! आप देवताओं की रक्षा कीजिये |’ 

यह सुनकर श्रीहरि ने ब्रह्मा आदि देवताओं से कहा –‘देवगण ! तुम लोग क्षीरसमुद्र को मथने, अमृत प्राप्त करने और लक्ष्मी को पाने के लिये असुरों से संधि कर लो | कोई बड़ा काम या भारी प्रयोजन आ पड़नेपर शत्रुओं से भी संधि कर लेनी चाहिये | मैं तुम लोगों को अमृत का भागी बनाऊँगा और दैत्यों को उससे वंचित रखूँगा | मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को नेती बनाकर आलस्यरहित हो मेरी सहायता से तुम लोग क्षीरसागर का मन्थन करो |’ 

भगवान विष्णु के ऐसा कहनेपर देवता दैत्यों के साथ संधि करके क्षीरसमुद्र पर आये | फिर तो उन्होंने एक साथ मिलकर समुद्र-मन्थन आरम्भ किया | जिस ओर वासुकि नाग की पूँछ थी, उसी और देवता खड़े थे | दानव वासुकि नाग के नि:श्वास से क्षीण हो रहे थे और देवतोओं को भगवान अपनी कृपादृष्टि से परिपुष्ट कर रहे थे | समुद्र-मन्थन आरम्भ होनेपर कोई आधार न मिलने से मन्दराचल पर्वत समुद्र में डूब गया ||१ – ७ ||

तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का रूप धारण करके मन्दराचल को अपनी पीठपर रख लिया | फिर जब समुद्र मथा जाने लगा, तो उसके भीतर से हलाहल विष प्रकट हुआ | उसे भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण कर लिया | इससे कंठ में काला दाग पड़ जाने के कारण वे ‘नीलकंठ’ नाम से प्रसिद्ध हुए।

तत्पश्चात समुद्र से वारुणीदेवी, पारिजात वृक्ष, कौस्तुभमणि, गौएँ तथा दिव्य अप्सराएँ प्रकट हुई | फिर लक्ष्मीदेवी का प्रादुर्भाव हुआ | वे भगवान विष्णु को प्राप्त हुई | सम्पूर्ण देवताओं ने उनका दर्शन और स्तवन किया | इससे वे लक्ष्मीवान हो गये | तदनन्तर भगवान विष्णु के अंशभूत धन्वन्तरि, जो आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं, हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश लिये प्रकट हुए | 

दैत्यों ने उनके हाथ से अमृत छीन लिया और उसमें से आधा देवताओं को देकर वे सब चलते बने | उनमें जम्भ आदि दैत्य प्रधान थे | उन्हें जाते देख भगवान विष्णु ने स्त्री का रूप धारण किया | उस रूपवती स्त्री को देखकर दैत्य मोहित हो गये और बोले – ‘सुमुखि ! तुम हमारी भार्या हो जाओ और यह अमृत लेकर हमें पिलाओ |’ 

‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान ने उनके हाथ से अमृत ले लिया और उसे देवताओं को पिला दिया | उस समय राहु चन्द्रमा का रूप धारण करके अमृत पीने लगा | तब सूर्य और चन्द्रमा ने उसके कपट-वेष को प्रकट कर दिया ||८ – १४||

यह देख भगवान श्रीहरि ने चक्र से उसका मस्तक काट डाला | उसका सिर अलग हो गया और भुजाओं सहित धड़ अलग रह गया | फिर भगवान को दया आयी और उन्होंने राहु को अमर बना दिया | तब ग्रहस्वरुप राहु ने भगवान श्रीहरि से कहा – ‘इन सूर्य और चन्द्रमा को मेरे द्वारा अनेकों बार ग्रहण लगेगा | उस समय संसार के लोग जो कुछ दान करें, वह सब अक्षय हो |’ भगवान विष्णुने ‘तथास्तु’ कहकर सम्पूर्ण देवताओं के साथ राहु की बात का अनुमोदन किया | 

इसके बाद भगवान ने स्त्री रूप त्याग दिया; किंतु महादेवजी को भगवान के उस रूप का पुनर्दर्शन करने की इच्छा हुई | अत: उन्होंने अनुरोध किया – ‘भगवन ! आप अपने स्त्री रूप को मुझे दर्शन करावें |’ महादेवजी की प्रार्थना से भगवान श्रीहरि ने उन्हें अपने स्त्री रूप का दर्शन कराया | वे भगवान की मायासे ऐसे मोहित हो गये कि पार्वतीजी को त्यागकर उस स्त्री के पीछे लग गये | उन्होंने नग्न और उन्मत्त होकर मोहिनी के केश पकड़ लिये | मोहिनी अपने केशों को छुड़ाकर वहाँ से चल दी | उसे जाती देख महादेवजी भी उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे | उस समय पृथ्वीपर जहाँ-जहाँ भगवान शंकर का वीर्य गिरा, वहाँ-वहाँ शिवलिंगों का क्षेत्र एवं सुवर्ण की खानें हो गयीं | 

तत्पश्चात ‘यह माया हैं‘ – ऐसा जानकर भगवान शंकर अपने स्वरुप में स्थित हुए | तब भगवान श्रीहरि ने प्रकट होकर शिवजी से कहा – ‘रुद्र ! तुमने मेरी माया को जीत लिया | पृथ्वीपर तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं हैं, जो मेरी इस माया को जीत सके |’ भगवान के प्रयत्न से दैत्यों को अमृत नहीं मिलने पाया; अत: देवताओं ने उन्हें युद्ध में मार गिराया | फिर देवता स्वर्ग में विराजमान हुए और दैत्यलोग पातल में रहने लगे | जो मनुष्य देवताओं की इस विजयगाथा का पाठ करता हैं, वह स्वर्गलोक में जाता है ||१५ – २३||

इसप्रकार विद्याओं के सारभूत आदि आग्नेय महापुराण में ‘कूर्म व मोहनी अवतार –वर्णन’ नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ || ३ ||

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