अध्याय – 002 मत्स्यावतार की कथा

अध्याय – 002
मत्स्यावतार की कथा
वशिष्ठजी ने कहा : अग्निदेव ! आप सृष्टि आदि के कारणभूत भगवान विष्णु के मत्स्य आदि अवतारों का वर्णन कीजिये | साथ ही ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराण को भी सुनाइये, जिसे पूर्वकाल में आपने श्रीविष्णु भगवान के मुखसे सुना था ||१||

अग्निदेव बोले : वसिष्ठ ! सुनो, मैं श्रीहरि के मत्स्यावतार का वर्णन करता हूँ | अवतार-धारण का कार्य दुष्टों के विनाश और साधू-पुरुषों की रक्षा के लिये होता हैं | बीते हुए कल्प के अन्त में ‘ब्राह्म’ नामक नैमित्तिक प्रलय हुआ था | मुने ! उस समय ‘भू’ आदि लोक समुद्र के जलमें डूब गये थे | प्रलय के पहले की बात है | वैवस्वत मनु भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिये तपस्या कर रहे थे | एक दिन जब वे कृतमाला नदीमें जलसे पितरों का तर्पण कर रहे थे, उनकी अंजली के जलमें एक बहुत छोटा-सा मत्स्य आ गया | राजाने उसे जलमें फेंक देने का विचार किया ।

तब मत्स्य ने कहा – ‘महाराज ! मुझे जलमें न फेंको | यहाँ ग्राह आदि जल-जन्तुओं से मुझे भय हैं |’ यह सुनकर मनुने उसे अपने कलश के जलमें डाल दिया | मत्स्य उसमें पड़ते ही बड़ा हो गया और पुन: मनुसे बोला – ‘राजन ! मुझे बड़ा स्थान दो |’ उसकी यह बात सुनकर राजाने उसे एक बड़े जलपात्र (नाद या कुंडा आदि) में डाल दिया | उसमें भी बड़ा होकर मत्स्य राजा से बोला– ‘मनो ! मुझे कोई विस्तृत स्थान दो |’ तब उन्होंने पुन: उसे सरोवर के जलमे डाला; किंतु वहाँ भी बढ़कर वह सरोवर के बराबर हो गया और बोला –‘मुझे इससे बड़ा स्थान दो |’ तब मनुने उसे फिर समुद्रमें ही ले जाकर डाल दिया | वहाँ वह मत्स्य क्षणभर में एक लाख योजन बड़ा विस्मय हुआ | वे बोले – ‘आप कौन हैं ? निश्चय ही आप भगवान श्रीविष्णु जान पड़ते हैं | नारायण ! आपको नमस्कार हैं | जनार्दन ! आप किसलिये अपनी मायासे मुझे मोहित कर रहे हैं ?’ ||२ – १०||

मनुके ऐसा कहनेपर सबके पालन में संलग्न रहनेवाले मत्स्यरूपधारी भगवान उनसे बोले – ‘राजन ! मैं दुष्टों का नाश और जगतकी रक्षा करने के लिये अवतीर्ण हुआ हूँ | आजसे सातवें दिन समुद्र सम्पूर्ण जगत को डूबा देंगा | उससमय तुम्हारे पास एक नौका उपस्थित होगी | तुम उसपर सब प्रकार के बीज आदि रखकर बैठ जाना | सप्तर्षि भी तुम्हारे साथ रहेंगे | जबतक ब्रम्हा की रात रहेगी, तबतक तुम उसी नावपर विचरते रहोगे | नाव आने के बाद मैं भी इसी रूपमें उपस्थित होऊँगा | उससमय तुम मेरे सींग में महासर्पमयी रस्सी से उस नाव को बाँध देना |’ ऐसा कहकर भगवान मत्स्य अन्तर्धान हो गये और वैवस्वत मनु उनके बताये हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए वहीँ रहने लगे |

जब नियत समयपर समुद्र अपनी सीमा लाँघकर बढ़ने लगा, तब वे पुर्वोत्क नौका पर बैठ गये | उसी समय एक सींग धारण करनेवाले सुवर्णमय मत्स्यभगवान का प्रादुर्भाव हुआ | उनका विशाल शरीर दस लाख योजन लंबा था | उनके सींग में नाव बाँधकर राजाने उनसे ‘मत्स्य’ नामक पुराण का श्रवण किया, जो सब पापों का नाश करनेवाला हैं | मनु भगवान मत्स्य की नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा स्तुति भी करते थे |

प्रलय के अन्त में ब्रह्म़ाजी से वेद को हर लेनेवाले ‘हयग्रीव’ नामक दानव का वध करके भगवान ने वेद-मंत्र आदि की रक्षा की | तत्पस्च्यात वाराहकल्प आनेपर श्रीहरि ने कच्छपरूप धारण किया ||११-१७||

इसप्रकार अग्निदेवद्वारा कहे गये विद्यासार-स्वरुप आदि आग्रेय महापुराण में ‘मत्स्यावतार – वर्णन’ नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ || २ ||

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